बाजार के धमाकों की गूंज में मंद पड़ गई आवाज़

 सोमवार, 12 नवंबर, 2012 को 08:26 IST तक के समाचार

शोरगरों के पास हुनर तो है, मगर बाजार का कौशल नहीं.

राजस्थान में राजा-महाराजाओं के दौर में दिवाली जैसे त्योहारों के लिए आतिशबाजी का काम करने वाले शोरगर अब बाजार में टिक नहीं पा रहे हैं.

जयपुर में अब गिने-चुने शोरगर मुस्लिम परिवार ही अपने इस पारम्परिक काम से जुड़े हुए हैं. कभी वो अफ़ग़ानिस्तान से इस हुनर को लेकर जयपुर आए और रजवाड़ों के संरक्षण में अपने इस हुनर को बहुत ऊंचाई तक ले गए.

मगर अब दक्षिण भारत से आए पटाखों और आतिशी सामग्री ने बाजार पर कब्जा कर लिया है. दिवाली के धमाकों की गूंज और आकाश में रौशनी की रेखा खींचती आतिशबाजी की सामग्री में शिवकाशी का वर्चस्व है.

यूँ जयपुर के शोरगर पुरखों से मिले अपने हुनर को अब भी सीने से लगाए बैठे हैं. लेकिन एक बुजुर्ग शोरगर हाजी शाहाबुदीन मायूसी के साथ कहते हैं कि अब पुरखों से मिली ये कला लड़खड़ा रही है. वे कहते हैं कि समय के साथ सब बदल गया है, अब हमारे काम की कद्र नहीं है.

गुज़रे ज़माने की बात

शाहाबुदीन ने अपने सामने पसरी आतिशबाजी की सामग्री को निहारा और कहा, ''अंग्रेजी माल ने हमारे काम को बहुत नुकसान पहुंचाया है. क्वालिटी में बड़ा फर्क है, हमारे माल को देखकर ही आज क्वालिटी बनती है. अब बहुत जोखिम भरा काम है, पाबंदियां भी बहुत हैं.''

शाहाबुदीन कहते हैं कि पहले शोरगरों के 250 परिवार इस काम से जुड़े थे, अब पांच-सात परिवार ही इस काम में रहे गए हैं. शाहाबुदीन के चार बेटे हैं, मगर अब उन्हें लगता है कि इस बाजार में उनके लिए जगह बहुत ही कम रह गई है.

वे कहते हैं, ''पहले हमें बारह महीने काम मिलता था. राजा-महाराजा भी समारोहों में बुलाते थे. हम अपनी कला का जलवा बिखेरते और हमें इनाम-इकराम मिलते, अब वो गुजरे ज़माने की बात है, पहले सिर्फ हमारी बिरादरी के लोग इस हुनर में थे, हमारी बिरादरी की पहले 60 दुकानें थीं, अब चार रह गई हैं.

"पहले हमें बारह महीने काम मिलता था. राजा-महाराजा भी समारोहों में बुलाते थे. हम अपनी कला का जलवा बिखेरते और हमें इनाम-इकराम मिलते, अब वो गुजरे ज़माने की बात है, पहले सिर्फ हमारी बिरादरी के लोग इस हुनर में थे, हमारी बिरादरी की पहले 60 दुकानें थीं, अब चार रह गई हैं."

शाहाबुदीन

शोरगर पहले जयपुर की पुरानी राजधानी आमेर में आबाद थे, अब वहां शोरगरों की बस्ती में गिने-चुने लोग ही रह गए हैं. ज़हीर अहमद एक सिद्धहस्त शोरगर हैं. जयपुर में हवा महल के निकट पटाखों के बाज़ार में उनकी भी एक दुकान है जो इस परम्परा की गवाह बनी हुई है.

वे इतिहास में झाँक कर कहते हैं, ''जयपुर में शोरगरों का काम कोई 300 साल पुराना है. हम शोरगर हैं, हम लोग अफ़ग़ानिस्तान से आए थे. राजा मानसिंह के समय हमें आमेर में बसाया गया, फिर समय के साथ जयपुर में आ बसे.

ज़हीर कहते है कि पहले कलात्मक पटाखों में दम होता था, उनके धमाकों की मियाद ज्यादा थी, उनके रंगों की चमक ज्यादा होती थी, देशी पटाखों की आवाज तीखी होती थी.

वो कहते हैं कि अब चमक-दमक है पटाखे रंग-बिरंगे पैकेट में आने लगे हैं, मगर उनके धमाकों में जान नहीं होती है. पहले रौशनी वाले पटाखे ज्यादा पसंद किए जाते थे, आवाज वाले नहीं, अब आवाज ज्यादा की जाती है.

जयपुर में पटाखों की सैंकड़ों दुकानें हैं. उनमें से एक दुकानदार संदीप मित्तल कहते हैं, ''वैसे लोग पुराने शोरगरों के पटाखे पसंद तो करते हैं, मगर जब कीमत का सवाल आता है, शिवकाशी के पटाखे बाजी मार ले जाते हैं.''

वे कहते हैं, ''शोरगर का पटाखा 500 रूपए में मिल रहा है तो शिवकाशी का पटाखा 100 रूपये में ही मिल जाता है, फिर लोग दाम देखते है, क्वालिटी नहीं.''

वे कहते हैं कि शोरगर संगठित नहीं, बिखरे हैं, जो प्रचार नहीं कर पाते, जो खुद को बाजार के हिसाब से ढाल नहीं पाए हैं. शोरगर का माल हाथ से बना है, सामने मुकाबले में मशीन है, ऐसे में शोरगर के लिए बड़ी मुश्किल है.

आबिद ने ये कला अपने पुरखों से सीखी है. दिवाली हिन्दुओं का त्योहार है जबकि मुस्लिम बिरादरी के शोरगर इसमें भाईचारे का रंग भरते हैं. आबिद कहते हैं कि उन्हें इस काम में बहुत सुकून मिलता है.

शोरगर एक परम्परा, एक हुनर है, लेकिन शिवकाशी एक मजबूत बाजार है. अब गोया बाजार के धमाकों की गूंज में शोरगरो की आवाज मंद पड़ गई है क्योंकि शोरगरों के पास हुनर तो है, मगर बाजार का कौशल नहीं.

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