नक्सली: दिग्विजय की राय सरकार से अलग

 गुरुवार, 20 दिसंबर, 2012 को 12:00 IST तक के समाचार
दिग्विजय सिंह

दिग्विजय सिंह सार्वजनिक रूप से चिदंबरम की नीतियों का विरोध करते रहे

मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह कहते हैं कि नक्सली समस्या क़ानून व्यवस्था की समस्या नहीं बल्कि सामाजिक-आर्थिक समस्या है और आदिवासियों को अधिकार देकर ही इस समस्या का हल किया जा सकता है.

नक्सलियों पर लिखी गई शुभ्रांशु चौधरी की किताब 'उसका नाम वासु नहीं' का दिल्ली में लोकार्पण करने के बाद हुई चर्चा में दिग्विजय सिंह ने कहा कि सुरक्षाबलों का प्रयोग करके इस समस्या को हल नहीं किया जाना चाहिए और इसी वजह से उन्होंने सलवा जुड़ूम का कभी समर्थन नहीं किया.

उन्होंने कहा कि जो लोग ज़िम्मेदार नहीं है और जिनकी जवाबदेही नहीं है, उनके हाथों में हथियार देना ग़लत फ़ैसला है.

लोकार्पण समारोह में मौजूद एक श्रोता के सवाल के जवाब में कांग्रेस नेता ने कहा कि उन्होंने कभी भी सलवा जुड़ूम अभियान से जुड़े छत्तीसगढ़ के कांग्रेस नेता महेंद्र कर्मा का समर्थन नहीं किया.

आदिवासियों को अधिकार

उनका कहना था कि आदिवासियों को ग्राम स्वराज के ज़रिए और छठीं अनुसूची लागू करके ख़ुद फ़ैसला करने का अधिकार दिया जाना चाहिए.

"खनन का लाभ आदिवासियों को दिए जाने के लिए सबसे अच्छा रास्ता है कि खनिज के हर टन की रॉयल्टी का एक हिस्सा आदिवासियों को दे दिया जाए"

दिग्विजय सिंह

उन्होंने कहा कि अविभाजित मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में सात साल तक छत्तीसगढ़ के भी मुख्यमंत्री थे और उन्होंने ग्राम स्वराज और विशेष क़ानून पेसा के ज़रिए ऐसा करने का प्रयास किया था.

उन्होंने कहा कि नक्सली समस्या हल करने की दिशा में पहला क़दम आदिवासी इलाक़ों से मध्यस्थों या ठेकेदारों को हटाने का होना चाहिए. उन्होंने तेंदूपत्ता का उदाहरण देते हुए कहा कि अर्जुन सिंह ने ऐसा किया था लेकिन छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार ने फिर ठेकेदारों को शामिल कर लिया है.

दिग्विजय सिंह का कहना था कि आदिवासी इलाक़ों में हो रही माइनिंग या खनिज उत्खनन का लाभ आदिवासियों को देने के लिए लाभांश देने का प्रयोग कभी सफल नहीं होगा क्योंकि खनन कर रही कंपनियाँ अपने सीए के ज़रिए बैलेंस शीट में हमेशा घाटा दिखाती रहेंगीं.

उन्होंने सुझाव दिया, "खनन का लाभ आदिवासियों को दिए जाने के लिए सबसे अच्छा रास्ता है कि खनिज के हर टन की रॉयल्टी का एक हिस्सा आदिवासियों को दे दिया जाए."

उनका कहना था कि अंग्रेज़ों ने 1927 में जो जंगल क़ानून बनाया था उसने आदिवासियों को जंगल पर उनके अधिकार से वंचित कर दिया और इस क़ानून को बदलने की ज़रुरत है.

इस सवाल पर कि केंद्र में उनकी सरकार है और वे इस क़ानून को बदलने का प्रयास क्यों नहीं करते, उन्होंने कहा कि ये आसान नहीं है लेकिन वे प्रयास करते रहे हैं.

'दिग्विजय या चिदंबरम?'

शुभ्रांशु चौधरी की किताब 'उसका नाम वासु नहीं'

शुभ्रांशु चौधरी ने कहा कि नक्सली समस्या के हल के लिए आगे चर्चा की जानी चाहिए

लेखक शुभ्रांशु चौधरी ने अपनी किताब का हवाला देते हुए कहा कि ये समस्या महुआ बनाम मेटल (खनिज) की है.

उनका कहना था कि बस्तर में महुआ से लेकर इमली तक जंगल में पैदा होने वाले उत्पादों पर आदिवासियों को हक़ दे देना चाहिए और उन्हें ही फ़ैसला करने देना चाहिए कि वे महुआ के आधार पर जीवन यापन करना चाहते हैं या मेटल के आधार पर.

नक्सलियों के ख़िलाफ़ बल प्रयोग को ग़लत बताते हुए उन्होंने कहा कि ये फ़ैसला देश को करना है कि दिग्विजय चाहिए या चिदंबरम.

उल्लेखनीय है कि पी चिदंबरम के गृहमंत्री रहते हुए केंद्र सरकार ने सलवा जुड़ूम का समर्थन किया और नक्सलियों के ख़िलाफ़ भारी बल प्रयोग किया गया. यहाँ तक कि बस्तर में सेना की तैनाती पर भी चर्चा होने लगी थी.

सलवा जुड़ूम के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में क़ानूनी लड़ाई लड़ने वाली समाजशास्त्री और कार्यकर्ता नंदिनी सुंदर ने कहा कि सरकार कभी ग्राम स्वराज का नाम लेकर तो कभी छठवीं अनुसूची का नाम लेकर आदिवासियों का शोषण करती रही है और उसे ऐसा करना बंद करना चाहिए.

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