पाकिस्तान का शुक्रगुजार हूं: मिल्खा सिंह

  • 9 नवंबर 2012
Image caption भारत-पाक बंटवारे से दुखी मिल्खा सिंह ने पाकिस्तान में दौड़ने से मना कर दिया था.

1960 के दशक के हीरो और उड़न सिख के नाम से दुनिया भर में मशहूर मिल्खा सिंह आज भी पाकिस्तान को याद कर भावुक हो उठते हैं.

इसकी वजह भी खास है, मिल्खा सिंह को उड़न सिंह का नाम पाकिस्तान ने ही दिया है. पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति जनरल मोहम्मद अयूब खान ने उन्हें उड़न सिख (फ्लाइंग सिख) की पदवी से नवाजा था.

मिल्खा सिंह ने दिल्ली के गोल्फ क्लब में महिला गोल्फ टूर्नामेंट के दौरान जब ये बात सबको बताई तो वो भावुक हो गए. उस दिन को याद कर आज भी उनके चेहरे पर चमक आ जाती है.

वो यहां समारोह के मुख्य अतिथि के तौर पर बुलाए गए थे.

विभाजन ने दुखी किया

समारोह में पाकिस्तान से आई हुई कुछ महिला गोल्फर से क्षमा मंगते हुए मिल्खा सिंह ने कहा, "उन्होने 1960 में पाकिस्तान के लाहौर शहर में दौडने के लिए आए निमत्रंण को ठुकरा दिया था, क्योंकि वह 1947 में दोनो देशो के बीच हुए बँटवारे की दुखद यादों को भुला नही पा रहे थे."

मिल्खा, उस वक्त की अपनी मन:स्थित को याद करते हुए कहते हैं, "उस समय लाशों से भरी ट्रेनो के दृश्य मेरी आंखों से ओझल ही नहीं हो रहे थे."

मिल्खा सिंह के पाकिस्तान ना जाने की ख़बर अगले दिन अख़बारों की सुर्खियाँ बनीं- मिल्खा सिंह पाकिस्तान दौडने नही जाएंगे.

जब यह ख़बर तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को मिली तो उन्होंने मिल्खा सिंह को बुलवाया और सारी बातें जानने के बाद उन्हें समझाया कि सारी पुरानी बाते भूलकर लाहौर जाओ, आज से तुम्हारे माँ-बाप भारत और पाकिस्तान हैं.

इसके बाद मिल्खा सिंह बागा बार्डर के रास्ते पाकिस्तान पहुँचे. उन्हे खुली जीप में लाहौर ले जाया गया. पंद्रह किलोमीटर तक सडक के दोनो तरफ खडी भीड़ के हाथों में उस समय भारत और पाकिस्तान के झंडे लहरा रहे थे.

'भारत-पाक की टक्कर'

Image caption राकेश ओमप्रकाश मेहरा और प्रसून जोशी के साथ मिल्खा सिंह.

मिल्खा सिंह जब पाकिस्तान पहुंचे तो अगले दिन अखबारो की सुखिया थी, " भारत और पाकिस्तान की टक्कर.

मिल्खा सिंह का सामना अब्दुल खालिद से था. उन दिनो खालिद खासे मशहूर धावक थे. म़काबले के दिन स्टेडियम में साठ हज़ार से अधिक लोगो की भीड थी, जिनमें हजा़रो औरते बुर्का पहने बैठी थी.

अब्दुल खालिद, मिल्खा सिंह और दूसरे धावको के बीच रेस शुरू होने से पहले तीन मौलवी खालिद के पास आए और कहा, " खु़दा हाफिज़, खु़दा आपको ताक़त दे."

इसके बाद वापस जाते मौलवियो को मिल्खा सिंह ने कहा, " रूकिए! हम भी ख़ुदा के बंदे हैं." मौलवी रूके और उन्होने मिल्खा सिंह से कहा, "ख़ुदा आपको भी ताक़त दे."

भूल नहीं सकते

मिल्खा सिंह कहते हैं वो इस बात को कभी नहीं भूल सकते.

और उसके बाद मिल्खा सिंह ने अब्दुल खालिद को पीछे छोडते हुए रेस जीत ली. उस रेस को पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति जनरल अयूब खान भी देख रहे थे.

उन्होने मिल्खा सिंह के गले में मेडल डालते हुए पंजाबी में कहा,"मिल्खा सिंह जी, तुस्सी पाकिस्तान दे विच आके दौडे नइ, तुस्सी पाकिस्तान दे विच उड़े ओ, आज पाकिस्तान तौन्नू फ्लाइंग सिख दा ख़िताब देंदा ए."

इसके बाद मिल्खा सिंह ने अपनी यादों को इस बात से पूरा किया- यह जो फ्लाइंग सिख का ख़िताब सारी दुनिया में मशहूर हुआ, उसका सारा श्रेय पाकिस्तान और जनरल अयूब को जाता हैं.

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