नरेंद्र मोदी के लिए कितनी दूर है दिल्ली?

Image caption जीत की हैट्रिक के बाद मोदी ने राष्ट्रीय राजनीति में उतरने के संकेत दिए.

गुजरात में कामयाबी की 'हैट्रिक' लगाने के बाद ऐसा लग रहा है कि नरेंद्र मोदी राष्ट्रीय राजनीति में आने की ओर कदम बढ़ाना चाहते है.

पिछले एक महीने के दौरान उनके चुनाव अभियान को अगर देखें तो उन्होंने कभी हिंदी नहीं बोली. लोग उनसे कहते थे कि आप हिंदी बोलें तो भी वे नहीं बोलते थे.

लेकिन चुनावी जीत के बाद उन्होंने जो भाषण दिया, वो हिंदी में था. वो लंबा भाषण था लेकिन अगर आप उसे ध्यान से सुनें तो ऐसा लगता है कि वे हिंदी भाषी क्षेत्र के लोगों को संबोधित कर रहे थे.

बार-बार वे ये कह रहे थे कि गुजरात के मतदाता काफी परिपक्व हैं. वे जाति और क्षेत्र के आधार पर वोट नहीं देता है. ऐसा कहते हुए मोदी यूपी और बिहार के मतदाताओं को ये संदेश दे रहे थे कि हमारे मतदाताओं के इसी नज़रिए के चलते गुजरात एक विकास करता हुआ राज्य है.

इस दौरान राष्ट्रीय राजनीति में आने की उनकी महत्वाकांक्षा ज़ाहिर हो रही थी. हालांकि मोदी के लिए राह मुश्किलों से भरी है.

मुश्किल है डगर

सबसे बड़ी मुश्किल तो गठबंधन वाले दलों को साथ लेकर चलने की है. लेकिन मेरे ख्याल से अगर आप जनता दल यूनाइटेड को हटा दें तो राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) है कहां?

एनडीए में ज़्यादातर वैसी पार्टियां हैं जो या तो धर्म के नाम पर उनके साथ हैं या भारतीय जनता पार्टी की मानसिकता वाली ही हैं. एनडीए में बस जेडीयू ही एक पार्टी है जिसने ये रुख आपनाया है कि अगर मोदी प्रधानमंत्री के तौर पर उम्मीदवार बनते हैं तो बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, गठबंधन से हट जाएंगे.

लेकिन अगर इस हटाकर देखें तो मुझे नहीं लगता है कि उनकी स्वीकार्यता में कोई दिक्कत होगी.

इसके अलावा मोदी अब तक गुजरात में ही सक्रिय रहे हैं. तो एक सवाल ये भी उठता है कि वो दूसरे राज्यों में कितने स्वीकार्य होंगे. दरअसल मोदी प्रधानमंत्री के दावेदार और बीजेपी के सबसे बड़े नेता के तौर पर नहीं देखे गए.

लेकिन अगर भारतीय जनता पार्टी ने ऐसा फैसला ले लिया, हालांकि ऐसा अब तक हुआ नहीं है तो स्थितियां दूसरी होंगी.

हम ये भी नहीं कह सकते कि मोदी दूसरे राज्यों में स्वीकार्य हो जाएंगे. लेकिन ऐसा लगता है कि मोदी के पास एक मॉडल है जिसे लेकर वे दूसरे राज्यों की जनता के पास जा सकते हैं.

Image caption 2014 में भारतीय जनता पार्टी की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बन सकते हैं मोदी

निर्णय लेने वाले राजनेता की उनकी छवि है. वे इस छवि के साथ लोगों का समर्थन मांग सकते हैं. यही वजह है कि अभी जिस तरह की राजनीतिक शून्यता है उसमें मोदी ख़ुद को फ़िट देख रहे हैं.

आडवाणी से बेहतर हैं मोदी?

कई लोग मोदी की तुलना आडवाणी से भी करते हैं. लेकिन आडवाणी और मोदी में एक अंतर है.

बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद आडवाणी की छवि एक मज़बूत नेता की थी, लेकिन उन्होंने शासन बहुत अच्छा दिया हो, ऐसी बात नहीं थी. उनका कोई मॉडल नहीं था. छह साल जब वे शासन में रहे वे बहुत अच्छा नहीं कर पाए.

जबकि मोदी ने बीते 11 साल में बेहतर शासन दिया है. इस सबके बावजूद उनकी स्वीकार्यता पर सवाल तो है ही.

पिछले एक साल के दौरान वे अपनी छवि बदलने की कोशिश कर रहे हैं. रैली में शामिल होकर या फिर सदभावना यात्रा में शामिल हो कर वे कोशिश तो कर रहें हैं.

हालांकि उन्होंने ऐसा कोई बयान भी नहीं दिया है जिससे उनकी कट्टरपंथी वाली छवि भी नरम पड़े. तो वे दोनों कोशिशें एक साथ कर रहे हैं जो उनके लिए भी मुश्किल भरा है.

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