जब पुजारी की जान बचाई एक मौलवी ने

 शुक्रवार, 7 दिसंबर, 2012 को 11:21 IST तक के समाचार

बाबरी मस्जिद को गिराए जाने के बाद देश के काफी हिस्सों में तनाव फैल गया

छह दिसंबर से लगभग हफ्ते भर पहले की बात है, पूरे भारत की नजरें अयोध्या पर थी. विश्व हिंदू परिषद पूरे उत्तर प्रदेश में हिंदू जागरण अभियान चला रहा था.

अयोध्या की सरगर्मी उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ की फिज़ाओं में भी महसूस की जा सकती थी.

प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी सरकार की कमान कल्याण सिंह के हाथों में थी.

लखनऊ के राजा बाजार, यहियागंज, रस्तोगी टोला हिंदू बहुल इलाके है. राजा बाजार चौराहै से दो छोटी सड़क पुराने नक्खास की ओर जाती है, यहाँ काफी तादाद में मुसलमान रहते है.

इसी राजा बाजार चौराहे पर एक मस्जिद है और भवाना सिंह शिवाला रोड पर दो मंदिर हैं. एक वैष्णव बल्लभ कुल संप्रदाय का और दूसरा शिव का.

पाँच दिसंबर 1992

यही कोई शाम का वक्त.पुराने लखनऊ के राजा बाजार के एक नुक्कड़ पर एक जन सभा चल रही थी.

"दोपहर में अचानक मंडी में भगदड़ मची और सारे फल-सब्जी वाले भागने लगे. जिसको जहाँ जगह मिली वहीं छिप गया.कुछ लोग भाग कर छत पर चढ़ गए.खबर उड़ी कि बताशे वाली गली के पास कुछ मुसलमानों ने हमला कर दिया है. पर ये सिर्फ एक अफवाह से ज्यादा कुछ नही थी."

एक वक्ता लाउडस्पीकर पर चीखते हुए एक कविता पढ़ रहा था..

तन श्रीराम का, मन श्रीराम का,

तो राम नाम ले कर प्रस्थान कर जाइए.

सागर में है घर और शत्रुता मगर से है, अच्छा हो कि सागर से नाता तोड़ जाइए.

जिनको नही है प्यारी माता भारती हमारी, ऐसे लोग शीघ्र मेरा देश छोड़ जाइए.

वो सभी जो इन कविताओं का पाठ सुन रहे थे, बीच- बीच वो उत्तेजित होकर आवोग में राम लला हम आएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे के उदघोष गूंज रहे थे.

सभा ख़त्म तो हो गई, घर लौटते हुए लोगों के दिल में एक सवाल था कि आगे क्या होगा, अयोध्या में कुछ तो पक रहा है.

इस बीच, हजारों की तादाद में लोग छिपते छिपाते अयोध्या में दाखिल हो चुके थे.

छह दिसंबर 1992

राजा बाजार से यहियागंज की ओर जाने वाली सड़क भवाना सिंह शिवाला मार्ग पर सुबह तड़के प्रभात फेरियों का निकलना शुरु हो गया.

लोगों के जत्थे के जत्थे हाथ मे भगवा झंडे लेकर निकल रहे थे.

जब बाबरी मस्जिद गिराई जा रही थी, उस वक्त पुलिस के आला अधिकारी इसे देख रहे थे.

सुबह जब अखबार आए तो लोग बड़ी उत्सुकता से अखबार के पन्नों में ये खोजने की कोशिश करते रहे कि अयोध्या में क्या हो रहा है.

दोपहर को तेज़ी से खबर उड़ी कि कारसेवकों ने बाबरी मस्जिद का एक गुंबद ढहा दिया है. लोगों की उत्सुकता और बढ़ गई. लोग जय श्रीराम को उदघोष करने लगे.

दोपहर में एक अखबार आया जिसमें अयोध्या के कुछ फोटो छपे थे.

देर शाम को फिर खबर आई कि मस्जिद के सारे गुंबद ढहा दिए गए है. लोगों ने इस खबर की पुष्टि करनी चाही तो बीबीसी लंदन सुनना शुरु किया.

