'क्रूर हत्याएँ' बंद करेंगे माओवादी

 बुधवार, 31 अक्तूबर, 2012 को 06:19 IST तक के समाचार
माओवादी लड़ाके

माओवादियों के प्रवक्ता ने कहा है कि अब उन्होंने क्रूर हत्याओं का सिलसिला बंद कर दिया है.

भारत में वामपंथी अतिवादियों का कहना है कि अब वे अपने प्रभाव वाले इलाकों में 'वर्ग शत्रुओं' के ख़िलाफ़ क्रूर तरीकों का इस्तेमाल नहीं करेंगे.

भारत की कम्युनिस्ट पार्टी ( माओवादी) मध्य और पूर्वी भारत के कई राज्यों में सक्रिय है.

माओवादियों के नाम से जाने जाने वाले ये चरमपंथी मुख्य रूप से नक्सल विरोधी अभियान में शामिल सुरक्षा बलों के जवान, पुलिस का मुखबिर होने के संदेह में पकडे गए आम लोग और उनसे अलग हुए धड़ों के लोगों को 'वर्ग शत्रु' क़रार देते है.

क्रूर हत्याओं को लेकर पहले भी माओवादियों के बीच काफी मंथन हुआ है. खास तौर पर झारखंड में पुलिस अधिकारी फ्रांसिस इंदुवार की हत्या के बाद संगठन में इस बात पर काफी बहस भी हुई थी.

इंदुवार का अपहरण माओवादियों नें किया था और बाद में उनकी गला रेत कर हत्या कर दी गई थी.

संगठन का कहना है की क्रूर हत्याओं को लेकर वो आपस में मंथन कर रहे हैं और अब उनका कहना है इस तरह की हत्याएं बंद होनी चाहिएं.

क्रूर हत्याएं

"गया और और्रंगाबाद में कई ऐसी घटनाएं हैं जब सुरक्षा बालों नें बेरहमी से लोगों को मारा. उद्धरण के तौर पर गया जिले के बांकेबाजार से सुदामा भुइयां को पुलिस नें गोली मारी. यह घटना पिछले साल 14 फरवरी की है और भुइयां को 12 घंटों तक तड़प तड़प कर मरने के लिए छोड़ दिया गया."

मानस, माओवादियों के प्रवक्ता

संगठन के प्रवक्ता मानस नें बीबीसी को बताया कि अब क्रूरता से मारने का सिलसिला ख़त्म कर दिया गया है.

मानस ने कहा, "ये बात सच है की पहले गला रेत कर हत्याएं की जाती थीं. मगर हमने तय किया है कि अब ये सब बंद होना चाहिए. हम इसे लगभग बंद भी कर चुके हैं."

माओवादी हों या उनसे टूट कर अलग हुए धड़े, क्रूर सजाओं की बात जब होती है तो इससे कोई अछूता नहीं है.

झारखंड, छत्तीसगढ़ और ओडिशा में सक्रिय ये सभी संगठन क्रूर सज़ाओं पर ज़्यादा भरोसा करते रहे हैं. यही वजह है की इन राज्यों में कई ऐसी वारदातें हुईं हैं जिसने आम मानस को झकझोर कर रख दिया है.

हालांकि छत्तीसगढ़ और ओडिशा में माओवादियों के अलग धड़े नहीं हैं लेकिन झारखंड इस मामले में ज्यादा संवेदनशील इसलिए हैं क्योंकि माओवादियों के अलावा वहां ऐसे कई समूह हैं जो उसी विचारधारा पर चल रहे हैं.

कई ऐसे मामले देखने को मिले हैं जब या तो माओवादियों नें अपने से अलग हुए धड़ों के सदस्यों या उनके समर्थकों को बहुत क्रूर तरीके से मारा हो या फिर इन अलग हुए गुटों नें माओवादियों और उनके समर्थकों की हत्या की हो.

इन सब मामलों में सबके क्रूर चेहरे सामने आते रहे हैं.

गुमला का मामला

"ये अच्छी बात है कि माओवादियों नें ऐसा फैसला लिया है. अगर ऐसा है तो हम इसका स्वागत करते हैं क्योंकि इनके हमलों में बहुत क्रूरता का प्रदर्शन किया जाता रहा है."

सुरजीत अत्री, अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक, बस्तर संभाग

हाल ही में झारखण्ड के गुमला जिले में बकरा चोरी करने के आरोप में दो लोगों की हत्या कर दी गई. हालांकि अभी ये तय नहीं हो पाया है की इनकी हत्या माओवादियों नें की है या माओवादियों से अलग हुए किसी धड़े ने.

