ओबामा ने बर्मा में उठाया रोहिंग्याओं का मुद्दा

बर्मा में ओबामा
Image caption बर्मा को हर संभव मदद का वादा किया

अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अपने बर्मा दौरे में वहां जारी सुधारों की प्रक्रिया का खुले दिल से स्वागत किया और रोहिंग्या मुसलमानों का मुद्दा भी उठाया है.

ओबामा ने बर्मा के राष्ट्रपति थीन सीन की तरफ दोस्ती और सहयोग का हाथ बढ़ाया है.

ये न सिर्फ किसी अमरीकी राष्ट्रपति का पहला बर्मा दौरा है, बल्कि इस बात का एक और पुख्ता सबूत है कि दशकों तक अलग थलग पड़े रहे बर्मा की विश्व समुदाय में तेजी से वापसी हो रही है.

इसका श्रेय वहां सुधारों की प्रक्रिया को जाता है.

राष्ट्रपति ओबामा ने कहा, “हमारी चर्चा का मुख्य लक्ष्य यही रहा कि लोकतंत्र की प्रक्रिया चलती रहे. इसमें विश्वसनीय सरकारी संस्थानों का निर्माण, कानून का राज स्थापित करना और जातीय हिंसा को रोक कर ये सुनिश्चित करना भी शामिल है कि लोगों को शिक्षा, स्वास्थ और आर्थिक अवसर मिलें.”

सुधारों का समर्थन

सैन्य शासन की समाप्ति के बाद 2010 में राष्ट्रपति थीन सीन की सरकार ने सुधारों की दिशा में अहम कदम उठाए हैं. छह घंटे के अपने बर्मा दौरे में ओबामा ने लोकतंत्र समर्थन नेता आंग सान सू ची से भी मुलाकात की.

लेकिन इस दौरे की खास बात रही रंगून यूनिवर्सिटी में दिया गया उनका भाषण.

ओबामा ने अपने भाषण में ओबामा ने ना सिर्फ बर्मा के पुनर्निर्माण में हर तरह की मदद का वादा किया, बल्कि बर्मा के पश्चिमी रखाइन प्रांत में मुसलमानों और बौद्धों के बीच सांप्रदायिक हिंसा को रोकने की भी अपील की.

ओबामा ने कहा, “सुधार की कोई भी प्रक्रिया राष्ट्रीय मेलमिलाप के बिना पूरी हो नहीं हो सकती है. बिल्कुल नहीं. आपके पास मौका है कि संघर्षविराम को समझौते में तब्दील कर दिया जाए और जिन क्षेत्रों में अब भी संकट है वहां, शांति कायम करने के प्रयास हों.”

'पश्चिम डाले दबाव'

Image caption बर्मा में रोहिंग्या लोगों को बाहरी समझा जाता है

इस हिंसा के कारण एक लाख से ज्यादा लोग बेघर हुए हैं, जिनमें ज्यादातर रोहिंग्या मुसलमान हैं. बर्मा रोहिग्या लोगों को अपना नागरिक नहीं समझता है.

बर्मा की इस्लामिक मामलों की परिषद के प्रमुख हाजी मुआंग थान इस बारे में सरकार की तरफ से उठाए जा रहे कदमों को नाकाफी बताते हैं.

बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, “सरकार जो भी कर रही वो सब दिखावे के लिए है. जमीनी स्तर पर कुछ नहीं बदला है. समंदर में नौकाओं पर कई लोग बीमार हैं, उन्हें इलाज नहीं मिल रहा है और इलाज कराने वो जमीन पर आ भी नहीं सकते. यहां तक कि बर्मा में दूतावासों के कर्मचारी उन इलाकों में नहीं जा सकते जहां, शरणार्थी रह रहे हैं.”

थान का कहना है कि पश्चिमी देशों की तरफ से दबाव डालने से स्थिति में कुछ सुधार हो सकता है.

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