मोदी की विकास की परिभाषा से गायब गरीब

नरेंद्र मोदी

इस बात को लेकर लोगों में शर्त लग सकती है कि मशहूर कार्टूनिस्ट आरके लक्ष्मण के आम आदमी वाले कोट में कितने खाने बने हुए हैं.

लेकिन ये जानकर आपको शायद ही कोई आश्चर्य हो कि मौजूदा गुजरात विधानसभा चुनावों के परिणामों पर कोई भी शर्त लगाने के लिए तैयार नहीं है.

ये और भी कम आश्चर्यजनक है कि दांव लगाने वाले नरेंद्र मोदी को तब से विजेता बता रहे हैं जब दोनों पार्टियों ने अपने उम्मीदवार भी घोषित नहीं किए थे.

इस बात में कोई शक नहीं है कि चुनाव लोगों को सशक्त करता है. लेकिन चुनावों की प्रक्रिया ख़त्म होने के बाद वोट देने वालों में से कुछ लोग करोड़ों कमाएंगे और बाकी लोगों की स्थिती दयनीय बनी रहेगी.

लोगों की स्थिति भले भी दयनीय हो, लेकिन उन्हीं कुछ लोगों ने मानवीय भावनाओं को पैसों में तोलने का तरीका ढूंढ़ लिया है.

दौलत की भूख

नव-उदारवाद के पिछले दो दशकों में गुजरात में कई गुना विकास हुआ है. नरेन्द्र मोदी के आगमन के बाद विकास की ये गति और तेज़ हुई है, जिसने दौलत की कभी ना पूरी की जा सकने वाली भूख को पैदा किया है.

लेकिन ये पैसे की नई संस्कृति गुजरात की पुरानी परंपरा के सामने एक विरोधाभास की तरह है, जिसमें कारोबारी कुशलता, किफायत के आधार पर पैसा बनाना, धार्मिक परोपकार और संस्था निर्माण शामिल था.

गांधी का गुजरात बदल रहा है और पूरा भारत भी बदला है. गांधी की मौत के 64 साल बाद बदलाव के अलावा कुछ और उम्मीद करना भी ग़लत होगा.

लेकिन आपको इस बात से ज़रूर गहरा आघात पहुंचेगा कि गुजरात के लोगों की आम सोच और संस्कृति पिछले दशक के विकास और समृद्धि में इतनी बदल गई है.

उदाहरण के तौर पर वडोदरा के उन किसानों को ही लीजिए जो अपनी ज़मीन की कीमतों में हुई बढ़ोतरी से गदगद हैं.

गुटखा निर्माताओं को तंबाकू उपलब्ध करवाने वाले एक किसान और उनके बेटे, दोनों एक ही स्वर में कहते हैं, ''हमारे गांव में हमारी ज़मीन की कीमत कई गुना बढ़ गई है.''

जब उनसे पूछा गया कि क्या वो इस बढ़ी हुई कीमत को भुनाते हुए अपनी ज़मीन बेचेंगे. जवाब आया, ''नहीं, लेकिन आपको अच्छा लगता है जब आपकी ज़मीन की कीमत बढ़ती है.''

ये ऊंचे दाम उनके ख्यालों में हैं ना कि उनके बैंक खातो में, लेकिन उनके अमीर होने का अहसास पूरे गुजरात में महसूस किया जा सकता है जहां लोगों को लगता है कि गुजरात इतना समृद्ध कभी नहीं था. बाज़ार आधारित अर्थव्यवस्था पैसा बनाने की उग्र भूख पैदा कर रही है

उग्र विकास

गुजरात एक ऐसा उदाहरण पेश कर रहा है कि जिसे देखकर डर लगता है और संशय भी पैदा होता है.

सौराष्ट्र विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर पुरुषोत्तम मरवानिया कहते हैं कि इतिहास बताता है कि इस तरह की अर्थव्यवस्था का ढांचा दीर्घकालीन नहीं रहा है.

मौटे तौर पर विकास के मौजूदा दौर की नींव बेहतर नज़र आती है. बिजली क्षेत्र में किए गए सुधारों का नतीजा है कि सिंचाई के लिए 24 घंटे बिजली उपलब्ध है.

Image caption गुजरात में पैसे खर्च करना लोगों की आदत में शुमार होता जा रहा है.

