प्रॉपर्टी के धंधे में कालाबाज़ारी का बोलबाला?

 सोमवार, 10 दिसंबर, 2012 को 17:14 IST तक के समाचार

ताज़ा अनुमानों के अनुसार भारत की ‘काली अर्थव्यवस्था’ का आकार, देश के सकल घरेलू उत्पाद के 25 से 50 % तक है.

ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल के भ्रष्टाचार सूचकांक के अनुसार 176 देशों में भारत 94वें नंबर पर है जोकि ब्राज़ील और चीन से काफ़ी बदतर है.

इसमें भारत का प्रॉपर्टी सेक्टर शायद सबसे बड़ा दोषी है.

दिल्ली स्थित लिबर्टी इंस्टीच्यूट के संस्थापक और निदेशक बरुन मित्रा के अनुसार भारत में प्राकृतिक संसधानों समेत हर किस्म के ज़मीनी लेन-देन से हर वर्ष बीस से चालीस अरब अमरीकी डॉलर अवैध धन पैदा होता है.

ये जीडीपी के एक से दो प्रतिशत के बराबर का धन है.

आइए नज़र डालते हैं पांच ऐसे कारणों पर जो रियल इस्टेट में मौजूद काली अर्थव्यस्था के लिए ज़िम्मेदार हैं.

बेमेल मांग और आपूर्ति

कालाबाज़ारी की जड़ में

  • मकान कम और ख़रीदार ज़्यादा यानी मांग और आपूर्ति के बीच भारी खाई
  • ख़रीद फ़रोख़्त पर भारी टैक्स
  • ऑनलाइन रिकॉर्डों के अभाव में ख़रीदार और बेचने वालों को पूरे यक़ीन के साथ लेन-देन करने में हिचक
  • राज्यों के विवेकाधीन अधिकार जिसने अनुसार खेती वाली ज़मीन को बदलकर व्यावसायिक करवाया जा सकता है.
  • एक प्रॉपर्टी प्रोजेक्ट के लिए 60 स्वीकृतियां लेनी होती हैं. साथ ही उसे 175 डॉक्यूमेंट पेश करने होते हैं. लालफ़ीताशाही की वजह से रिश्वत का चलन

एक सरकारी रिपोर्ट के अनुसार भारतीयी शहरों में साल 2012 के अंत तक ढाई करोड़ से अधिक घरों की ज़रुरत होगी. इसके अलावा व्यावसायिक और कारख़ानों के लिए जो जगह चाहिए सो अलग.

इसके बावजूद मालिक कीमती ज़मीनों के इस उम्मीद से नहीं बेच रहे हैं क्योंकि शायद भविष्य में इनकी और मोटी क़ीमत मिल पाए.

ये सारी स्थिति घूस के अवसर प्रदान कर रही है.

जानकारों का मानना है कि भारत होने अधिकतर रियल इस्टेट सौदों में काला और सफ़ेद धन शामिल होता है. यानि 50 प्रतिशत तक कीमत कानूनी तरीके से और बाक़ी कैश. इस कैश पर कोई टैक्स नहीं दिया होता है.

ख़रीद फ़रोख़्त पर भारी टैक्स

मकान के ख़रीदार और बेचने वाले पर भारत में टैक्स बहुत अधिक लगता है.

ख़रीदार को ज़मीन या मकान की रजिस्टरी के लिए प्रॉपर्टी की कीमत के हिसाब से टैक्स देना होता है. और बेचने वाले को 'कैपिटल गेन टैक्स' देना होता है.

इसलिए दोनों के पास प्रॉपर्टी को कागज़ों पर कम आंकने की वजह होती है.

सरकार भविष्य में रजिस्टरी पर टैक्स को पांच प्रतिशत करके इस स्थिति को दुरुस्त करने जा रही है.

ज़मीन के अपारदर्शी रिकॉर्ड

भारत में ज़मीन के रिकॉर्ड अपारदर्शी हैं और जिसकी वजह से ये अदालती दाव पेंच में फंसे रहते हैं.

ऑनलाइन रिकॉर्डों के अभाव में ख़रीदार और बेचने वालों को पूरे यक़ीन के साथ लेन-देन करने में हिचक होती है.

और इसी वजह से प्रॉपर्टी बेचने वाले कैश में भुगतान की मांग करते हैं. जिसके चलते वही लोग इस बाज़ार में दाख़िल हो सकते हैं जिनके पास काला धन हो.

राज्यों के विवेकाधीन अधिकार

निर्माणाधीन इमारत

हर शहर का मास्टर प्लान होता है लेकिन रसूख़ वाले लोग ज़मीन का 'लैंड यूज़' बदलवा कर मोटी कमाई करते हैं.

हर शहर या क़स्बे का एक मास्टर प्लान होता है जिसके हिसाब से कृषि, रिहाइश, दफ़्तरों आदि के लिए क्षेत्र नियत होते हैं. लेकिन इनमें स्थानीय अधिकारी अपनी मनमर्जी से फ़ेरबदल कर सकते हैं.

इसी विवेकाधीन अधिकार के चलते बिल्डर ज़मीन का ‘लैंड यूज़’ बदलवा लेते हैं.

रॉबर्ट वाड्रा के कथित केस से पता चलता है कि खेती वाली ज़मीन का लैंड यूज़ व्यावसायिक करवाने से उसकी कीमत चौगुनी तक हो सकती है.

साथ ही भविष्य में बनने वाले हाईवे या मेट्रो लाइन के पास ज़मीन ख़रीद कर भी मोटी रकम कमाई जा सकती है.

और जिनके पास रसूख़ है वो पहले से ही भविष्य की योजनाएं के बारे में जानकारी रख सकते हैं.

लालफ़ीताशाही

भारत में कोई प्रॉपर्टी प्रोजेक्ट पूरा करने के लिए एक बिल्डर को 60 के करीब स्वीकृतियां लेनी होती हैं. साथ ही उसे 175 डॉक्यूमेंट पेश करने होते हैं.

और ये सब करने के लिए उसे केंद्र, राज्य और स्थानीय सरकारों के 40 विभागों के पास जाना होता है.

एक अनुमान के अनुसार एक बिल्डर को अगर ये सब कानूनी तरीके से करना हो तो उसे तीन से चार साल का वक्त लग जाएगा.

इसकी वजह से बिल्डर सियासतदानों और नौकरशाहों को घूस देते हैं ताकि सारी स्वीकृतियां जल्दी से मिल जाएं.

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