शासन के सातवें साल में विफलताएँ गिनाने का मतलब?

  • 25 नवंबर 2012
नीतीश कुमार
Image caption नीतीश कुमार का दावा है कि बिहार के विकास मॉडल की सब तारीफ कर रहे हैं

बहुत अच्छी बात है कि कोई राजनेता ये कहे कि वो अपने वायदे के अनुसार काम नहीं कर पाएगा तो वोट माँगने नहीं जाएगा.

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने दूसरे कार्यकाल में अपनी सरकार की दूसरी वर्षगांठ पर सरकार का रिपोर्ट कार्ड पेश करते हुए बहुत ही दिलचस्प बयान दिया है.

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा है कि बिहार में अगर बिजली की स्थिति नहीं सुधरी तो वो लोगों के पास वोट माँगने नहीं जाएँगे.

लेकिन क्या भारत के राजनीतिक इतिहास में बीते 60-65 साल में ऐसा देखने को मिला है?

क्या कहा बिजली के मुद्दे पर नीतीश कुमार ने?

कम से कम मुझे तो नहीं मिला है. तो मोटे तौर पर तो ये बयान कोरी लफ्फाजी ही लगता है....

अच्छी बात है कि नीतीश कुमार आत्मालोचना के स्वर में बोल रहे हैं, चाहे वो आलोचना को खुद भी बहुत बर्दाश्त नहीं करते हैं.

'शासन के सातवें साल में विफलता गिनाई'

जनता ने नीतीश कुमार को भारी बहुमत दिया था. उन्होंने शासन का सातवाँ साल पूरा किया है लेकिन अभी तक जनता की अपेक्षा के अनुरूप उन्होंने काम नहीं किया है.

यदि उन्हें लगता है कि बिजली इतनी महत्वपूर्ण है कि पूरा विकास उसकी वजह से रुका हुआ है, तो सवाल उठता है कि सात साल में उन्होंने किया क्या?

ये बात अलग है कि काँटी और कलगाव के पॉवर स्टेशनों का सुधार किया गया है जिससे बिजली उत्पादन कुछ बढ़ा है. लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं है कि बिहार की एक बड़ी आबादी आज भी लालटेन युग में रहने को मजबूर है.

सवाल ये है कि जिन लोगों को करना है, वही अपनी विफलताएं गिना रहे हैं तो इसका यही मतलब हुआ कि ये लोग सफलता की सीढ़ी चढ़ना नहीं जानते.

नीतीश कुमार से सभी समर्थकों के साथ-साथ बिहार के हर समुदाय के लोगों को उनसे बड़ी अपेक्षाएं थीं, लेकिन अनेक लोगों को बेहद निराशा हुई है.

जहां तक इंफ्रास्ट्रक्चर की बात है तो सड़कों वगैरह में कुछ सुधार जरूर हुआ है.

हालाँकि इस क्षेत्र में भी सुधार इतना नहीं जितना कि होना चाहिए. राजधानी पटना तक की स्थिति हम देख सकते हैं कि बाँस और लकड़ी के पुल बने हैं जो कुछ लोगों के चढ़ने पर ही ध्वस्त हो जाते हैं और बड़ी दुर्घटना हो जाती है.

यही हालत स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे क्षेत्रों का भी है.

हाँ, एक बात जरूर है कि जो प्रवासी मजदूर बिहार से बाहर जाते थे, उनकी संख्या में जरूर कमी आई है.

इसके पीछे सबसे बड़ी वजह महात्मा गांधी ग्रामीण विकास योजना - मनरेगा में लोगों को अपने ही राज्य में काम मिलना है. और मनरेगा केंद्र सरकार की योजना है.

बिहार की समस्याओं का समाधान तब होगा जब बिहार में बड़े पैमाने पर भूमि सुधार लागू किए जाएँगे, जिसके लिए डी बंद्योपाध्याय कमेटी बनाई गई थी और जिसे सरकार ने ठंडे बस्ते में डाल रखा है.

(बीबीसी पत्रकार पवन नारा के साथ बातचीत पर आधारित)

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