सपा-बसपा के यूपीए को समर्थन के मायने

 शुक्रवार, 7 दिसंबर, 2012 को 17:57 IST तक के समाचार
मुलायम सिंह (फ़ाइल)

एफडीआई के खिलाफ बोलने के बावजूद भी मुलायम सिंह ने इस मामले पर सरकार की मदद की है.

मल्टी ब्रांड खुदरा व्यापार में विदेशी निवेश पर समाजवादी पार्टी या बहुजन समाज पार्टी के रुख़ का जवाब क्षेत्रीय दलों की 'पहचान की राजनीति' और उनके नेताओं के व्यक्तिगत कारणों में ढ़ूंढा जाना चाहिए.

राजनीति चाहे भारत की हो या अमरीका की, राजनीतिक दल अपने विरोधियों और प्रतिद्वंद्वियों पर नज़र रखते हैं और मौक़ा आने पर उनकी किसी कमज़ोरी का फ़ायदा उठाने को तैयार रहते हैं.

इस मामले में क्षेत्रीय दलों पर दबाव बनाना और आसान होता है क्योंकि उनके एक या दो नेता ही अहम होते हैं. उनकी किसी कमज़ोरी या उनकी मजबूरी का फ़ायदा उठाकर उन्हें अपनी तरफ़ आने के लिए आसानी से मजबूर किया जा सकता है.

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दूसरी ओर, पहचान की राजनीति करने वाले दल - चाहे वो पहचान क्षेत्र, जाति, भाषा या धर्म की हो, बड़े राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक मुद्दों पर कोई गंभीर चिंतन नहीं रखते हैं या उन पर आराम से सुलह करने को तैयार हो जाते हैं.

आप मायावती की बात कर लें, उन्होंने दलितों को समाज में नए तरह की पहचान दी है लेकिन दलितों की आर्थिक मुक्ति के सवाल जैसे भूमि सुधार पर कोई रणनीति नहीं बनाई, न ही उसकी कभी बात की.

दूसरे दल ने भी क्षेत्रीय असन्तुलन को दूर करने का सवाल तो खड़ा किया लेकिन जब वो ख़ुद सत्ता में आए तो इसे किनारे कर दिया.

हालांकि इस बात से किसी भी तरह इंकार नहीं किया जा सकता है कि पहचान की राजनीति से व्यक्तिगत तबके़ के लोगों को लाभ मिला है.

हितों के ख़िलाफ़ फिर भी ...

विपक्ष विरोध (फ़ाइल)

विपक्ष ने इस मुद्दे पर पहले भी विरोध रैलियां निकाली हैं.

खुदरा व्यापार के मुद्दे पर हालांकि दोनों दलों ने सदन के पटल पर खुलकर कहा कि ये भारत के बड़े वर्ग के हितों के ख़िलाफ़ है लेकिन फिर भी दोनों ने मतदान के दौरान सदन से बाहर रहने की बात की, जिससे ज़ाहिर है फ़ायदा केंद्र में सत्ताधारी संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार को हुआ.

राज्य सभा में तो ख़ैर बहुजन समाज पार्टी ने वोटिंग में शामिल होकर सरकार को सीधे तौर पर फ़ायदा पहुँचाया.

देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के युग के बाद बड़े दलों का सामाजिक और राजनीतिक आधार कमज़ोर पड़ा जो आगे के दिनों में भी जारी रहा है.

सामाजिक न्याय हो या बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद उठा अल्पसंख्यक अधिकार का मामला, इसका नुक़सान कांग्रेस को उठाना पड़ा. इन मुद्दों ने उसके राजनीतिक आधार को कमज़ोर किया.

सामाजिक न्याय के मामले पर तो भारतीय जनता पार्टी भी किनारे हुई.

बदलाव की प्रक्रिया का दौर

सब्जी दुकान (फ़ाइल)

कहा जा रहा है कि विदेशी निवेश की वजह से छोटे दुकानदारों को नुक़ासन होगा.

जहां-जहां पहचान की राजनीतिक ने ज़ोर पकड़ा वहां मुख्य राजनीतिक दल कमज़ोर हुए हैं. दक्षिण में डीएमके और एआईएडीएमके के मज़बूत होने का नुक़सान कांग्रेस को झेलना पड़ा जहाँ उसके आधार में कमी आई है.

लेकिन फिर भी मेरी नज़र में ये क्षेत्रीय दलों के लिए बदलाव की प्रक्रिया का दौर है. लेकिन वो कम से कम आने वाले एक से दो दशक तक जारी रहेगा जब शायद नए नेता आएं, नए राजनीतिक समीकरण तैयार हों जो इनकी रूपरेखा और आधार में बदलाव लाएं!

मगर फ़िलहाल इन पार्टियों में मुझे वो क्षमता नहीं दिखती कि वो देश की वर्तमान समस्याओं या जो सामाजिक या राजनीतिक गतिरोध हैं, उन्हें किसी भी तरह से ख़त्म कर सकें.

इन दलों की इस स्थिति के लिए ग़ैर कांग्रेसी और ग़ैर भाजपा के अलावा वो वामपंथी भी ज़िम्मेदार हैं जिन्होंने लंबे समय तक इन क्षेत्रीय दलों के साथ मिलकर काम किया लेकिन इन्हें राजनीतिक मामलों पर सफ़ाई के साथ उभरने का मौक़ा नहीं दिया.

इसके लिए आप वीपी सिंह के समय की नेशनल फ्रंट या हाल के दिनों की यूनाइटेड फ्रंट सरकारों को उदाहरण के तौर पर ले सकते हैं.

इसे गैर-कांग्रेस और ग़ैर-भाजपा राजनीतिक गठबंधनों की राजनीतिक और सांगठनिक विफलता के तौर पर भी देखा जा सकता है.

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