भावनाओं से खिलवाड़ करते हैं विज्ञापन?

Image caption बच्चा गोद लेने को समाज में अब भी पूरी तरह से स्वीकार्यता नहीं मिल पाई है.

टेलीवीजन पर जितने कार्यक्रम आते हैं उनसे कहीं ज़्यादा भरमार विज्ञापनों की रहती है. ये विज्ञापन सपने और सुविधाएं बेचते हैं. बेचने का ढंग जुदा होता है.

कुछ विज्ञापन भावनाओं पर वार करते हैं, कुछ सौंदर्य बेचते हैं तो कुछ मस्ती, मज़ाक और व्यंग का सहारा लेते हैं. पर उत्पाद बेचने की होड़ में क्या कुछ विज्ञापन संवेदनशीलता की लकीर को पार कर जाते हैं?

आपको मिलवाते हैं दो साल की मीरा से. वो किसी भी आम बच्ची की तरह है. अठखेलियाँ करती, कभी हंसती कभी रोती. अपनी मासूमियत से सबका दिल जीतती. मीरा को उनके माता-पिता ने एक साल पहले गोद लिया था.

गोद लेने से जुड़े मामलों की संवेदनशीलता को मीरा के पिता अर्जुन हरदास बखूबी समझते हैं. यही वजह है कि इन दिनों दिखाया जा रहा रिलायंस कम्युनिकेशन का विज्ञापन उन्हें नागवार गुज़रा है.

बच्चों पर असर

आपमें से कइयों ने टीवी पर ये विज्ञापन देखा होगा. विज्ञापन में दिखाया गया है कि एक मोबाइल कंपनी परिवार के सभी सदस्यों को एक ही बिल देने की सुविधा दे रही है.

लेकिन इश्तिहार में बहन मज़ाक में अपने छोटे भाई से कहती है कि तुम इस परिवार का हिस्सा नहीं हो क्योंकि 'तुम मां को मंदिर की सीढ़ियों से मिले थे'.

इश्तिहार में बहन के रूप में बॉलीवुड अदाकारा अनुष्का शर्मा नज़र आती हैं.

अर्जुन को इस विज्ञापन पर ऐतराज़ है और उन्होंने एडवर्टाइज़िंग स्टैंडर्ड्स काउंसिल ऑफ इंडिया में शिकायत दर्ज कराई है. ये वो संस्था है जो विज्ञापनों पर नज़र रखती है.

अर्जुन की शिकायत है, “इस विज्ञापन में कहा गया है कि चूँकि तुम्हें गोद लिया गया है इसलिए तुम परिवार का हिस्सा नहीं हो. मैं समझ सकता हूँ कि विज्ञापन में मज़ाक का सहारा लिया गया है. आप-हम आम ज़िंदगी में भी इस तरह का मज़ाक करते हैं कि तुम्हारी शक्ल सूरत परिवार वालों से अलग है तुम तो गोद लिए हुए हो. लेकिन ये कहना कि गोद लेने के कारण तुम परिवार का हिस्सा ही नहीं हो मुझे इस पर आपत्ति है. ऐसा कहना असंवेदनशीलता है.”

वे कहते हैं, “कल को मेरी बेटी बड़ी होगी और इस तरह का विज्ञापन देखेगी तो इसके मन में यही भावना आएगी कि चूंकि मेरे माता-पिता ने मुझे गोद लिया है इसलिए मैं भी इस परिवार का हिस्सा नहीं हूँ. मैं उससे कभी छिपाऊंगा नहीं कि हमने उसे गोद लिया है लेकिन उस पर ऐसी बातों का गहरा असर हो सकता है भले ही आम बच्चों पर इसका शायद कम असर हो.”

अर्जुन ने इस मामले में और कई ऐसे लोगों से बात की है जिन्होंने बच्चे गोद लिए हैं.

संवेदनशीलता की कमी

Image caption भारत में टीवी पहुंच का दायरा लगातार बढ़ रहा है

रिलायंस कम्युनिकेशन ने इस मुद्दे पर बीबीसी को लिखित वक्तव्य भेजा है जिसमें कहा गया है, "रिलायंस अपने सभी उत्पादों के विज्ञापनों में उपभोक्ताओं की संवेदनशीलता का ध्यान रखता है. जिस विज्ञापन की यहां बात की गई है वो हमारे उत्पाद का रचनात्मक चित्रण भर है, ताकि इस पोस्टपेड उत्पाद से परिवार, दोस्त अपना टॉकटाइम शेयर कर सकें. रिलायंस एडवरटाइज़िंग स्डैंर्ड काउंसिल ऑफ इंडिया का सदस्य है. अब तक हमें एएससीआई ने कोई शिकायत आगे नहीं बढ़ाई है."

मनोवैज्ञानिक मामलों की जानकार लुबना भी मानती हैं कि विज्ञापन असंवेदनशील हैं और बच्चा गोद लेने को अब भी बहुत से परिवारों में स्वीकार नहीं किया जाता.

उनका कहना है, “मैं इसे मानसिक बाधा कहूँगी. गोद लेने से जुड़े मुद्दों को लेकर समाज में उतनी संवेदनशीलता नहीं आई है. ये विज्ञापन भी यही दर्शाता है. बच्चे जब बड़े हो रहे होते हैं तो अपनी पहचान को लेकर उनके मन में कई सवाल होते हैं. इस तरह का विज्ञापन गोद लिए बच्चों के मन में कई तरह का सवाल खड़ा कर सकता है.”

क्या वाकई ऐसे विज्ञापन असंवेदनशील होते हैं या लोगों को इन्हें सही संदर्भ में लेते हुए देखना चाहिए. क्या विज्ञापनों को सामाजिक दायित्वों का ख्याल रखना चाहिए?

एडवर्टाइज़िंग स्टैंडर्ड्स काउंसिल ऑफ इंडिया या एएससीआई में शिकायत दर्ज कराने के बावजूद अर्जुन को कोई जवाब नहीं मिला. हमने भी दो हफ्तों तक उनके दफ्तर में फोन किए और ईमेल की. अंतत जब एएससीआई के अध्यक्ष से बात हुई तो उन्हें पता ही नहीं था कि ऐसी शिकायत दर्ज की गई है.

रचनात्मकता का दायरा

विज्ञापन जगत की वरिष्ठ हस्ती प्रहलाद कक्कड़ से हमने जब प्रतिक्रिया माँगी तो वे नाराज़ नज़र आए.

उनका कहना था, “ये हो क्या गया है मीडिया को और लोगों को. हर चीज़ से भावना आहत हो जाती है. हम एक दूसरे को लेकर इतना असहनशील हो गए हैं कि कुछ भी बोलो तो सामने वाले को बुरा लग जाता है. कभी किसी फिल्म से लोगों की भावनाएँ आहत हो जाती हैं कभी विज्ञापन से. अगर ऐसे ही चलता रहा तो हमारा रहना मुश्किल हो जाएगा.”

विज्ञापन सपने बेचते हैं और लोग उन्हें खरीदते हैं. बेचने का काम काफी रचनात्मक तरीके से करने की कोशिश होती है. कई विज्ञापन वाकई बहुत क्रिएटिव, व्यंग्यात्मक और बेहतरीन होते हैं.

ये किसी विज्ञापन विशेष की बात नहीं है बल्कि उपभोक्तावाद और बाज़ारवाद के ज़माने में भी भावनाओं को ठेस न पहुँचाने की बात है- फिर भावनाएँ चाहे समाज के एक छोटे से वर्ग की क्यों न हो.

संबंधित समाचार