गुमला ज़िले में तैनात पुलिस अधिकारी आमिष हुसैन का कहना है कि ये दोनों ग्रामीण बकरियां लेकर अपने गावों लौट रहे थे, तभी हथियारबंद लोगों नें उन्हें रोका और उनपर चोरी के जानवर ले जाने का आरोप लगाया.

इसके बाद चरवाहों के दल में से दो की हत्या बहुत ही क्रूर क्रूरता से कर दी गई. हत्या से पहले दोनों ग्रामीणों के हाथ काट दिए. मारे जाने वालों की शिनाख्त लखन लोहरा और रामदेव खेरवार के रूप में की गयी है.

वहीं सोमवार को छत्तीसगढ़ के सुकमा ज़िले में माओवादियों नें 'सलवा जुडूम' के कार्यकर्ता पर कुल्हाड़ी के अनगिनत वार किए और उसकी जान ले ली.

बताया जा रहा है कि सलवा जुड़ुम कार्यकर्ता का नाम सवयम इंका था. पुलिस ने घटनास्थल से माओवादियों का एक परचा भी बरामद किया है जिसमे कहा गया है कि सवयम इंका ने सलवा जुडूम आंदोलन के दौरान कई स्थानीय आदिवासियों की बेहद क्रूरता के साथ हत्या की थी.

झारखंड में क्रूरता

माओवादी लड़ाके

मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि पुलिस और माओवादी दोनों ही क्रूर हत्याओं के लिए ज़िम्मेदार रहे हैं.

कुछ और मामले झारखण्ड के हैं जहाँ पीएलएफ़आई नाम के एक गुट नें एक प्रेमी जोड़े की इस लिए पीट-पीट कर हत्या कर दी क्योंकि वो बिना शादी किए एक साथ रह रहे थे.

ये घटना राजधानी रांची से लगभग 50 किलोमीटर दूर अथेलडीह गाँव की है. पुलिस का कहना है कि इस साल के जनवरी महीने में ही इस इलाके में पीएलएफ़आई के हथियारबंद दस्तों नें सात लोगों की क्रूरता से हत्या की है.

लेकिन माओवादियों के प्रवक्ता मानस पुलिस की क्रूरता की दुहाई देते हुए कहते हैं, " बिहार के गया और औरंगाबाद में कई ऐसी घटनाएं हुई हैं जहां सुरक्षा बलों नें बेरहमी से लोगों को मारा. मिसाल की तौर पर गया के बांकेबाजार में सुदामा भुइयां को पुलिस ने गोली मारी. ये घटना पिछले साल 14 फरवरी की है और भुइयां को 12 घंटों तक तड़प-तड़प कर मरने के लिए छोड़ दिया गया."

क्रूर हत्याओं पर माओवादियों के इस ताज़ा रुख़ का पुलिस अधिकारियों ने स्वागत किया है.

छत्तीसगढ़ के बस्तर में नक्सल विरोधी अभियान का नेतृत्व कर रहे अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक सुरजीत अत्री का कहना है, "ये अच्छी बात है कि माओवादियों नें ऐसा फैसला लिया है. अगर ऐसा है तो हम इसका स्वागत करते हैं क्योंकि इनके हमलों में बहुत क्रूरता का प्रदर्शन किया जाता रहा है."

'सब एक-से हैं'

हालांकि अत्री नें इस बात से इनकार किया कि नक्सल विरोधी अभियान के दौरान सुरक्षा बलों के जवान भी क्रूरता का इस्तेमाल करते हैं.

मानवाधिकार कार्यकर्ता शशिभूषण पाठक कहते हैं कि क्रूर तरीकों में सभी बराबर हैं चाहे माओवादी हों या फिर सुरक्षा बलों के जवान.

कुछ मानवाधिकार संगठनों का आरोप है कि छत्तीसगढ़ में सलवा जुडूम और नागा बटालियन के जवानों नें भी आदिवासियों की हत्या करने के लिए क्रूर तरीकों का सहारा लिया.

यही हाल झारखण्ड के पूर्वी सिंहभूम ज़िले का है जहां मानवाधिकार संगठनों का आरोप है कि नागरिक सुरक्षा समिति नें माओवादियों के समर्थकों को मारने के नाम पर काफी क्रूरता का परिचय दिया है.

मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि क्रूरता के ज़रिए लोगों के बीच दहशत फैला कर अपना प्रभाव बढ़ाया जा सकता है. इसी वजह से समय-समय पर इसका इस्तेमाल सुरक्षा बल और नक्सली संगठन दोनो ही करते आए हैं.

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