हड़ताल बन रही है शिक्षकों की मौत की वजह

 गुरुवार, 3 जनवरी, 2013 को 17:24 IST तक के समाचार
हड़ताली शिक्षकों का जल सत्याग्रह

जानकार कहते हैं कि रमन सरकार की वादा खिलाफी से हजारों शिक्षाकर्मी अवसाद के शिकार हो गए हैं

छत्तीसगढ़ में पिछले एक महीने से चल रही शिक्षाकर्मियों की हड़ताल के बीच अब तक 15 शिक्षकों और उनके तीन परिजनों की विभिन्न कारणों से मौत हो चुकी है. इनमें से चार लोगों ने आत्महत्या कर ली है.

छत्तीसगढ़ के लगभग दो लाख शिक्षाकर्मी, शिक्षा विभाग में अपने संविलयन को लेकर पिछले कई दिनों से राजधानी रायपुर में प्रदर्शन कर रहे हैं. हड़ताली शिक्षक जल सत्याग्रह भी कर चुके हैं.

शिक्षाकर्मी संघ के अध्यक्ष संजय शर्मा का कहना है कि पिछली बार चुनाव के समय राज्य के मुख्यमंत्री रमन सिंह ने घोषणा की थी कि हर साल 20 प्रतिशत शिक्षाकर्मियों का शिक्षा और पंचायत विभाग में संविलयन किया जायेगा, लेकिन मुख्यमंत्री अपने वादे को भूल गए.

उनका यह भी कहना है कि सरकार शिक्षाकर्मियों की बात तक सुनने को तैयार नहीं है.

इस हड़ताल का एक दु:खद पहलू यह है कि इस दौरान एक के बाद एक शिक्षक या तो इलाज के अभाव में मौत के मुंह में समा रहे हैं या फिर आत्महत्या कर रहे हैं.

छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ पत्रकार रुचिर गर्ग बताते हैं कि पिछले दिनों एक शिक्षाकर्मी की दिल का दौरा पड़ने से उस वक्त मौत हो गई, जब उसने घर पहुंच कर निलंबन का नोटिस देखा.

रुचिर गर्ग बताते हैं कि इसके कुछ घंटों बाद ही उस शिक्षाकर्मी की पत्नी ने भी आत्महत्या कर ली. उनके मुताबिक अब तक हड़ताल के दौरान बारह लोगों की मौत हो चुकी है जिनमें नौ शिक्षाकर्मी शामिल हैं.

क्या कहती है रमन सरकार

रमन सरकार के प्रवक्ता बृजमोहन अग्रवाल का कहना है कि सरकार हड़ताली शिक्षाकर्मियों के प्रति सहानुभूति रखती है.

उनका कहना है कि रमन सरकार ने अपने वादे पूरे किए हैं. वे कहते हैं कि जब रमन सरकार बनीं तब शिक्षाकर्मियों को 2500 रूपए वेतन मिलता था जो अब 15,000 रूपए तक पहुंच गया है.

उनका दावा है कि ये वेतनमान कई राज्यों के शिक्षकों को मिल रहे वेतन से कहीं बेहतर है.

बृजमोहन अग्रवाल ये भी कहते हैं कि शिक्षाकर्मी जिन शर्तों पर सेवा में आए थे, उन शर्तों के हिसाब से उन्हें कुछ भी मांगने का अधिकार नहीं है.

हड़ताली शिक्षाकर्मियों में से कुछ की मौत पर उनका कहना है कि मौत की वजह पारिवारिक कलह है, सरकार की नीति से इसका कुछ लेना देना नहीं है.

उनका ये भी कहना है कि सरकार विकास को दरकिनार करके सारा पैसा वेतन में नहीं बांट सकती है.

'सत्ता का दंभ'

गर्ग के मुताबिक सरकार ने शिक्षकों को बर्खास्तगी और निलंबन का नोटिस दे रखा है, जिसकी वजह से 18 शिक्षकों ने या तो आत्महत्या कर ली या फिर अन्य कारणों से उनकी मौत हो गई है.

उनके मुताबिक सरकार की इस कार्रवाई से हजारों की तादाद में शिक्षाकर्मी बुरी तरह से अवसाद के शिकार हो गए हैं.

वहीं शिक्षाकर्मियों का कहना है कि वे लोग तो सिर्फ उसी मांग की याद दिला रहे हैं जिनका वादा सरकार ने चुनाव से पहले किया था.

इस बीच ये मामला विधान सभा सत्र में भी उछला और कई दिनों तक सदन में हंगामा हुआ. प्रदेश कांग्रेस महासचिव भूपेश बघेल आरोप लगाते हैं कि सरकार सत्ता के दंभ में मानवीय संवेदना भी भूल गई है.

इस बीच बुधवार को राज्य सरकार की ओर से प्रमुख सचिव विवेक ढांड ने 12 से 14 वर्ष की सेवा दे चुके शिक्षाकर्मियों को छठे वेतनमान की पेशकश की, जिसे शिक्षाकर्मियों ने एक सिरे से ये कहते हुए खारिज कर दिया कि इससे केवल दो फीसदी शिक्षाकर्मियों को लाभ मिलेगा.

प्रमुख सचिव ने साफ तौर पर संविलियन की किसी भी संभावना से इंकार कर दिया.

अविभाजित मध्यप्रदेश में जुलाई 1994 से अप्रैल 1994 तक 500 रूपए से 1000 रूपए के सीमित मानदेय में शिक्षाकर्मियों की पहली बार भर्ती हुई थी.

वर्ष 1996 में भोपाल में शिक्षाकर्मियों ने उग्र आंदोलन किया, जिसके बाद से उन्हें 2000 से 3500 रूपए तक वेतन दिया जाने लगा.

पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा ने अपने घोषणा-पत्र में शिक्षकों के संविलयन की बात कही थी, लेकिन सरकार ने ऐसा नहीं किया. शिक्षक इसी से नाराज हैं.

राजधानी रायपुर में पिछले 22 दिनों से हजारों शिक्षाकर्मी अपनी मांगों को लेकर सप्रे शाला मैदान में डटे हुए हैं. मैदान में दिन भर भाषणों का दौर चलता है, शिक्षाकर्मी रात को सड़क पर ही सो जाते हैं और फिर अगली सुबह संविलयन के फैसले की उम्मीद लिए जाग जाती है और आंदोलन शुरू हो जाता है.

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