बाल ठाकरे: कार्टूनिस्ट से शिवसेना प्रमुख तक

  • 17 नवंबर 2012
बाल ठाकरे

लगभग 46 साल तक सार्वजनिक जीवन में रहे शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे ने कभी न तो कोई चुनाव लड़ा और न ही कोई राजनीतिक पद स्वीकार किया.

यहां तक कि उन्हें विधिवत रूप से कभी शिवसेना का अध्यक्ष भी नहीं चुना गया था. लेकिन इन सब के बावजूद महाराष्ट्र की राजनीति और ख़ासकर इसकी राजधानी मुंबई में उनका ख़ासा प्रभाव था.

उनका राजनीतिक सफ़र भी बड़ा अनोखा था. वो एक पेशेवर कार्टूनिस्ट थे और शहर के एक अख़बार फ़्री प्रेस जर्नल में काम करते थे.

बाद में उन्होंने नौकरी छोड़ दी और मराठी बोलने वाले स्थानीय लोगों को नौकरियों में तरजीह दिए जाने की मांग को लेकर आंदोलन शुरू कर दिया.

हिंसक आंदोलन

मुंबई (उस समय मुंबई को बम्बई कहा जाता था) स्थित कंपनियों को उन्होंने निशाना बनाया था लेकिन दरअसल उनका ये अभियान मुंबई में रह रहे दक्षिण भारतीयों के ख़िलाफ़ था क्योंकि शिवसेना के अनुसार जो नौकरियां मराठियों की हो सकती थी उन पर दक्षिण भारतीयों का क़ब्ज़ा था.

दक्षिण भारतीयों के व्यवसाय, संपत्ति को निशाना बनाया गया और धीरे-धीरे मराठी युवा शिवसेना में शामिल होने लगे.

बाल ठाकरे ने अपनी पार्टी का नाम शिवसेना 17वीं सदी के एक जाने माने मराठा राजा शिवाजी के नाम पर रखा था. शिवाजी मुग़लों के खिलाफ लड़े थे.

बाल ठाकरे ने ज़मीनी स्तर पर अपनी पार्टी का संगठन बनाने के लिए हिंसा का सहारा लेना शुरू कर दिया.

Image caption मराठी भावनाओं के सहारे बाल ठाकरे ने राजनीति की सीढियां चढ़ी.

राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों, आप्रवासियों और यहां तक कि मीडियाकर्मियों पर शिवसैनिकों के हमले आम बात हो गई थी.

धीरे-धीरे मुंबई के हर इलाक़े में स्थानीय दबंग युवा शिवसेना में शामिल होने लगे. एक गॉडफॉदर की तरह बाल ठाकरे हर झगड़े सुलझाने लगे.

लोगों को नौकरियां दिलवाने लगे और उन्होंने आदेश दे दिए कि हर मामले में उनकी राय ली जाए. यहां तक की फ़िल्मों के रिलीज़ में भी उनकी मनमानी चलने लगी.

धीरे धीरे बढ़ी ताकत

बाल ठाकरे के जीवन से जुड़ी कई कल्पित कहानियां प्रचलित होने लगीं.

कहा गया कि वो जर्मनी के पूर्व तानाशाह हिटलर के प्रशंसक हैं. एक पत्रिका में उनके हवाले से ये ख़बर दी गई थी लेकिन उन्होंने न तो इसकी पुष्टि की और न ही इसका खंडन किया.

धीरे-धीरे मुंबई म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन के चुनाव में उनकी पार्टी का प्रदर्शन बेहतर होने लगा लेकिन अभी भी पार्टी को बड़ी राजनीतिक कामयाबी नहीं मिल पा रही थी.

शिवसेना का प्रभाव मुंबई और इसके आस-पास के इलाक़ों तक ही सीमित है और राज्य के दूसरे इलाक़ों में पार्टी का कुछ ख़ास असर नहीं है.

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि शुरूआती दौर में सत्ताधारी कांग्रेस ने शिवसेना को या तो नज़रअंदाज़ किया या फिर कई मामलों में तो वामपंथियों जैसे अपने राजनीतिक विरोधियों को समाप्त करने के लिए शिवसेना को प्रोत्साहित किया.

लेकिन 80 के दशक के दौरान शिवसेना एक बड़ी राजनीतिक शक्ति बन गई थी जो राज्य में सत्ता हासिल करने के लिए अपनी दावेदारी पेश कर रही थी.

