बीटल्स और शास्त्रीय संगीत के पुल थे रविशंकर

 बुधवार, 12 दिसंबर, 2012 को 13:50 IST तक के समाचार
रविशंकर

पंडित रविशंकर ने अपने करियर की शुरुआत शास्त्रीय नृत्य से की थी

विश्व विख्यात सितारवादक क्लिक करें पंडित रविशंकर का 92 साल की उम्र मे निधन हो गया है. भारतीय शास्त्रीय संगीत का पश्चिम समेत पूरी दुनिया में परचम लहराने में पंडित रविशंकर का अहम योगदान था.

पश्चिमी संगीत समूह बीटल्स का भारतीय शास्त्रीय संगीत से परिचय करवाने का श्रेय भी पंडित रविशंकर को जाता है.

पश्चिमी संगीत की दुनिया में बड़ा नाम कमाने और पहचान बनने के बाद भी पंडित रविशंकर हमेशा से सितार से जुड़ी भारतीय परंपराओं की तरफ लौट कर आते रहे.

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लंबे समय से अमरीका में रहने के बावजूद वे कभी भी भारतीय संगीत की जड़ों से अपने आपको अलग नहीं कर सके.

पंडित रविशंकर का जन्म भारत के सांस्कृतिक शहर बनारस में साल 1920 को अप्रैल महीने में हुआ था.

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उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि एक बेहद ही साधारण और मध्यम वर्ग के परिवार की थी.

पंडित रविशंकर के पिता बनारस के एक नामी वकील थे लेकिन उनका अपने परिवार के साथ काफी कम संपर्क रहा.

रविशंकर के बड़े भाई उदय शंकर एक शास्त्रीय नर्तक थे जिन्होंने यूरोप में अपनी एक नृत्य कंपनी बनाई थी.

जब उदय की नृत्य कंपनी यूरोप में काफ़ी सफ़ल और प्रसिद्ध हुई तब पंडित रविशंकर की मां अपने तीनों बच्चों के साथ उनके पास रहने पेरिस चली आईं थीं.

ऑस्कर नॉमिनेशन

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पंडित रविशंकर को भारतीय शास्त्रीय संगीत की पहचान पूरे दुनिया से कराने श्रेय जाता है

क्लिक करें पंडित रविशंकर ने अपने करियर की शुरुआत अपने बड़े भाई पंडित उदय शंकर की नृत्य कंपनी के साथ एक शास्त्रीय नर्तक के रुप में किया था.

उस दौरान उन्हें कई बड़े लोगों, जिनमें उपन्यासकार जेरट्रड स्टीन, शास्त्रीय गिटार वादक एंद्रियास सिगोविया और गीतकार कोल पोर्टर के साथ काम करने का मौका मिला.

रविशंकर ने इस डांस ग्रुप के साथ पूरी दुनिया में नृत्य प्रस्तुत किया. वे यूरोप, उत्तरी अमरीका और कई जगहों पर अपना कार्यक्रम देते रहे.

लेकिन इसी दौरान वे नृत्य कंपनी से पहले से जुड़े बेहतरीन भारतीय संगीतकार बाबा अलाउद्दीन ख़ान के संपर्क में आए और उनसे काफी प्रभावित हुए.

ये बाबा अलाउद्दीन ख़ान के संपर्क में आने के बाद की ही बात है कि पंडित रविशंकर ने संगीत की शिक्षा लेने का फैसला किया.

कुछ समय बाद वे वापस भारत आए और यहां आकर उन्होंने लगातार सात सालों तक बाबा अलादुद्दीन ख़ान से सितार की शिक्षा ग्रहण की.

क्लिक करें पंडित रविशंकर ने बाद में अपने गुरु बाबा अलादुद्दीन ख़ान की बेटी के साथ शादी की. 1940 -1950 के बीच वे अपने काम के ज़रिए काफी नाम कमा चुके थे.

उस दौरान एक शास्त्रीय गायक और संगीतकार के रूप में वे काफी मशहूर हुए. इस दौरान उन्होंने कई स्टेज म्यूज़िकल और फिल्मों के लिए बिल्कुल नई तरह का संगीत दिया.

