काश ...मुंबई हमला न हुआ होता

  • 26 नवंबर 2012
Image caption मुंबई हमलों में ताज़ होटल को सबसे अधिक नुकसान पहुंचा था.

जलता हुआ ताज होटल, ओबेरॉय होटल की खिड़की के टूटते कांच की आवाज़ें और छत्रपति शिवाज़ी टर्मिनल पर खून साफ करते कर्मचारी.

यही सब याद आता है जब मुंबई हमलों के बारे में सोचता हूं तो. चार साल बाद भी ये तस्वीरें ज़ेहन में सहसा घूम जाती हैं.

27 नवंबर की सुबह पहली फ्लाइट से दिल्ली से मुंबई पहुंचा तो सड़कें सुनसान लग रही थीं. ताज होटल के पास (जहां मुठभेड़ जारी थी) भीड़ कम थी.

बहुत अटपटा सा लग रहा था. ताज होटल से रह रहकर गोलियों की आवाज़ों के बीच एक बड़ी घटना को कवर करने का उत्साह जैसा कुछ नहीं था.

थोड़ा डर, थोड़ी बेचैनी और बदहवासी थी कि आगे क्या होगा. लेकिन फिर ताज से नरीमन हाउस और नरीमन हाउस से ओबेरॉय के चक्कर लगाते-लगाते पता नहीं चला कि कैसे साठ घंटे बीत गए.

आखिरी कुछ घंटों में जब ताज होटल के हमलावर मारे गए तो एक आग बुझाने वाला मेरे पास आया और बोला ये देखिए ये था वो चरमपंथी.

उसके मोबाइल पर चरमपंथी का चेहरा दिख रहा था. वो फोटो कहीं मेरे मोबाइल में आज भी पड़ी होगी. मुझे पता था ये फोटो हम अपनी वेबसाइट पर नहीं लगाएंगे.

कुछ अखबारों में ये फोटो आई भी थी. कपड़े फटे, खून, पीठ के बल लेटा चरमपंथी अभी लिखते समय भी आंखों के आगे घूम जाता है.

मुठभेड़ खत्म हुई तो ताज होटल के पास जाने का मौका मिला. गेटवे ऑफ इंडिया पर कबूतरों की भरमार होती है..मैंने नीचे देखा...कई कबूतर मरे पड़े थे...पुलिस और हमलावरों की गोलियों का निशाना बन चुके ये कबूतर शांति के लिए भी उड़ाए जाते हैं.

जब-जब कबूतरों को देखता हूं तब भी मुंबई का ये हमला याद आ जाता है. इस हमले ने जेहन के किसी कोने में जगह बना ली है जो भुलाए नहीं भूलती है.

चार साल के बाद ताज होटल भी ठीक हो गया है..ओबेरॉय भी...कबूतर भी अपनी जगह है लेकिन मेरे मन का एक कोना कहीं न कहीं अभी भी बेचैन रहता है और कहता है...काश कि ये हमला न हुआ होता....

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