किसानों को नकद फसल उगाने के लिए राज़ी किया गया जिससे और ज्यादा समृद्धि आई. आज राज्य में बढ़ रहे ऑटोमोबाइल उद्योग के लिए राजकोट और उसके आसपास का इलाका, इससे जुड़े छोटे-मोटे उद्योगों का गढ़ बन गया है.

लेकिन मौजूद चुनाव के दौरान विकास की ये सुंदर तस्वीर प्रभावहीन होने के लक्षण दिखा रही है.

गुजरात के चुनाव में सौराष्ट्र का इलाका काफी महत्वपूर्ण है. इस इलाके से विधानसभा में 58 विधायक आते हैं जो कि कुल 182 विधायकों में से एक तिहाई संख्या है.

इस साल इस इलाके में मॉनसून की बारिश अच्छी नहीं हुई. कई वर्षों की समृद्धि के बाद अबकी बार चुनाव सूखे के माहौल में हो रहे हैं.

केशुभाई पर पटेलों का दाव?

नकद फसलों ने खेती की वजह से कृषि क्षेत्र में दिमाग को चकरा देने वाली बढ़ोतरी हुई है. लेकिन इस बढ़ोतरी ने कहीं और खतरे के संकेत भी दे दिए हैं.

नकद फसलों की वजह से अनाज की पैदावार कम हुई है और राज्य को कुल खपत के 30 प्रतिशत तक का अनाज दूसरे राज्यों से खरीदना पड़ता है. बच्चों में कुपोषण की ऊंची दर से जूझ रहे गुजरात में अनाज की कमी कुपोषण को और बढ़ा सकती है.

विकास और विकास दर के सामने इस तरह के छोटे-मोटे संकेत को अभी गंभीरता से लेना शायद जल्दबाज़ी होगी. लोगों के उल्लास को भी ये संकेत शायद ही कम कर सके.

सौराष्ट्र में भाजपा प्रवक्ता राजू धुर्वे ने स्थिति में एक नया आयाम जोड़ दिया है. वे कहते हैं, ''गुजरात खुशियां मनाना चाहता है, गुजराती हर हाल में खुशियां मनाएंगे भी, चाहे इसके लिए उन्हें कर्ज ही क्यों ना लेना पड़े.''

सौराष्ट्र के केंद्र रहे सूरत में समृद्धि के संकेत स्पष्ट हैं. शहर के शॉपिंग मॉल के सामने, महंगे रेस्त्रां हैं जहां लोगों की भीड़ है.

मध्यवर्गीय गुजरातियों में ख़ूब खर्च करना एक नया शौक है और ये मध्यम-वर्ग ही यथास्थिति बरकरार रखना चाहता है.

ये मध्यम-वर्ग पैसा बनाने में इतना व्यस्त है कि लोग सामाजिक और आर्थिक कमियों को नहीं देख पा रहे हैं. समाज के इस वर्ग के लिए सामाजिक खबरें कोई मायने नहीं रखतीं. इनके लिए समाचार सेंसेक्स से शुरू होते हैं और सराफा बाज़ार पर खत्म होते हैं.

यही वजह है कि सौराष्ट्र के सबसे बड़े पटेल नेता और पूर्व मुख्यमंत्री केशुभाई पटेल, नरेन्द्र मोदी के खिलाफ़ अपने अभियान में बेअसर दिखते हैं. मोदी के खिलाफ प्रचार में केशुभाई ऐसे आरोप लगा रहे हैं जो कहीं ना कहीं मोदी की विकास पुरुष की छवि को सही ठहराते नज़र आते हैं.

केशुभाई पटेल कहते हैं, ''मोदी झूठे हैं, उन्होंने सौराष्ट्र के लिए कुछ भी नहीं किया है.''

Image caption गुजरात का मध्य वर्ग ग़रीबी पर चर्चा तक नहीं करना चाहता.

पटेल ने अपनी चुनावी घोषणा में मुफ्त बिजली, ग़रीबों के लिए मुफ्त ज़मीन जैसे कई वादे किए हैं जिनका मतलब होगा कि राज्य का घाटा बढेगा.

इस बात की संभावना बहुत कम है कि मोदी के राज में राजनैतिक रूप से अधिकारहीन रहा पटेल समुदाय मोदी के खिलाफ केशुभाई पटेल पर दांव लगाएगा.

