वो कत्ल था या आज़ादी की जंग का हिस्सा?

जगन नाथ
Image caption जगन नाथ ने साल 1943 में अंग्रेज़ महिला अधिकारी को ट्रेन से बाहर फेंका था

जगन नाथ ने साल 1943 में अंग्रेज़ महिला सैन्य अधिकारी को ट्रेन से बाहर फेंका था. भारत सरकार पुरानी फाइलों को खंगाल कर ये पता लगाने की कोशिश कर रही है कि क्या ये आज़ादी की लड़ाई का हिस्सा था.

मुकदमे की फाइलों के लिए भारत को पाकिस्तान सरकार से संपर्क करना होगा क्योंकि इसकी सुनवाई उस समय वहां की एक अदालत ने की थी.

पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार को छह महीने का समय दिया है.

केंद्र सरकार के वकील सुशील गौतम ने कहा, ''इस पर हाई कोर्ट के आदेश के अनुसार कार्यवाही की जा रही है. हमने ये आदेश गृह मंत्रालय को भेज दिया है.''

दरअसल जगन नाथ ने हाईकोर्ट से गुहार लगाई थी कि उन्हें भारत के स्वतंत्रता सेनानी करार देते हुए पेंशन दी जाए.

'गंभीर अपराध'

उनका निवेदन केंद्र सरकार ने ये कहते हुए खारिज कर दिया था कि स्वतंत्रता आंदोलन में हत्या जैसे गंभीर आरोप नहीं जोड़े जा सकते.

मामले को 69 साल गुज़र चुके हैं. पंजाब में फिरोज़पुर के रहने वाले जगन नाथ जिनका दूसरा नाम भोला है अब लगभग 90 साल के हो चुके हैं और ठीक से बात भी नहीं कर पाते.

वो महिला जिनकी हत्या की गई थी, उनका नाम कैप्टन हैरन था.

हाई कोर्ट ने अपने आदेश में लिखा कि जगन नाथ ने उन्हें ट्रेन से बाहर फेंक दिया था जिससे उनकी मौत हो गई.

जगन का दावा था कि उन्होंने ऐसा स्वतंत्रता के आंदोलन के तहत किया था.

उनके बेटे ऋषि कुमार ने बीबीसी को बताया कि वे हमेशा से अपने पिता को स्वतंत्रता का एक सिपाही ही मानते आए हैं.

ऋषि ने कहा, ''वे अपने आईएनए यानी आज़ाद हिंद फौज के साथियों के साथ ट्रेन में सफर कर रहे थे कि ये अधिकारी कुछ सिपाहियों के साथ उसमें चढ़ी और आईएनए के लोगों की उपस्थिति पर ऐतराज़ करने लगीं. हाथापाई हुई और ये अधिकारी नीचे गिर गई जिससे उनकी मौत हो गई.''

पाकिस्तान से संपर्क

हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि पहले केंद्र सरकार ने इस बात को नहीं माना और फिर पंजाब सरकार ने भी कुछ इसी तरह का पक्ष लिया.

उन्होंने ऐसा फिरोज़पुर के जेल अधिकारियों के प्रमाण पत्र के आधार पर किया.

अब हाई कोर्ट ने आदेश दिया है कि सरकार ये पता लगाए कि क्या जगन नाथ ने ये सोच कर हत्या की थी कि आज़ादी हिंसक तरीकों से हासिल की जा सकती है. या फिर ये बिना लूटपाट के इरादे और बिना उसकी राष्ट्रीयता को ध्यान में रखते हुए सीधे हत्या का मामला था.

जज का मानना है कि गुजरांवाला के न्यायधीश के आदेश से इन सवालों के उत्तर मिल सकते हैं.

हाई कोर्ट के ये भी पाया कि अपनी अपील में जगन नाथ ने ये भी कहा है कि साल 1946 में लाहौर के सेशन जज ने उन्हें फांसी का हुक्म दिया था हालांकि वे गुजरांवाला जेल में रहे.

जज ने सवाल किया है कि क्या यह अलग मामला था या फिर इसी सजा़ को तबदील किया गया था.

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