पैर गँवाने के बावजूद साइकिल चलाने में अव्वल

  • 18 दिसंबर 2012
आदित्य
Image caption आदित्य एक पैर से विकलांग हैं और 28 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से साइकिल चलाते हैं.

किसी की ज़िंदगी में कोई बड़ा हादसा पेश आ जाए तो फिर एक धारणा ये बन जाती है कि अब कुछ किया नहीं जा सकता लेकिन हौसला अगर बुलंद हो तो फिर क्या कोई हादसा किसी को डिगा सकता है?

हैदराबाद के रहने वाले आदित्य मेहता के जीवन में सात साल पहले ऐसा ही दिन आया जब उनके पास टूटकर बिखर जाने के अलावा कुछ बचा नहीं.

आदित्य रोजाना की तरह अपनी मोटर बाइक पर सवार होकर काम पर निकले थे और उनकी बाइक को एक बस से धक्का लग गया.

बाइक के साथ आदित्य बस की चपेट में आ गए. इस हादसे में उन्होंने अपना एक पैर गंवा दिया. डॉक्टरों को उनका एक पैर काटना पड़ गया.

किसी भी आम आदमी की तरह करीब दस-बारह दिनों तक आदित्य बुरी तरह मानसिक तनाव में रहे लेकिन ये वक्त लंबा नहीं चला.

हौसला है बुलंद

दुर्घटना के सिर्फ महीने भर बाद ही बैसाखियों को थामे-थामे उन्होंने एयरपोर्ट का रुख़ किया क्योंकि उन्हें एक बहुत जरूरी बिज़नेस कान्फ्रेंस के लिए दक्षिण अफ्रीका जाना था.

बकौल आदित्य, "दुर्घटना के केवल दस-बारह दिन तक ही उदास और परेशान रहा लेकिन फिर मैंने कभी उसके बारे में नहीं सोचा. एक महीने बाद ही जबकि मेरा घाव नहीं सूखा था, मैं बैसाखियों का सहारा लेकर एक बिज़नेस कान्फ्रेंस में भाग लेने दक्षिण अफ्रीका भी गया."

आदित्य की खुशनसीबी है कि वो एक ऐसे संपन्न परिवार के सदस्य थे. आदित्य कपड़ों के व्यवसायी हैं.

लेकिन अपनी अपंगता का रोना रोकर उन्होंने कभी खुद को आरामतलबी का शिकार नहीं होने दिया.

आज वो हजारों अपंगों के लिए मिसाल की तरह हैं क्योंकि उन्होंने एक पैर से विकलांग होने के बावजूद साइकिल सीखी और आज साइकिल प्रतियोगिता में हिस्सा लेने के काबिल भी बन गए हैं.

दुरुस्त लोगों के साथ वो साइकिल प्रतियोगिता में हिस्सा लेते हैं और अच्छी पायदान भी पाते हैं.

आदित्य तीस साल के हैं और उन्होंने हाल ही में एक असाधारण सा कदम उठाते हुए हैदराबाद से बेंगलुरु तक की 585 किलोमीटर की दूरी साइकिल से तय की.

ये दृश्य किसी भी व्यक्ति के लिए अचंभित कर देने वाला था क्योंकि एक पैर और दूसरे कृत्रिम पैर के सहारे ही आदित्य हैदराबाद से बेंगलुरु पहुंचे थे.

हादसे के बाद आदित्य ने कृत्रिम पैर लगवाया है.

'डरो नहीं आगे बढ़ो'

आदित्य कहते हैं कि वो वैसे लोगों का हौसला बढ़ाना चाहते हैं जो किसी हादसे के बाद खुद को बेकार मान बैठते हैं.

आदित्य ने बीबीसी से बातचीत में कहा, “मैंने हैदराबाद से बेंगलुरू की सवारी यही बताने के लिए की है कि अगर आप अपना कोई अंग खो भी दें तब भी आप कई काम कर सकते हैं कई गतिविधियों में भाग ले सकते हैं."

आदित्य के इस कदम से हैदराबाद विकलांग क्लब के लोग भी काफी खुश हैं. क्लब के सदस्य मनोहर कहते हैं, "हम आदित्य को 2016 के रिओ पैरा ओलंपिक्स में साइकिलिंग की प्रतिस्पर्धा में भेजने की तैयारी कर रहे हैं. अब तक किसी भारतीय ने इस मुकाबले में हिस्सा नहीं लिया है.

आदित्य का हौसला बुलंद है ज़ाहिर है कि इस मुकाबले में भी वो अव्वल आने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ेंगे और ऐसे में लोगों की दुआएं की उन्हें जरूरत होगी तो फिर आप दुआ जरूर कर सकते हैं.

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