गुजरात में कांग्रेस की नाकामी की पाँच वजहें

 गुरुवार, 20 दिसंबर, 2012 को 16:34 IST तक के समाचार

गुजरात में लगातार तीसरी बार मोदी के सामने कोई चुनौती पेश नहीं कर सकी कांग्रेस

गुजरात में नरेंद्र मोदी की जीत पहले से ही तय मानी जा रही थी. बावजूद उनकी कामयाबी सरप्राइज़ से कम नहीं है. ये सरप्राइज़ है कांग्रेस की रणनीति का बुरी तरह फ़ेल हो जाना.

कांग्रेस ने इस चुनाव को त्रिकोणीय बनाने की कोशिश की. केशुभाई पटेल को आगे कर उसका इरादा भारतीय जनता पार्टी के वोट शेयर को कम करना था.

तो क्या उनकी रणनीति क़ामयाब हुई, आइए जानते हैं कांग्रेस की विफलताओं के बारे में-

1- पटेल पर ज़्यादा ध्यान

केशुभाई पटेल को आगे करने का का थोड़ा बहुत असर जूनागढ़ और अमरोली में ज़रूर दिखा लेकिन भावनगर और सुरेंद्रनगर में इसका कोई असर नहीं दिखा.

इसके अलावा कांग्रेस ने चुनाव में लेहुवा पटेल समुदाय पर ज़्यादा ध्यान दिया. इससे दूसरी पिछड़ी जातियां और कोली समुदाय कांग्रेस से अलग हो गया. इसका कांग्रेस को काफ़ी नुकसान हुआ.

इतना ही नहीं राज्य में कांग्रेस के तमाम बड़े नेता चुनाव हार गए. चाहे वो पार्टी के राज्य अध्यक्ष अर्जुन मोडवाडिया हों या फिर विपक्ष के नेता शक्ति सिंह गोहिल हों. जनजातीय समुदाय के बडे़ नेता मोहन सिंह राठवा हों या फिर पूर्व कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष सिदार्थ पटेल, ये सभी चुनाव हार गए हैं.

2- टिकट बँटवारे में ग़लती

कांग्रेसी रणनीति की सबसे बड़ी खामी टिकट बंटवारे के दौरान हुई.

टिकटों के बंटवारे ने कांग्रेस के मंझे हुए नेता नरहरि अमीन, मोहन रावल और सागर रायका को नाराज़ कर दिया. ये लोग पार्टी छोड़कर चले गए. कांग्रेस ने जीतने लायक उम्मीदवारों को टिकट नहीं दिया. बल्कि उसने अपने मौजूदा विधायकों को टिकट दिया.

ये रणनीति उल्टी पड़ गई. कांग्रेस को अपने 83 नेताओं के टिकट काटने चाहिए थे. यह नहीं किया गया.

3- मुख्यमंत्री लायक़ नेता

कांग्रेस के राष्ट्रीय नेताओं का गुजरात की जनता पर मज़बूत पकड़ नहीं

एक ओर तो कांग्रेस के बड़े नेता पार्टी का साथ छोड़ रहे थे दूसरी ओर पार्टी के पास ऐसा चेहरा नहीं था जो मुख्यमंत्री का दावेदार हो सकता था. ये चीज़ें चुनाव में अहम भूमिका अदा करती हैं.

कांग्रेस के बड़े नेता, मसलन पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और राहुल गांधी जैसे लोग चुनाव प्रचार करने जरूर पहुंचे लेकिन गुजरात की जनता पर इसका ज़्यादा असर नहीं होता.

ये बात कांग्रेस के साथ-साथ बीजेपी के लिए भी सटीक बैठती है. इसलिए चुनाव के अंतिम दस दिनों के दौरान बीजेपी का कोई बड़ा नेता गुजरात में चुनाव प्रचार में नजर नहीं आया. मोदी ने बड़े नेताओं की जगह पॉपुलर छवि वाले सिनेमाई सितारे हेमा मालिनी, विनोद खन्ना, परेश रावल और स्मृति ईरानी जैसे लोगों को ज़्यादा तरजीह दी.

4- कांग्रेस का डिफ़ेंसिव रुख़

बहरहाल, एक हकीकत यह है कि इस चुनाव में मोदी को घेरा जा सकता था. इसमें कांग्रेस पूरी तरह नाकाम हुई है. कांग्रेस शुरू से ही इस चुनाव में डिफेंसिव रुख अपना रही थी.

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के साथ तालमेल से भी पार्टी को नुकसान हुआ.

उसे मतदाताओं के सामने साफ-साफ अपना संदेश देना चाहिए था. लेकिन उसके नेता मोदी का नाम लेते हुए डर रहे थे. ऐ

से कई मुद्दे थे जिनके इर्द-गिर्द मोदी को घेरा जा सकता था.

इस चुनाव में कांग्रेस के नेताओं ने गोधरा कांड का उल्लेख करने से परहेज़ किया. मोदी के राज में इनकाउंटर की बात को भी मुद्दा नहीं बनाया गया. मोदी ने सद्भावना छोड़ दी है, इसे भी मुद्दा बनाया जा सकता था.

5- विकास पर घेरने में नाकामी

2014 में प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के लिए मोदी की तगड़ी दावेदारी

कांग्रेस ने नरेंद्र मोदी के सामने महज विकास को मुद्दा बनाया. लेकिन वे आम जनता को ये बताने में कामयाब नहीं हुए कि विकास के मामले में मोदी की नाकामियां क्या हैं.

अलग-अलग इलाकों में विकास संबंधी अपनी मुश्किलें बनी हुई हैं. मसलन उत्तरी गुजरात में बिजली का संकट बना हुआ है. सौराष्ट्र के इलाके में पानी का संकट है.

जनजातीय इलाके में विकास बहुत कम हुआ है. वहां बेरोजगारी भी है, इन इलाकों में अच्छे अस्पताल और विश्वविद्यालय तक नहीं हैं. इन मुद्दों को कांग्रेस अपना हथियार बना सकती थी. लेकिन कांग्रेस ऐसा करने में नाकाम रही.

भाजपा की उम्मीद

एक तो कांग्रेस इन मुद्दों को हवा देने में नाकाम रही दूसरी ओर गुजरात की जनता के सामने नरेंद्र मोदी जैसा चेहरा था. गुजरात की जनता ने उन्हें भविष्य के प्रधानमंत्री के तौर पर भी पेश किया है.

गुजरात की जनता चाहती है कि मोदी को दिल्ली भेजा जाए. भारतीय जनता पार्टी को उनकी ज़्यादा जरूरत है. मोदी को 2014 में प्रधानमंत्री के तौर पर पेश करना ही पार्टी के लिए बेहतर कदम होगा.

इस चुनावी नतीजे पर बात केशुभाई पटेल के जिक्र के बिना पूरी नहीं होगी. केशुभाई पटेल को बहुत ज़्यादा सीटें नहीं मिली हैं लेकिन उनका प्रदर्शन अच्छा रहा है. उन्हें सौराष्ट्र इलाके में करीब तेरह फ़ीसदी मत मिले हैं. तीन महीने पुरानी पार्टी के लिए तेरह फ़ीसदी मत और तीन सीटें कोई ख़राब प्रदर्शन नहीं है.

( अजय उमठ से बीबीसी संवाददाता ज़ुबैर अहमद की बातचीत पर आधारित)

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