वो कौन थी?

 बुधवार, 2 जनवरी, 2013 को 16:46 IST तक के समाचार
सामूहिक बलात्कार, दिल्ली

दिल्ली में हुए सामूहिक बलात्कार की घटना से पूरे देशभर में आक्रोश है और प्रदर्शन जारी है

बर्बर सामूहिक बलात्कार की पीड़ित 23 वर्षीय लड़की के परिवार वालों से बातचीत के बाद उस लड़की की छवि एक ऐसी निर्भीक और दृढ़ महिला के रूप में उभरती है जिसकी प्रबल इच्छा थी कि वह अपने परिवार की तरक्की में योगदान दे पाए.

दिल्ली में जन्मी, पली-बढ़ी ये छात्रा तभी से डॉक्टर बनना चाहती थी जबसे उसने गुड़ियों के साथ खेलना शुरू किया.

भले ही अपने जीवन काल में वो कुछ ही बार अपने गाँव आई थी, उसका सपना था कि वह अपने गाँव में एक अस्पताल बनवा सके.

सभी गाँव वालों को पता है कि बिटिया डॉक्टरी की पढ़ाई कर रही थी.

गाँव से सबसे नजदीकी अस्पताल कम से कम 12 किलोमीटर की दूरी पर है. गाँव की पगडंडियाँ इतनी खराब है कि बरसात में गाँव से बाहर जाना चुनौतियों से भरा होता है.

आँखों में बेहद मुश्किल से आँसू आने से रोकते हुए उनके पिता ने कहा, “उसने मुझसे कहा कि पापा मुझे डॉक्टरी पढ़ाओ, मैंने अपनी कमजोर आर्थिक परिस्थिति का हवाला दिया. मैंने रिश्तेदारों के माध्यम से उसे समझाने की कोशिश की. मैंने उससे कहा कि हम अपने आर्थिक स्तर के मुताबिक तुम्हें पढ़ाएंगे. मैंने उसे बोल दिया था कि मैं तुम्हे डॉक्टरी नहीं पढ़ाऊँगा.”

उनके पिता बताते हैं कि इस बातचीत के थोड़ी देर बाद उनकी बेटी को चक्कर आया और वो गिर गई.

उन्होंने उसे उठाया और कहा, “बेटा तुम्हें जो पढ़ना है तुम पढ़ो. अगर इसके लिए मुझे अपने आपको भी गिरवी रखना पड़ेगा तब भी हम तुम्हें पढ़ाएँगे.”

जिम्मेदारी का अहसास

"उसका सपना एमबीबीएस था, लेकिन मेरी उतनी क्षमता नहीं थी. इसलिए उसने फिजियोथेरपी का कोर्स किया. वह कहती थी कि अगर वह डॉक्टर बन जाएगी तो मुझे नौकरी नहीं करने देगी"

पीड़िता के पिता

बेटी ने पिता से कहा कि अगर वो डॉक्टर बन जाएगी तो वह उन्हें नौकरी नहीं करने देगी. उनके पिता ने बताया, “उसने कहा कि जब तक मेरे भाई पढ़ नहीं लेते, मैं शादी नहीं करूँगी.”

दिन-रात मेहनत करने वाली ये लड़की जिंदगी में परिवार के लिए कुछ बड़ा हासिल करना चाहती थी. ये मेहनत का ही फल था कि पिता की इस लाड़ली का घर ट्रॉफियाँ से भरा हुआ है.

परिवार के पास दो बीघा जमीन थी लेकिन बच्चों को अच्छी शिक्षा देने के लिए एक बीघा जमीन बेचनी पड़ी और दूसरे बीघा को गिरवी रखना पड़ा.

दरअसल उनके पिता ने दिल्ली के एक बैंक के कई चक्कर मारे थे ताकि छात्रों को दिए जाने वाले कर्ज को हरी झंडी मिले, लेकिन आखिर में बैंक ने कर्ज देने से इनकार कर दिया.

उनके पिता बताते हैं कि उनकी बेटी बेहद जिद्दी थी, और उसकी जिद ही थी कि उसने जिंदगी की उँचाइयों को हासिल करने की कोशिश की.

उसके जिद्दीपने का उदाहरण देते हुए वह बताते हैं, “जब वो चौथी कक्षा में पढ़ने जाती थी तो रास्ते में मिठाई की दुकान पड़ती थी. वो मिठाई लेकर ही हटती थी, नहीं तो लोटपोट हो जाती थी.”

वो किताबों को अपना दोस्त बताया करती थी. गणित से उसे खास प्रेम था.

कमाने के दूसरे संसाधनों की तलाश में ये परिवार 1983 में दिल्ली आया.

सपना रह गया अधूरा

सामूहिक बलात्कार, दिल्ली

घर की परिस्थितियां उसे सपने देखने की इज़ाजत नहीं दे रहीं थी लेकिन उस लड़की ने हार नहीं मानी

उनके दादा ने हमसे कहा, “हमें उस पर गर्व था. उसे पता था कि हमारे गाँव में कोई व्यवस्था नहीं है. उसने कहा था कि अगर वो डॉक्टर बनती है तो उसका प्रयास होगा कि किसी अस्पताल की व्यवस्था हो जाए ताकि स्थानीय लोगों की सेवा हो.”

उनके पिता ने बताया, “उसका सपना एमबीबीएस था, लेकिन मेरी उतनी क्षमता नहीं थी. इसलिए उसने फिजियोथेरपी का कोर्स किया.”

लेकिन क्या उन्हें दिल्ली में महिलाओं के खिलाफ़ बढ़ती हिंसा को लेकर अपनी बेटी की सुरक्षा को लेकर चिंता नहीं होती थी?

उनके पिता के मुताबिक उनकी बेटी बेहद निडर लड़की थी और देहरादून और दिल्ली का सफर अकेले रात में किया करती थी.

गाँव में आना जाना बेहद कम था. तीन कमरे के छोटे से घर में जहाँ बिजली का कोई ठिकाना नहीं था, वहाँ उसकी बेहद बूढ़ी दादी अपनी पोती के जाने का गम मना रही थीं.

उनके पाँव काँप रहे थे, जबान लड़खड़ा रही थी. रोते हुए बताती हैं कि बेटी से मुलाकात हुए आठ साल हो चुके हैं और अब तो उससे कभी भी मुलाकात नहीं हो पाएगी.

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