फॉर्मूला वन: क्या सच हुए सपने?

 सोमवार, 22 अक्तूबर, 2012 को 07:45 IST तक के समाचार
फॉर्मुला वन

फॉर्मुला वन ट्रैक बनाने के दौरान कई किसानों की ज़मीनों को अधिगृहित किया गया था.

ग्रेटर नोएडा के फॉर्मूला वन ट्रैक में 24 वर्षीय राजु माली का काम करते हैं. इससे पहले वो पास के कादलपुर गांव में अपनी ज़मीन पर खेती करते थे. अब यहां ट्रैक के मैदानों की घास को हरा भरा रखने का काम करते हैं.

वे बताते हैं, '' फॉर्मूला वन ट्रैक के लिए हमारी ज़मीन अधिगृहित कर ली गई जिसके बाद अब यहां नौकरी करते हैं.''

इसी तरह पास के गांव कनारसी की रहने वालीं पुष्पा और कमलेश भी यहां माली का काम करतीं हैं. वे बताती हैं कि यहां आस-पास के बहुत से गांव से आने वाले पुरुषों और महिलाओं को काम मिला है.

ग्रेटर नोएडा में बुद्ध अंतरराष्ट्रीय सर्किट में इस हफ्ते के अंत में दूसरी ग्रां-प्री होने वाली है. एक साल पहले यहां पहली कार रेस हुई थी.

भारत के पहले अंतरराष्ट्रीय स्तर के ट्रैक होने की वजह से यह क्षेत्र काफी सुर्खियों में रहा है. कई लोगों के सपने साकार हुए हैं.

किसी को नौकरी मिली तो किसी की ज़मीन की कीमत में भारी वृद्धि हुई है. रिहाइशी कोलोंनियों की तो जैसे भरमार आ गई है. क्षेत्र में काफी विकास हुआ है. कुछ पांच-सितारा होटल बन गए हैं, कुछ बनने वाले हैं. पास में ही भारत की पहली नाइट सफारी बनाने की भी योजना है.

स्पोर्टस सिटी बनाने वाले जेपी ग्रुप के असकरी ज़ैदी कहते हैं, ''स्पोर्टस सिटी ने 2,000 लोगों को नौकरी दी है जिसमें माल सप्लाई करने वाले और माल ढोने वाले शामिल है. इसके अलावा क्रिकेट स्टेडियम और टेनिस कोर्ट भी बनाए जा रहे हैं.''

नौकरियाँ

"कोई भी जब इतने बड़े स्तर का विकास होता है तो ऐसा माना जाता है कि आसपास के लोगों का सामाजिक और आर्थिक विकास होगा. दुर्भाग्य से ऐसा हुआ नहीं है. न तो लोगों को नौकरियाँ मिली हैं न ही क्षेत्र का विकास हुआ"

एसपी शर्मा, मुख्य अर्थशास्त्री, पीएचजी चैंबर

ट्रैक पर 28 अक्टूबर को होने वाली रेस के लिए तैयारियों को अंतिम रूप दिया जा रहा है. हवाई अड्डे से काफी माल आ रहा है जिसकी ज़िम्मेदारी रॉजर्स कंपनी ने ली है.

कंपनी के एक ऑप्रेटर जोसेफ बताते हैं, ''हमारे यहां लगभग 100 लोग ट्रैक पर काम कर रहे हैं जिनमें से करीब 80 दिल्ली या इस क्षेत्र के हैं.''

यहां न केवल आसपास के गांव से बल्कि मथुरा से भी आकर लोग काम कर रहे हैं. लोडिंग का काम कर रहे रामेशवर बताते हैं, ''मथुरा के करीब 10 लोग यहां काम कर रहे हैं. ज़ाहिर है इस ट्रैक से कई लोगों को रोज़ी रोटी मिली है.''

लेकिन ऐसा माना जा रहा है कि फॉर्मूला वन ट्रैक के आने के समय लोगों की आँखों में जो सपने दिखाए गए वैसा यहां कुछ भी नहीं हो पाया है.

कुछ लोगों को भले ही माली या मज़दूरी करने जैसे काम मिले हों, पर उम्मीदें पूरी नहीं हुईं. स्थानीय लोगों में से शायद ही कोई ऐसा हो जिसे यहां कोई अच्छी नौकरी मिली हो.

बेरोज़गारी और ग़रीबी

साथ ही आस-पास की गांव में बेरोज़गारों की संख्या भी काफी बढ़ गई है. जिनकी ज़मीनें ट्रैक के लिए अधिग्रहित कर ली गईं उनसे उनकी रोज़ी रोटी तो छीन ही लिया गया साथ ही कोई काम भी नहीं मिला.

पीएचजी चैंबर के मुख्य अर्थशास्त्री एसपी शर्मा कहते हैं, ''कहीं भी जब इतने बड़े स्तर का विकास होता है तो माना जाता है कि उसके आसपास बसे लोगों का सामाजिक और आर्थिक विकास होगा. दुर्भाग्य से ऐसा हुआ नहीं है. न तो लोगों को नौकरियाँ मिली हैं न ही क्षेत्र का विकास हुआ है.''

"ग्रेटर नोएडा क्षेत्र में प्रापर्टी के दाम ज़रूर बढ़े हैं लेकिन इसका कारण केवल फॉर्मुला वन नहीं है. यमुना एक्सप्रेस-वे भी इसका एक बड़ा कारण है. "

अवधेश चौहान, प्रॉपर्टी डीलर

एक प्रापर्टी डीलर अवधेश चौहान कहते हैं, ''ग्रेटर नोएडा क्षेत्र में प्रापर्टी के दाम ज़रूर बढ़े हैं लेकिन इसका कारण केवल फॉर्मूला वन नहीं है. यमुना एक्सप्रेस-वे भी इसका एक बड़ा कारण है. लेकिन पिछले एक साल में ज़मीन के दामों में 20-25 प्रतिशत वृद्धि देखने को मिली है.''

आसपास के गांव के कई लोगों का तो मानना है कि फॉर्मूला वन ट्रैक उनके लिए ग़रीबी लेकर आया हैं.

पास ही के गांव जगनपुरा के रहने वाले बलराज प्रधान कहते हैं, ''फॉर्मूला वन ट्रैक की वजह से सब की ज़मीनें तो छिन ही गईं, साथ ही किसी को नौकरी भी नहीं मिली. यहां के ज़्यादातर लोग पढ़े लिखे नहीं है इसलिए खेती का काम करते थे.''

वे बताते हैं, ''जो पैसे मिले थे वो उन्होंने शादी-ब्याह में खर्च कर दिए, बाकी पैसे घर पर खर्च हो गए. कुछ ने तो गाड़ियां भी ले ली. लेकिन अब कोई काम नहीं हैं तो आलम यह है कि इन्हीं गाड़ियों में तेल डलवाने के लिए पैसे नहीं है.

उधर नौकरी करने वाले भी खुश नहीं हैं. क्योंकि उन्हें लगता है कि, अपनी ज़मीन पर काम करने का अलग ही मज़ा था.

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