फॉर्मूला वन: कोई मालामाल तो कोई कंगाल

  • 23 अक्तूबर 2012
बलराज
Image caption इस हफ्ते के अंत में होनी है रेस

ग्रेटर नोएडा में फॉर्मूला वन ट्रैक बनने से जहां देश के कार रेस के शौकीन बहुत खुश हैं वहीं जिन लोगों की ज़मीनों पर यह बना है वो इसे उनकी ज़िंदगी खराब करने का दोषी ठहराते हैं.

इन लोगों का कहना है कि जब तक ज़मीन थी वे खेती कर लेते थे और जैसे तैसे गुज़ारा हो जाता था. लेकिन अब न ज़मीन है न नौकरी.

वहीं कुछ ऐसे लोग भी हैं जिनकी ज़िंदगी में ज़बरदस्त सुधार देखने को मिला है और इसले लिए वे सारा श्रेय फॉर्मूला वन को देते हैं.

दरअसल वो लोग जिन्होंने एक करोड़ या अधिक रुपए कमाए वो तो आज मज़े में है. उन्होंने कुछ पैसे से अपना जीवन सुधार लिया और बाकी से आस पड़ोस के गांवों में ज़मीन खरीद ली जिसपर खेती से उनका अच्छा गुज़र बसर हो जाता है.

लेकिन छोटा किसान या ज़मींदार बहुत मुश्किल में है. जो पैसे मिले वो खर्च कर डाले. न ज़मीन ही बची, न कोई काम ही रहा.

आईए मिलते हैं इनमें से कुछ लोगों से:

आलीशान घर

स्पोर्टस सिटी के जगनपुरा गांव में 49 वर्षीय बलराज प्रधान का घर सबसे खूबसूरत इमारतों में से है. दरअसल अब यह गांव नहीं बल्कि यमुना एक्सप्रेसवे अथौरिटी का सैक्टर 27 का भाग है.

सवा एकड़ में बनी तीन मंज़िला इमारत में सात बैडरूम हैं और हर कमरे में वो तमाम सुविधाएं मौजूद हैं जो आप सोच सकते हैं.

जब हम उनसे मिलने पहुँचे तो वो नई कार खरीदने गए थे. घर में पहले एक स्कॉर्पियो गाड़ी है.

पूछने पर वो बताते हैं, ''यह सब मैंने फॉर्मूला वन ट्रैक आने के बाद बनाया है. मुझे काफी पैसा मिला था. कुछ घर पर लगा दिया और बाकी से पास के एक गांव से ज़मीन खरीद ली जिससे अच्छी आमदनी हो जाती है.''

हालांकि वो मानते हैं, ''फॉर्मूला वन से अधिकतर लोगों का भला नहीं हो पाया है. अधिकतर किसानों की ज़मीन तो गई ही उन्हें नौकरियां भी नहीं मिल पाई हैं.''

ज़मीन भी गई...

बलराज के घर से कुछ आगे चलें तो आप फिरे की दुकान पर पहुंचते हैं. दरअसल दुकान तो कहने को ही है, इसके अंदर सामान कुछ खास नहीं है.

फिरे से बात की तो वो फॉर्मूला वन को अपनी गरीबी के लिए ज़िम्मेदार ठहराते हैं. ''सात बीघा ज़मीन थी जो फॉर्मूला वन के लिए हथिया ली गई. अब न ज़मीन है न घर. जो पैसे मिले वो घर में शादी विवाह में खर्च हो गए. कुछ घर बनाने पर खर्च कर दिए और एक मोटर साइकिल ले लिया.''

वो कहते हैं, ''मैं कुछ पढ़ा लिखा तो हूं नहीं, इसलिए केवल खेती ही कर सकता हूँ. अब हालत यह है कि न ज़मीन है, न कोई काम.''

अच्छा लगता है...

पास के गांव लाडपुरा में रहते हैं विनोद भाटी. उनका कहना है, ''यह क्षेत्र के लिए बहुत अच्छा हुआ है कि फॉर्मूला वन ट्रैक बना है. लोग जब आप को फोन करके पूछते हैं तो बड़ा अच्छा लगता है. एक पहचान भी मिली है कि हम फॉर्मूला वन ट्रैक के पास रहते हैं.''

''बस यही शिकायत है कि लोगों को नौकरियां नहीं मिली. कई लोगों को अपनी ज़मीन से हाथ धोना पड़ा है.''

हालांकि वो खुद उनमें से नहीं हैं. वे कहते हैं, ''हमारी अपने गांव में ज़मीन तो गई लेकिन हमारे पास कई गांवों में ज़मीन है. इसलिए जो पैसा मिला उसे कहीं और निवेश कर दिया और कुछ घर की हालत सुधारने पर खर्च कर दिया और गाड़ी ले ली.''

न ज़मीन रही

ज़मीन का जो मुआवज़ा मिला संजय ने उससे कुछ घर पर खर्च कर दिया और अपने लिए एक ट्रैक्टर ले लिया.

वे बताते हैं, ''मैं हर रोज़ यमुना पर जा कर वहां से मिट्टी लाता हूँ और पड़ोस में जो इतनी निर्माण हो रहा है वहां इसे बेच आता हूँ. लेकिन कभी पुलिस पकड़ लेती है तो सारी अगली पिछली कमाई चली जाती है.''

संजय कहते हैं कि पुलिस का कहना है कि यह गैर-कानूनी काम है. ''लेकिन आप बताओ हम करें तो क्या करें. ज़मीन तो उन्होंने ले ली, कोई और काम आता नहीं.''

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