महाकुंभ: अंधविश्वास या आस्था?

 मंगलवार, 15 जनवरी, 2013 को 08:41 IST तक के समाचार

स्नान करने जाते नागा साधु

कुंभ पर लाखों लोगों ने सोमवार को संगम पर डुबकी लगाई. आने वाले दिनों में दसियों लाख लोग और डुबकियाँ लगाएँगे.

सवाल ये है कि लोग पृथ्वी पर होने वाले इस सबसे बड़े धार्मिक आयोजन को किस तरह देखते हैं.

बीबीसी ने यही सवाल क्लिक करें बीबीसी के फ़ेसबुक के पन्ने पर लोगों से पूछा कि कुंभ को वे किस तरह देखते हैं और चर्चा अंधविश्वास बनाम अटूट विश्वास बनकर उभरी. एक ओर जहां कई लोग कुंभ को भारतीय संस्कृति का हिस्सा और धार्मिक परंपरा मानते हैं वहीं कुछ लोग इसे अधंविश्वास को बढ़ाने वाला आयोजन कहते हैं.

बीबीसी हिंदी के फेसबुक पन्ने पर गणेश बेरवाल लिखते हैं, "कुंभ भारतीय जनता को मूर्ख और अन्धविश्वासी बनाने का अच्छा कारखाना है."

वहीं मूलचंद्र गौतम मीडिया की भूमिका पर सवाल उठाते हुए लिखते हैं कि फ़ेसबुक से पहले धर्म और संस्कृति पर कुंभ में पहले गंभीर चर्चाएँ होती थीं. अब तो खानापूरी भर है. उनके अनुसार महाकुंभ आस्था पर्व है.

"यह असल में एक अखिल भारतीय पर्व है जिसमे हर एक प्रांत के लोग शामिल होते हैं. कुंभ मेलों में पूर्ण कुंभ और उसमे भी इलाहाबाद के कुंभ का विशिष्ट स्थान है."

जिबान मिश्रा, बीबीसी हिंदी पाठक

बीबीसी हिंदी के फेसबुक पन्ने पर जिबान मिश्रा बीबीसी की कवरेज की तारीफ करते हुए लिखते हैं, "यह असल में एक अखिल भारतीय पर्व है जिसमे हर एक प्रांत के लोग शामिल होते हैं. कुंभ मेलों में पूर्ण कुंभ और उसमे भी इलाहाबाद के कुंभ का विशिष्ट स्थान है. मैं पिछले कई दिनों से बीबीसी हिंदी की वेबसाइट पढ़ रहा हूँ और मुझे ऐसा लग रहा है कि जैसे मैं वहाँ खुद मौजूद हूँ."

महाकुंभ की आलोचना करनेवालों से बीबीसी हिंदी के फेसबुक पन्ने पर विनोद द्विवेदी लिखते हैं, "फेसबुक पर कुछ लोग कह रहे हैं कि कुंभ बकवास है, लोगों को मूर्ख बनाने का तरीका है. लेकिन मैं ये नहीं समझ पा रहा हूं कि क्या ये लोग तर्क के आधार पर बोल रहे हैं या फिर कहने भर के लिए कहते हैं. कुंभ में वही लोग हैं जिन्होंने भारतीय संस्कृति को बनाए रखा है. हमारे बीच में ही ऐसे लोग हैं जो अपनी संस्कृति को बुरा कहते हैं और दूसरों की संस्कृति को अच्छा बताते हैं."

बीबीसी हिंदी के फेसबुक पन्ने पर नवल जोशी लिखते हैं, "इतनी गरीबी और कठिन जिंदगी के बावजूद यह बात हैरत से भर देती है कि आम लोगों में अमृत तत्व (जो मरता नहीं,अविनाशी है)के प्रति इतनी चेतना है, उत्कंठा है. इससे पता चलता है कि यहॉ के आम जनमानस ने मानसिक विकास के किन चरम बिन्दुओं को छुआ है. लेकिन यह भी सच है कि पाखण्ड और आडम्बर की राख इतनी छाई हुई है कि हमारी चेतना के सूर्य का तेज,चमक और आभा इसको अभी तक भेद नहीं सकी है. यह एक चुनौती है, लेकिन जनमानस की चेतना वाकई अतुल्य भारत!"

पंकज कुमार कुशवाहा लिखते हैं. "महांकुभ जैसे आयोजन बकवास हैं, महंत सफारी कार में चलते हैं, साधु चांदी के हौदे में चलते हैं, ये साधु के नाम पर कलंक हैं."

इस बहस के बीच भी कुंभ जारी है और लाखों लोग संगम पर जुट रहे हैं 'पवित्र स्नान' के लिए.

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