बिहार दिखा रहा है पेड़ों को बचाने का रास्ता

  • 28 नवंबर 2012

बिहार में कलाकार पेड़ों को कटने से बचाने और पर्यावरण की रक्षा के लिए इन पर हिंदू देवी देवताओं के चित्र उकेर रहे हैं.

कलाकार इसके लिए प्राचीन मधुबनी पेंटिग का इस्तेमाल कर रहे हैं. ये कलाकार पेड़ के तने को रंगीन चित्रों से सज़ा देते हैं.

16वीं सदी की इस कला में आम तौर पर कृष्ण, राधा, दुर्गा और सरस्वती जैसे हिंदू देवी-देवताओं का चित्रण किया जाता है. इन कलाकारों को उम्मीद है कि देवी-देवताओं के चित्रों के बन जाने के बाद ईश्वर से डरने वाले लोग पेड़ों को नही काटेंगे.

जैसे ही आप मधुबनी जिले से सटे राष्ट्रीय राजमार्ग 52 पर गुजरेंगे तो आप सौ से ज्यादा पेड़ों को चित्रों से सजा हुआ पाएंगे.

इन पेड़ों में रंग भरने का काम एक दर्जन से ज्यादा कलाकार कर रहे हैं.

अभियान में शामिल एक कलाकार आरती कुमारी का कहना है कि अभी तक चित्रों से सजा एक भी ऐसा पेड़ नहीं काटा गया है.

आरती कुमार पिछले पांच वर्षों से मधुबनी चित्र बना रही हैं. वो इस बात से काफी खुश है कि पर्यावरण की रक्षा के लिए वो पहली बार एक प्रभावी तरीके से कुछ कर रही हैं.

जनजातीय कला

इस अनूठी परियोजना की शुरुआत सितंबर महीने में षष्ठि नाथ झा ने की थी. षष्ठि नाथ झा इलाके में एक स्थानीय गैर-सरकारी संगठन ग्राम विकास परिषद चलाते है.

षष्ठि नाथ झा ने बीबीसी को बताया, "विकास और सड़क विस्तार के नाम पर हर जगह पेड़ों की बलि दी जाती है. गाँव वालों को जलवायु परिवर्तन या फिर पारिस्थितिकी संतुलन के मुद्दों के बारे में जानकारी नही हैं."

बिहार में लगभग सात प्रतिशत से भी कम वनाच्छादित क्षेत्र है.

संसार में मधुबनी चित्रकारी को एक भौगोलिक दर्जा हासिल है क्योंकि यहाँ सदियों से ये कौशल पीढ़ी दर पीढ़ी आगे विकसित होता रहा है, लेकिन सामग्री और शैली काफी हद तक वही बनी रही.

परंपरागत रूप से महिलाएं और लड़कियां पर्वों, विवाह के अवसरों पर दीवारों और फर्श को सजाने के लिए प्राकृतिक रंगों का इस्तेमाल कर धार्मिक और पौराणिक चित्र बनाती हैं.

इन चित्रों की विशेषता- इनकी आँखें मछली की तरह और नाक नुकीली होती है.

झा कहते है, "जब हम मधुबनी जिले के रांती गांव का दौरा किया, तो हमने देखा कि कई पुरुष और महिलाएं एक छोटे से पेड़ के पत्तों पर चित्र बना रहे थे.हमारा संदेश हरित क्षेत्र की रक्षा करने के लिए है."

उन्होंने कहा, "हमने सरकार रेलवे और अन्य संस्थानों से भी अनुरोध किया है कि वो आगे आकर इस अभियान का समर्थन करें"

महंगा अभियान

सृष्ठि नाथ झा कहते हैं कि ये एक महंगा अभियान है.

उनका कहना है, "एक पेड़ पर चित्रकारी करने और इसे जानवरों व अन्य खतरों से बचाने के लिए पेड़ के आकार के हिसाब से दो हज़ार से तीन हज़ार रुपए की ज़रुरत पड़ती है."

लेकिन पारंपरिक मधुबनी पेंटिंग के विपरीत इस अभियान में जुटे कलाकर प्राकृतिक रंगों का इस्तेमाल नहीं करते क्योंकि ये लंबे समय तक नही टिकते.

कलाकार सीमा दास बताती हैं कि वो चूना, गोंद और सिंथेटिक पेंट का इस्तेमाल करती हैं, ताकि ये कम से कम तीन साल तक चले.

ग्रामीणों का मानना है कि अभियान का इस्तेमाल इस क्षेत्र में पर्यटकों को प्रोत्साहित करने के लिए भी किया जा सकता है.

मधुबनी कलाकारों का मानना है कि वो दुनिया को ये दिखा रहे हैं कि कैसे एक कला के जरिए एक प्रभावी तरीके से मजबूत सामाजिक संदेश दिया जा सकता है.

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