क्यों अल क़ायदा से दूर हैं भारतीय मुसलमान

 बुधवार, 5 दिसंबर, 2012 को 14:13 IST तक के समाचार

भारत में 18 करोड़ मुस्लमान हैं जिनकी सबसे गरीब बिरादरी में गिनती होती है.

हबीबा इस्माइल ख़ान उस दिन को आज भी नहीं भूली हैं जब उनका सबसे बड़ा बेटा खाना लेने के लिए घर से बाहर निकला था.

अयोध्या में हिंदू कट्टरपंथियों द्वारा बाबरी मस्जिद गिराए जाने के बाद फैले दंगों से मुंबई की ये झोपड़ पट्टी अब भी उबर रही है.

आज़ादी के बाद भारतीय धर्मनिरपेक्ष ढांचे के सबसे बड़े इम्तेहान यानी बाबरी मस्जिद गिराए जाने की इसी हफ्ते 20वीं वर्षगांठ है.

कई दिनों तक झोपड़ी में बंद रहकर कत्लेआम का शोरगुल सुनने के बाद हबीबा का बेटा खाना लेने के लिए झोंपड़ी से बाहर निकला था और लौटकर नहीं आया.

हबीबा बताती हैं, “वो केवल 18 साल का था और घर का इकलौता कमानेवाला. उसकी याद में मेरा दिल हर रोज़ रोता है.”

हबीबा के बेटे को हिंदू उपद्रवियों ने मार डाला.

हबीबा का बेटा उन 600 मुसलमानों में शामिल था जिन्हें मुंबई दंगों के दौरान अपनी जान गंवानी पड़ी.

बहुत देर बाद सरकारी आयोग ने निष्कर्ष दिया कि इस हिंसा को हिंदू चरमपंथियों ने अंजाम दिया था.

दो दशक बाद भी मुसलमान अधिकारहीन, अल्पसंख्यक हैं. हालांकि 18 करोड़ मुसलमानों को अल्पसंख्यक कहना ग़लत होगा क्योंकि भारत विश्व में तीसरा सबसे बड़ा मुस्लिम आबादी वाला देश है. मुसलमानों का सबसे बड़ा देश है इंडोनेशिया और दूसरा सबसे बड़ा देश है पाकिस्तान.

हबीबा इस्माइल खान ने अपने बेटे को धार्मिक दंगो में खो दिया.

भारत का पड़ोसी देश इस्लामिक चरमपंथ की वजह से हमेशा उथल-पुथल का सामना करता रहता है लेकिन ये बात आश्चर्यजनक है कि भारत में इस्लामी चरमपंथ कम उभरा है.

भारतीय गुप्तचर सेवा के पूर्व प्रमुख विक्रम सूद कहते हैं, “भारत में चरमपंथ ने अपनी जड़े नहीं जमाई हैं.”

हालांकि कुछ बम विस्फोटों के पीछे इंडियन मुजाहिदीन जैसे कुछ स्थानीय गुटों का हाथ होने का दावा किया जाता है और ऐसे इक्के-दुक्के मामले सामने आते रहे हैं लेकिन इस तरह के गुटों को किसी खास मदद के संकेत नहीं मिले हैं.

भारत में इस्लामी चरमपंथियों द्वारा किए गए सबसे बड़े हमले में पाकिस्तान के हाथ होने के स्पष्ट सबूत हैं.

भारत में रहने वाले विश्व के 10 प्रतिशत मुसलमानों को अल-कायदा अपने संगठन में भर्ती के लिए उकसाने में कामयाब नहीं हुआ है.

विक्रम सूद कहते हैं, “कोई भारतीय मुसलमान ना ही अफ़गानिस्तान में लड़ने के लिए गया, ना ही कश्मीर में.”

हालांकि मुसलमानों के लिए उकसावे लगातार बढ़ते रहे हैं. 2002 के गुजरात दंगों में सैकड़ों मुसलमान मारे गए, जिसमें स्पष्ट सबूत मिले कि इन हत्याओं को योजनाबद्ध तरीके से हिंदू चरमपंथियों ने अंजाम दिया.

1992 के मुंबई दंगों में मुख्य भूमिका निभाने की आरोपी दक्षिणपंथी हिंदू पार्टी के प्रमुख बाल ठाकरे की पिछले महीने हुई मौत के बाद हबीबा ने दंगों को दोहराए जाने के लिए अपने आप को तैयार कर लिया था.

हबीबा कहती हैं,“हम बस दिन गिन रहे हैं, स्थिति कभी भी खराब हो सकती है.”

हिंदू और मुसलमान को बांटती सड़क

हालांकि मुंबई के जोगेश्वरी में एक बात ज़रुर बदल गई है. अब हिंदू-मुसलामानों के मिश्रित क्षेत्र खत्म हो गए हैं. हिंदूओं का पड़ोस और मुसलमानों का पड़ोस अब स्पष्ट रूप से बंटा हुआ नज़र आता है. दोनों के बीच एक सड़क सीमा का काम करती हैं और हिंदू सीमा पार को ‘छोटा पाकिस्तान’ बोलते हैं और मुसलमान उसे ‘हिंदुस्तान’ कहते हैं.

जोगेश्वरी के मुस्लिम इलाके में रहने वाले लोगों को जीवन सुधरने की बहुत कम उम्मीद है.

दंगों के बाद अपनी सुरक्षा के लिए जोगेश्वरी पहुंची हबीबा की पड़ोसी मरज़ीन कहती हैं, “बैंकों में, सरकारी महकमों में, केवल हिंदुओं को अच्छी नौकरी मिलती है.”

