और बाबरी मस्जिद का ढांचा गिर चुका था...

 बुधवार, 5 दिसंबर, 2012 को 07:24 IST तक के समाचार

फ़ैज़ाबाद की पैदाइश होने की वजह से बचपन से ही किसी छुट्टी पर हमें फ़ैज़ाबाद और उसके आसपास के ऐतिहासिक जगहों पर घुमाने ले जाया जाता था. इस दौरान आमतौर पर मेरे दादा साथ में होते थे और उनकी ही देखरेख में चलता था खाने-पीने का सामान.

बहू बेगम का मक़बरा, जिस मध्यकालीन इमारत के इर्द-गिर्द ही मुज़फ्फर अली की फ़िल्म 'उमराव जान' को फ़िल्माया गया था.

'गुलाब बाड़ी'- कहते हैं कि जब 18वीं सदी में अवध रियासत के नवाब फ़ैज़ाबाद में रहते थे तो कश्मीर से आई गुलाबों की एक खेप से इस फुलवारी को आबाद किया गया था.

चौक में स्थित तीन दरवाज़ों जिनसे गुज़रने पर शुरू होती थी फ़ैज़ाबाद में अवध की रियासत, अयोध्या में राम की पौड़ी और गुप्तार घाट, दंतकथाओं के मुताबिक़ राम ने यहीं पर जल समाधि ली थी.

अयोध्या स्थित राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद के आसपास का इलाक़ा भी हमारे लिए एक लोकप्रिय स्थान था.

बचपन की यादें

"जब मैं पहली बार इस ढाँचे के भीतर गया तो थोड़े डर के साथ, वजह था अंदर फैला हुआ घुप्प अँधेरा. अंदर घुसते ही आपको एक चबूतरे से नीचे दिखाया जाता था और बताया जाता था की रामलला यहीं पैदा हुए थे. उस जगह को गर्भगृह का नाम दिया गया था."

उस इमारत का ढांचा मुझे आज भी याद आता है. दूर से ही देखने पर एक बड़ा और दो छोटे गुम्बद नज़र आते थे.

इस ढाँचे के इर्द-गिर्द थोड़ी खुली जगह भी थी. पूरे प्रांगण को क़रीब पांच फुट लंबी सलाखों से घेरा गया था. जब मैं पहली बार इस ढाँचे के भीतर गया तो थोड़े डर के साथ, वजह था अंदर फैला हुआ घुप्प अँधेरा.

अंदर घुसते ही आपको एक चबूतरे से नीचे दिखाया जाता था और बताया जाता था की रामलला यहीं पैदा हुए थे. उस जगह को गर्भगृह का नाम दिया गया था.

कम उम्र होने के नाते मुझे और मेरे छोटे भाई को हमेशा इस बात की जिज्ञासा रहती थी कि आख़िर अंदर और क्या-क्या है.

दूर से तो बस एक तख़्त पर स्थापित छोटी सी मूर्ती ही दिखाई पड़ती थी, लेकिन वह जिज्ञासा आज भी बनी हुई है क्योंकि उस तहख़ानेनुमा जगह में कभी जाकर देखने का मौक़ा नहीं मिला.

इमारत की बात करें तो मुझे साफ़ तौर पर याद है कि उस मंदिर या मस्जिद का निर्माण भीतर से देखने पर थोड़ा खटकता ज़रूर था. क्योंकि इमारत का निचला भाग तो बेहद पुराना और जर्जर सा दिखता था जिसमे खंभों पर हनुमान आदि की टूटी हुई प्रतिमाएँ बनी हुईं थीं और दीवारों में टूटे हुए कलश साफ़ देखे जा सकते थे. लेकिन भीतर से ही ऊपर देखने पर जो गुंबद था वो निचले हिस्से से विपरीत थोड़ी बेहतर हालत में दिखाई पड़ता था.

इमारत के निचले हिस्से के निर्माण में फ़र्क़ साफ़तौर पर दिखता था. मैंने अपने जीवन में शायद वह पहली मस्जिद देखी थी जिसके इर्द-गिर्द मीनारें नहीं बनी हुई थीं.

कारसेवकों का कारवाँ

आइए अब चलते हैं 1992 में. उन दिनों मैं लखनऊ में स्कूल जाता था. चूंकि फ़ैज़ाबाद में भी घर था तो गर्मी की छुट्टियों और छमाही परीक्षा ख़त्म होते ही हम दोनों भाई फ़ैज़ाबाद की सैर पर रवाना कर दिए जाते थे.