इतना ही नहीं, लोगों को अब तीन फेज़ बिजली के लिए बिल भरने की आदत हो गई है और उनके लिए मुफ्त चीज़ कोई मायने नहीं रखती और आज के समय में ये बहुत पीछे की बात है.

गुजरात के बदलाव की ये कहानी बाकी भयावह असलियत पर पर्दा डाल देती है. ग़रीबों और अमीरों के बीच बढ़ती खाई को नज़रअंदाज किया जा रहा है और आम मध्यम-वर्गीय समाज की असलियत से वाकिफ़ ही नहीं है.

ग़रीब हैं ग़रीबी का ज़िक्र नहीं

'वाइब्रेंट गुजरात' में ये दिखाया जाता है कि वैश्विक निवेश के लिए गुजरात ही असल मंज़िल है. साल 2011 में ये उत्सव महात्मा मंदिर नाम के एक शानदार कनवेंशन सेंटर में आयोजित किया गया था.

इस कनवेंशन सेंटर का नाम उस साबरमती के संत पर रखा गया जिसके आश्रम में रंग, जाति, धर्म और पैसे के आधार पर कोई भेदभाव नहीं होता था.

लेकिन हवाई अड्डे से महात्मा मंदिर के रास्ते में पड़ने वाली झुग्गियों को छुपाने के लिए पर्दे लगा दिए गए थे, इस सोच के साथ कि ग़रीब नज़रों से परे होंगे तो ग़रीब होंगे ही नहीं.

अब जब गुजरात विकास और विकास-दर के मुद्दे चुनावों के लिए तैयार हैं, तो उसे गरीबी को छुपाने के लिए असल परदों की कोई ज़रुरत है ही नहीं. गरीबी को लोगों के दिमाग से इस कदर निकाल दिया गया है कि ये ना ही आम बातचीत और न ही राजनैतिक बातचीत का हिस्सा है.

ग़रीबी की मौजूदगी को ना स्वीकारने की आदत को सामाजिक रूप से स्वीकार कर लिया गया है. ऐसा कोई भी ज़िक्र जिसमें ग़रीबी शामिल हो, मध्मवर्ग के लोगों को यथास्थिति को बदलने का षड़यंत्र और गुजराती गौरव को कम करने की कोशिश के तौर पर देखा जाता है.

गुजरात सरकार की शहरी ग़रीबों को घर उपलब्ध करवाने की सामाजिक योजना ने गरीबों के बीच भी धन अर्जित करने की लालसा को जगा दिया है.

'सब ठीक है' जैसी सोच पर आम सहमति मौजूद है और चौंकाने वाली भी. विचारों, आकांक्षाओं और सपनों में ये समानता देश में और कहीं नहीं दिखाई देती.

यहां विकास की तीव्रता और विविधता ने विकास के मुद्दे पर होने वाली बहस पर एक अलग असर दिखाया है. इसने देश के विकास के एजेंडे पर मोदी के नज़रिए वाली विकास की परिभाषा के लिए ललक और आम सहमती बना दी है.

गुजरात में 'सब ठीक है' की भावना है और इस पर आम सहमति भी है. लेकिन सवाल उठता है कि क्या ये वास्तविक आम सहमति है या इसे थोपा गया है. गुजरात में विरोध के स्वर क्यों नहीं हैं?

मोदी इस सवाल के जवाब में दो साल पहले कह चुके हैं, ''क्या गुजरात में किसी विपक्षी नेता को जेल में डाला गया या चुप करवाया गया? तो फिर थोपी गई आम सहमति क्या है? इस बात में ग़लत क्या है जब सभी विकास के मुद्दे पर एकमत हैं. क्यों आप ये कहना चाहते हैं कि आधी-अधूरी सहमति ठीक है लेकिन 100 प्रतिशत बनाम शून्य गलत है. ये सोच ग़लत है और ये तर्क अजीब.''

गुजरात में मोदी की नेतृत्व क्षमता को श्रेय ना देना उतना ही अनुचित होगा जितना ये कहना कि गुजरात में गरीबी नहीं है. जो बात मौजूद नहीं है, वो ये कि आम और राजनैतिक चर्चाओं में ग़रीबी और समाज में पिछड़ों का जिक्र नहीं है.

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