क्या कहता है भारत-चीन का रिश्ता

 गुरुवार, 15 नवंबर, 2012 को 08:09 IST तक के समाचार

आने वाले दिनों में कैसे होंगे भारत-चीन के रिश्ते?

चीन में नए नेता कमान संभालने वाले हैं और इस बीच एक बार फिर भारत-चीन के रिश्तों को लेकर सुगबुगाहट शुरू हो गई है.

हालांकि, दोनों देशों के रिश्तों में उतार-चढ़ाव का दौर हमेशा ही रहा है और ख़ास तौर से 1962 के युद्ध के बाद. वरना 1950 तक तो भारत-चीन के बीच रिश्तों की गरमाहट दुनिया जानती थी.

एक तरह से उस वक्त भारत चीन का वो हमसफर था जो पाकिस्तान से भी ज्यादा क़रीब था. ये वो वक्त था जब भारत को चीन की कम्युनिस्ट सत्ता के खिलाफ खड़े होना तक गंवारा नहीं था जबकि पाकिस्तान अमरीका की अगुवाई वाले संगठन सीएटो (एसइएटीओ) में शामिल हो गया था.

लेकिन, 1962 के युद्ध ने दोनों देशों के रिश्ते में खटास ला दी, शायद यहीं से दोनों राष्ट्रों के बीच अविश्वास का सिलसिला शुरू हुआ. भारत को भी अपनी रणनीति में बदलाव की दरकार महसूस हुई.

दोनों एशियाई मुल्कों के बीच जो सौहार्द्र था वो तो ख़त्म हुआ और तमाम रिश्ते ठंडे बस्ते में चले गए.

संबंध

संबंधों में सुधार की हल्की सी किरण 1988 में दिखी, जब भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी चीन के दौरे पर गए.

इसके बाद दोनों देशों के रिश्तों में बदलाव आए, नीतियों में बदलाव हुए और व्यापारिक स्तर पर संबंधों में प्रगाढ़ता दिखने लगी. लेकिन जो नहीं खत्म हुआ वो दोनों देशों के बीच बनी खाई थी.

इस खाई को पाटना एक लिहाज से आज तक संभव नहीं हो सका है.

जबकि, आज भारत-चीन के बीच करीब 80 अरब डॉलर का व्यापार है और आने वाले दिनों में इसके 100 अरब डॉलर होने की उम्मीद भी जताई जा रही है.

जलवायु परिवर्तन को लेकर भी दोनों देश बहु-आयामी पहल करते नजर आते हैं. भारत और चीन एक साथ ‘जी-20’ और ‘ब्रिक्स’ जैसे समूह के सदस्य भी हैं और इन मंचों पर विशेष तौर से उभरती अर्थव्यवस्था को लेकर काफी सजग दिखाई देते हैं.

दोनों देश अंतरराष्ट्रीय आर्थिक संरचना में संशोधन की अगुआई के साथ बहुपक्षीय पहल में भी सहयोग कर रहे हैं.

कूटनीति

लेकिन, कूटनीतिक स्तर पर दोनों देशों के बीच अविश्वास और प्रतिस्पर्धा का रुख कायम है. भारत ने खुद को व्यापक राष्ट्रीय शक्ति के तौर पर विकसित किया है जबकि चीन ने अपना ढांचा दूसरे राष्ट्रों की प्रतिस्पर्धा को समझने के लिहाज से.

चीन से रिश्ते सुधरने की उम्मीद

चीन 'जी-20' का सदस्य है और उसकी प्रतिस्पर्धा अमरीका से है, एक ऐसा देश जो हर क्षेत्र में खुद को आगे देखता है.

कई स्तर पर भारत, चीन को लेकर भय की स्थिति में भी है. चीन पाकिस्तान को सहोयग करता है जो अपने आप में भारत के लिए एक बड़े संशय का कारण है. जबकि चीन से लगने वाली भारतीय सीमाओं को लेकर चीन का जो रवैया रहा है वो भी भारत को चैन की सांस लेने नहीं देता.

यहां तक कि ‘सॉफ्ट पावर’ के स्तर पर भी दोनों देशों के रिश्ते उतने प्रगाढ़ नहीं है और ये नेहरू और माओ के वक्त से ही चला आ रहा है. दोनों देशों के बीच ‘स्टेटस’ का टकराव शुरू से रहा है.

दोनों देशों का राजनीतिक ढांचा भी काफी अलग है. चीन में एक पार्टी की सत्ता है और पार्टी की तरफ से चुना गया नेता राष्ट्र प्रमुख होता है. चीन जहां ‘लोकतंत्र’ को सिरे से नकारता हैं वहीं भारत लोकतांत्रिक देश भी हैं और इसका जबरदस्त हिमायती भी.

लेकिन दोनों देश एकता में विश्वास रखते हैं और कहीं ना कहीं विकास और सर्वोच्च शक्ति के तौर पर उभरने के लिए उतावले भी दिखते हैं.

चीन का अड़ियल रवैया

चीन पहले से ही जापान और पूर्वी एशियाई देशों की सीमाओं को लेकर आक्रामक हक जमाता रहा है और साथ ही भारत को भी ये इस लपेटे में लेता रहा है. अरुणाचल प्रदेश को लेकर भारत के दावे पर सवाल उठाने का चीन ने शायद ही कोई मौका गंवाया हो.

चीन की कम्युनिस्ट पार्टी महा-शक्तिशाली बनने के लिए दुनिया भर में राष्ट्रवाद का उपदेश देता है, लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि आने वाले समय में दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी शक्ति के तौर पर उभर रहा चीन वापस माओवाद की तरफ झुक जाए.

भारत राष्ट्रवादी देश है और अंतराष्ट्रीय मानचित्र पर खुद को एक शक्तिशाली देश के तौर पर उभरता हुआ देखता है ऐसे में चीन, भारत के लिए सबसे बड़ा खतरा साबित सकता है.

राष्ट्रवाद के प्रचार को समझना मुश्किल नहीं है, लेकिन ये खतरनाक है, क्योंकि ये विचारधारा दोनों देशों को विद्वेष की तरफ ढकेल सकती है जो कतई व्यावहारिक नहीं होगा.

हाल में दोनों मुल्कों के बीच 15 से ज्यादा बैठकें हुई हैं जो ये उम्मीद जगाता है कि आने वाले दिनों में इनके बीच के रिश्तों में परिपक्वता आएगी.

दोनों राष्ट्रों के लिए जरूरी है कि वो आंतरिक मसलों पर ध्यान दे और विकास से जुड़े मुद्दों पर काम करे. साथ ही ये भी कि संबंधों को ठीक बनाए रखने के लए बातचीत के तमाम दरवाजे खुले रखे.

भारत और चीन के रिश्ते परवान चढ़े इसके लिए ये भी जरूरी है कि दोनों देश आर्थिक रिश्तों को और मजबूती देने का प्रयास करे और साथ ही हर मसले पर सूझबूझ पूर्ण रवैया अपनाए.

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