छोटा शहर होने के नाते तमाम लोग जान-पहचान के थे. उनसे मिलकर क़िस्सागोई में मज़ा तो बचपन से ही आता था. लेकिन 1992 में दिसंबर की छुट्टियाँ मुझे जीवनभर याद रहेंगी, ऐसा कभी सोचा भी नहीं था.

नवंबर के आख़िरी हफ़्ते में जब हम लखनऊ से फ़ैज़ाबाद की 135 किलोमीटर की दूरी अपनी कार से तय कर रहे थे तो रास्ते में राम स्नेही घाट पर क़रीब चार-पांच सौ कथित कार सेवकों को सड़क किनारे बने ढाबों में चाय-नाश्ता करते देख कर थोड़ा चौंका था.

"छह दिसंबर को शाम होते-होते हमें पता चल गया कि राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद का ढांचा गिर चुका है. प्रशासन ने फैज़ाबाद और अयोध्या में कर्फ्यू लगा दिया है. हालांकि अगले सात दिन तक मैंने फ़ैजाबाद में ही बिताए लेकिन कहीं से भी किसी अनहोनी कि खबर नहीं मिली."

आगे भी रास्ते में बसों और ट्रैक्टर-ट्रालियों में भरे माथे पर गेरुए रंग की पट्टी बांधे कारसेवक अयोध्या-फ़ैज़ाबाद की ओर बढ़ रहे थे.

मुझे असल हैरानी तब हुई जब फ़ैज़ाबाद शहर में प्रवेश करते ही वहाँ का माहौल छावनी की तरह नज़र आया. समझते देर नहीं लगी कि मामला अब वाक़ई गंभीर हो चुका है. घर पहुँचने पर पता चला कि शहर में तेवर काफ़ी तीखे हैं. तमाम लोग आने वाले दिनों के लिए राशन-पानी जमा कर रहे थे. कुछ ऐसे भी थे जो कारसेवकों की कथित तौर पर सेवा-टहल में जुटे थे.

ख़ैर, छह दिसंबर आते-आते तमाम हिंदू और मुस्लिम संगठनों के नेता और कार्यकर्ता शहर में पहुँच चुके थे.

छह दिसंबर का दिन

अख़बारों में प्रशासन के दावे रोज़-रोज़ छप रहे थे कि माहौल नियंत्रण में है, चिंता कि कोई बात नहीं. राम जन्मभूमि और बाबरी मस्जिद ढांचे को कोई नुक़सान नहीं पहुँचेगा.

मैं बता दूँ कि छह दिसंबर की सुबह भी हमारे घर दूध देने वही आए जो पिछले 27 सालों से देते आ रहे थे, मजीद चचा. वह भी सात किलोमीटर दूर से साइकिल की सवारी करके.

उस दिन मुझे शहर कि आबोहवा थोड़ी बदली-बदली सी लगी. हालाँकि हमें घर से बहार न निकलने की सख्त हिदायत दी गई थी. लेकिन शहर के बीचों-बीच रिक़ाबगंज इलाक़े में घर होने के नाते हमें अपनी छत की मुंडेर पर खड़े होकर अयोध्या जाने वाली रोड देखने की मनाही नहीं थी.

इसलिए छह दिसंबर की दोपहर के कई घंटे हमने छत पर टंगे हुए बिताए. शहर में पहले से ही धारा-144 लागू थी.

शाम होते-होते हमें पता चल गया कि राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद का ढांचा गिर चुका है और प्रशासन ने फ़ैज़ाबाद और अयोध्या में कर्फ्यू लगा दिया है. हालांकि छह दिसंबर के बाद अगले सात दिन मैंने फ़ैजाबाद में ही बिताए लेकिन कहीं से भी किसी अनहोनी की ख़बर नहीं मिली.

आज जब उस दिन को याद करता हूँ तो ज़हन में दो ही बातें आती हैं, एक तो यह कि अपने दादा के साथ जिन इमारतों को बचपन में देखा था, 1992 के बाद उनमें से एक कम हो गई है. दूसरी यह कि छह दिसंबर के दिन फ़ैज़ाबाद के सबसे भीड़-भाड़ वाले रिक़ाबगंज में आसमान एकदम साफ़ और शांत था.

यह बात एकदम असामान्य थी क्योंकि साल के बारहों महीने, तीन सौ पैंसठ दिन रिक़ाबगंज चौक, फ़ैज़ाबाद के आसमान में पतंगबाज़ी होती रहती है. हर छत से रह रह कर आवाज़े आती रहती हैं, वोह काटा, वोह काटा!

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