आंकडे मरज़ीन के दावों का समर्थन करते हैं. आंकड़ों के अनुसार आय, रोज़गार, शिक्षा और शिक्षा तक पहुंच के मामलों में मुसलमान हिंदू अछूतों और आदिवासी के साथ सबसे नीचे हैं.

मुंबई के जोगेश्वरी में हिंदू-मुसलमानों के इलाके बंटे हुए हैं,.

भारत की कुल आबादी के 14-15 प्रतिशत लोग मुसलमान हैं लेकिन इनका सरकारी नौकरियों में हिस्सा केवल चार प्रतिशत है बाकि लोग असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं.

भारतीय सिनेमा सितारे शाहरुख खान, सलमान खान और आमिर खान जैसे कुछ मुसलमान भारत में अच्छा कर रहे हैं. लेकिन वो अपनी विरासत पर खासा ज़ोर नहीं देते हैं.

बॉलीवुड का एक और बड़ा नाम महेश भट्ट. महेश भट्ट मुस्लिम मूल के हैं. महेश मानते हैं कि उनकी मां ने उनके मुसलमान नाम को छिपा दिया, जिसका उन्हें लाभ हुआ. उनकी मां मुस्लिम थीं लेकिन उन्होंने अपने बच्चों को हिंदू नाम दिए ताकि उनकी पहचान मुसलमान के तौर पर ना हो सके.

"भारत कहीं ज्यादा धर्मनिर्पेक्ष और समावेशी होने का दावा करता है लेकिन भारत उतना धर्मनिर्पेक्ष और समावेशी नहीं है"

महेश भट्ट, फ़िल्म निर्माता और निर्देशक

महेश भट्ट अब अपनी प्रसिद्धी का इस्तेमाल मुस्लिम मुद्दों को उठाने के लिए करते हैं.

महेश भट्ट कहते हैं कि भारत कहीं ज्यादा धर्मनिर्पेक्ष और समावेशी होने का दावा करता है लेकिन भारत उतना धर्मनिर्पेक्ष और समावेशी नहीं है.

महेश भट्ट कहते हैं,“अमरीका में अगर कोई अश्वेत राष्ट्रपति बनता है तो भारत क्यों इसकी खुशी मनाता है. मैं तो खुशी तब मनाऊंगा, जब भारत का प्रधानमंत्री मुस्लिम होगा. ”

आलोचक कहते हैं कि भट्ट को विवादास्पद बयान देने की आदत है लेकिन वो भारतभर के मुसलमानों के लिए बोलते हैं.

हिंदूओं की तरह मुसलमानों की कोई राष्ट्रीय पार्टी नहीं है जो उनकी नुमाइंदगी करती हो.

मुंबई की झुग्गियों में अधिकतर मुस्लिम युवाओं को शिक्षा और ट्रेनिंग उपलब्ध करवाने वाली संस्था चलाने वाले डॉक्टर मोहमद खटखटे कहते हैं, “हम ये दुनिया छोड़कर कहीं दूसरी दुनिया में नहीं जा सकते.”

भारत में इस्लामिक पहचान

भारत में केवल चार प्रतिशत मुसलमानों के पास सरकारी रोज़गार है.

भारत में एक सशक्त इस्लामिक पहचान हासिल करना एक बड़ी चुनौती है. अगर चरमपंथी विचारधारा की ही बात की जाए तो भारत के विशाल और विविध सामाजिक तानेबाने में मुसलमानों के लिए धर्म के अलावा शायद ही कोई बात सामान्य हो.

डॉक्टर मोहमद खटखटे कहते हैं कि दक्षिण में नाविकों के वंशज मुसलमानों को केरल में हिंदूओं और इसाईयों में ज्यादा समानताएं नज़र आती हैं जबकि उत्तर प्रदेश के मुसलमानों में उन्हें कोई खास समानता नज़र नहीं आती.

"भारत में मुसलमान हर किसी और की तरह अच्छा कर रहे हैं और हर किसी और की तरह बुरा भी."

डॉक्टर नज़ीब जंग, वाइस चांसलर, जामिया मिलिया इस्लामिया

भारत में व्यापक स्तर पर फैले अधिक शांत और सामावेशी सूफी इसलाम ने भी चरमपंथ के विस्तार को रोका है.

भारत में सरकार की मदरसों और धार्मिक स्कूलों पर कड़ी पकड़ है जबकि पाकिस्तान, तालिबान और अन्य चरमपंथियों के लिए भर्ती की खान हैं.

जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर नजीब जंग कहते हैं, “पाकिस्तान के मुकाबले भारत के मुसलमानों की स्थिति बेहतर है.”

डॉक्टर नज़ीब जंग कहते हैं, “भारत में मुसलमान अच्छा भी कर रहे हैं और बुरा भी.”

और यहीं असल खतरा है. भारतीय अर्थव्यवस्था पिछले एक साल में बुरी तरह से प्रभावित हुई है और इसका असर अभी खत्म नहीं हुआ है.

विक्रम सूद कहते हैं, “यदि हम अपनी अर्थव्यवस्था को सुधारने में कामयाब होते हैं तो ये सभी मुद्दे खत्म हो जाएंगे. लेकिन अर्थव्यवस्था नहीं सुधरती तो सभी मुद्दे ना सिर्फ बढ़ेंगे बल्कि कई गुना हो जाएंगे.”

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