Image caption आम तौर पर शिवसेना का प्रभाव महाराष्ट्र तक ही सीमित है

इस दौरान बाल ठाकरे ने दक्षिणपंथी वोटरों को लुभाने के लिए हिंदुत्व का दामन थाम लिया.

सत्ता तक पहुंच

1992 में उत्तर प्रदेश के अयोध्या में बाबरी मस्जिद के तोड़े जाने के बाद मुंबई में हिंदु और मुसलमानों के बीच सांप्रदायिक दंगे हुए जो कई हफ़्तों तक चले.

इन दंगों में शिवसैनिकों भी शामिल रहे, दंगों में कुल 900 लोग मारे गए थे. सैंकड़ों लोगों ने दंगों के बाद मुंबई छोड़ दी और फिर कभी लौट कर नहीं आए.

सिर्फ़ तीन साल के बाद शिवसेना और भारतीय जनता पार्टी मिलकर राज्य में अपनी सरकार बनाने में सफल हो गए. बाल ठाकरे ने अपने एक बहुत ही क़रीबी नेता को मुख्यमंत्री बनाया और सत्ता की चाबी ख़ुद अपने पास रखी.

पिछले एक दशक में शिवसेना का अभियान उत्तर भारत से मुंबई आए आप्रवासियों और धार्मिक अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ हो गया.

अच्छे वक्ता

ठाकरे एक अच्छे वक्ता थे और लोगों को अपनी मज़ेदार बातों से ख़ूब आकर्षित करते थे.

मुंबई के शिवाजी पार्क में दशहरा के अवसर हर साल होने वाले उनके भाषण का उनके समर्थकों को ख़ूब इंतज़ार रहता था.

इस साल वो ख़राब स्वास्थ के कारण शिवाजी पार्क तो नहीं जा सके लेकिन अपने समर्थकों के लिए उन्होंने वीडियो रिकॉर्डेड संदेश भेजा जिसमें उन्होंने अपने चाहने वालों से अपील की थी कि वे उनके पुत्र और शिवसेना के कार्यकारी अध्यक्ष उद्धव ठाकरे को उतना ही प्यार और सम्मान दें जितना उन्होंने बाल ठाकरे को दिया था.

एक कार्टूनिस्ट के तौर पर बाल ठाकरे ब्रितानी कार्टूनिस्ट डेविड लो को बहुत पसंद करते थे. दूसरे विश्व युद्ध पर डेविड लो के कार्टून बहुत लोकप्रिय हुए थे.

Image caption बाल ठाकरे देखते ही देखते महाराष्ट्र में दक्षिणपंथी राजनीति का प्रतीक बन गए

हाल के दिनों तक ठाकरे अपनी मराठी साप्ताहिक मार्मिक के लिए ख़ुद कार्टून बनाते थे.

असली वारिस कौन

इतने शक्तिशाली नेता होने के बावजूद बाल ठाकरे अपने साथियों को जोड़कर नहीं रख सके. उनके बहुत से क़रीबी सहयोगी उनका साथ छोड़कर चले गए.

ख़ुद बाल ठाकरे के भतीजे राज ठाकरे ने पार्टी छोड़ दी क्योंकि बाल ठाकरे ने अपने पुत्र उद्धव ठाकरे को अपना वारिस नियुक्त कर दिया था.

हाल के दिनों में दोनों ठाकरे बंधुओं के कुछ क़रीब आने की ख़बरें आती रहीं हैं और ये अंदाज़ा भी लगाया जाने लगा कि राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे में चुनावी तालमेल भी हो सकता है लेकिन राज ठाकरे अपनी पार्टी को भंग नहीं करेंगे.

बाल ठाकरे की सबसे बड़ी विरासत होगी मराठी भावना को पार्टी के साथ जोड़ना और उसे वोट में तब्दील करना लेकिन राजनीतिक लाभ के लिए हिंसा इस्तेमाल करने के बाल ठाकरे के तौर तरीक़ो की उस छवि को समाप्त करना उनकी पार्टी के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी.

उन्होंने कभी इसके लिए माफ़ी नहीं मांगी, बल्कि इसकी प्रशंसा की. लेकिन उनके पुत्र उद्धव ठाकरे ने हाल के कुछ वर्षों में अपने पिता की तुलना में अपने तेवर में कुछ नरमी दिखाने की कोशिश की है.

लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये है कि बाल ठाकरे का असल राजनीतिक वारिस कौन होगा और मराठी भाषियों का समर्थन किसे मिलेगा.

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