खबर पक्की निकली.माहौल में एक अजीब सा सन्नाटा पसर गया.

सात दिसंबर 1992

सुबह के जब अखबार आए तो उनमें सिलसिलेवार तरीके से बाबरी मस्जिद के ढहने के चित्र छपे थे. साथ ही नए अस्थाई मंदिर के भी.

"नक्खास के पास कुछ लोगों ने पुजारी को घेर लिया, भीड़ ने आवाज दी यही है हिंदुओं का नेता.. मारो , मारो.आवेश में भीड़ आगे बढ़ ही रही थी कि पास की एक मस्जिद से एक मौलवी ऊपर से नीचे उतरे और भीड़ को समझाने लगे. वो बोले ये तो अपने पंडित जी हैं.भीड़ से खींचते हुए वो मौलवी साहब पंडित जी को मस्जिद में ले गए. पंडित जी उस दिन मस्जिद में ही बैठे रहे."

उस दिन बहुत अखबार बिके थे. जो लोग अखबार नही खरीदते थे, उन्होंने भी खरीदा.

इलाके में काफी तनाव था. पुलिस भी मौजूद थी. इसी चौराहे पर सुबह सब्जी मंडी लगती है. दोपहर में अचानक मंडी में भगदड़ मची और सारे फल-सब्जी वाले भागने लगे. जिसको जहाँ जगह मिली वहीं छिप गया.कुछ लोग भाग कर छत पर चढ़ गए.

खबर उड़ी कि बताशे वाली गली के पास कुछ मुसलमानों ने हमला कर दिया है. पर ये सिर्फ एक अफवाह से ज्यादा कुछ नही थी.

रस्तोगी टोले के सभी दरवाजे बंद कर दिए गए. गलियों में लोग पहरा देने लगे.

छत पर एक ओर से अल्लाह हो अकबर के नारे लग रहे थे, तो दूसरी ओर से जयश्री राम के नारे थे. लोग डर कर घरों में दुबक कर बैठे रहे.

रात होते होते भारी तादाद में पुलिस इलाके में दाखिल हो गई. लोग भी रात भर जागते हुए पहरा देते रहे. जागते रहो..जागते रहो..

आठ दिसंबर 1992

इलाके में बेहद तनाव था, मंदिर के एक पुजारी दोपहर में पूजा पाठ करने के बाद अपने घर के लिए निकले.

अच्छी कदकाठी, माथे पर बल्लभ कुल का तिलक और भगवा रंग की राजस्थानी बगलबंदी पहने हुए. बिना किसी डर के वो अपने घर की ओर पैदल ही जा रहे थे.

भारी तादद में कारसेवक छह दिसंबर को अयोध्या में थे

नक्खास के पास कुछ लोगों ने उन्हें घेर लिया, भीड़ ने आवाज दी,"यही है हिंदुओं का नेता.. मारो , मारो."

आवेश में भीड़ आगे बढ़ ही रही थी कि पास की एक मस्जिद से एक मौलवी ऊपर से नीचे उतरे और भीड़ को समझाने लगे. वो बोले ये तो अपने पंडित जी हैं.

भीड़ से खींचते हुए वो मौलवी साहब उन्हें मस्जिद में ले गए. पंडित जी उस दिन मस्जिद में ही बैठे रहे.

जब भीड़ वहाँ से छट गई तो पंडित जी मस्जिद से उतरे और घर पहुंचे.

घर पर उनके इंतजार में, चिंता में उनकी पत्नी और बच्चे बैठे थे. पुजारी ने अपनी कहानी सुनाई, उनकी पत्नी ने सबसे पहले ये ही कहा कि इस भगवा बगलबंदी को आज से आप नही पहनेंगे.

वो दिन था और आज बीस साल बाद का दिन है कि उस पुजारी ने फिर कभी वो भगवा राजस्थानी बगलबंदी नही पहनी.

लेकिन इस घटना में लखनऊ ने एक बार फिर अपनी साम्प्रदायिक सौहार्द की मिसाल दिखा दी.

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