उन्हें फिल्म 'गांधी' में उनके काम के लिए ऑस्कर पुरस्कार के लिए नामांकित भी किया गया था.

वॉयलिन वादक येहूदी मेनह्युन पंडित रविशंकर के काम से काफी मोहित थे और बाद में दोनों काफी अच्छे दोस्त भी बने.

"पंडित रविशंकर की दूसरी बेटी नोराह जोन्स ज्य़ादा कामयाब और नामी कलाकार बनीं. नोराह जोन्स को अपने पिता की तरह कई ग्रैमी अवार्ड भी मिल चुके हैं"

इन दोनों ने बाद में 'ईस्ट मीट वेस्ट' के नाम से संगीत के तीन कैसेट भी निकाले.

लेकिन पंडित रविशंकर के जीवन में सबसे बड़ा पल साल 1966 में तब आया जब उनकी मुलाकात बीटल्स समूह और ख़ासकर समूह के सदस्य जॉर्ज हैरिसन से हुई.

हैरिसन रविशंकर से मिलने से पहले नार्वेन-वुड बैंड के लिए सितार बजा चुके थे. शुरुआत में पंडित रविशंकर को हैरिसन का सितार वादन बिल्कुल पसंद नहीं आया था और उनके मुताबिक वो काफी भयानक था.

पश्चिमी संगीतकारों के साथ काम करते हुए रविशंकर ने सबसे पहले मॉन्टेरी और वुडस्टॉक फिल्म समारोहों में हिस्सा लिया था.

हालांकि उनके ये अनुभव अच्छे नहीं थे.

वो समूह के सदस्यों द्वारा ड्रग्स लेने की आदत के कारण थोड़ा परेशान थे और आलोचक भी उनके काम को नापसंद कर रहे थे. उन पर अमरीकीकरण का आरोप लगाया जा रहा था.

मशहूर बेटियां

रविशंकर के मन में ये दुविधा पैदा हो चुकी थी कि पश्चिम के लोग उनकी संगीत को समझते भी हैं या नहीं?

उनका ये संशय तब और पुख्त़ा हुआ जब साल 1971 में वे बांग्लादेश के शरणार्थियों के लिए पैसे जमा करने के लिए आयोजित एक कॉंन्सर्ट में हिस्सा लेने बांग्लादेश पहुंचे.

वहां उनके कार्यक्रम के अंत में सभा में मौजूद दर्शकों ने खड़े होकर उनका अभिवादन किया था.

इस घटना ने पंडित रविशंकर की आंखें खोल दीं और वे एक बार फिर से अपनी जड़ों और परंपराओं की तरफ लौटने लगे.

रवि शंकर

रविशंकर ने बीटल्स समूह के साथ मिलकर भी काफी काम किया था

उन्होंने एक के बाद एक कई सांस्कृतिक समारोहों में हिस्सा लिया और प्राचीन भारतीय शास्त्रीय संगीत को पारंपरिक तरीके से प्रस्तुत किया.

हालांकि इस दौरान वे अपने अंतरराष्ट्रीय असाइनमेंट पर भी काम करते रहे.

रविशंकर बाद में अमरीका के सैन-डियागो शहर में बस गए थे. वे वहां अपनी दूसरी पत्नी और बेटी अनुष्का शंकर के साथ रहते थे.

अनुष्का शंकर भी बाद में एक नामी सितार वादक बनीं और पिता-पुत्री की जोड़ी ने एक साथ कई मंचों पर सितार वादन किया था.

लेकिन पंडित रविशंकर की दूसरी बेटी नोराह जोन्स ज्य़ादा कामयाब और नामी कलाकार बनीं. नोराह जोन्स को अपने पिता की तरह कई ग्रैमी अवार्ड भी मिल चुके हैं.

अपने अंतिम दिनों तक पंडित रविशंकर पूरब और पश्चिम के बीच पुल का काम करते रहे. इसके बावजूद जो चीज़ उनके दिल के क़रीब ज्यादा रही वो भारतीय परंपरा थी.

इनमें योग, नृत्य, संगीत और दर्शनशास्त्र शामिल थे.

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