कुंभ मेला भी हाईटेक हो गया है

 गुरुवार, 17 जनवरी, 2013 को 08:09 IST तक के समाचार
कुंभ

कुंभ मेले में मीडिया के लिए तामझाम ज़बर्दस्त है

महाकुंभ में सूचना तकनीक के नाम पर सीसीटीवी कैमरे, लाइव स्ट्रीमिंग, आकर्षक वेबसाइट और जीपीएस टैगिंग की व्यवस्था है जो सुनने में बहुत ज़बर्दस्त लगती है लेकिन इससे आम श्रद्धालुओं को कम ही फायदा है.

कुंभ में आने वाली अधिकतर आबादी बूढ़ों और महिलाओं की है और उनके लिए सूचना तकनीक फोन से आगे कुछ भी नहीं हैं.

जो विदेशी हैं वो वेबसाइट पर जानकारी लेते हैं, लेकिन आम तौर पर वो भी सामान्य ज़रुरतों के लिए किसी न किसी अखाड़े के संपर्क में होते हैं.

तो फिर फायदा किसे हुआ है और क्या है व्यवस्था, मैंने यही सवाल रखा मेला के डिवीजनल कमिश्नर देवेश चतुर्वेदी के सामने.

उनका कहना था, ''हमने सुरक्षा के लिए सीसीटीवी लगवाए हैं और बड़ी स्क्रीनें भी लगाई हैं जिसके ज़रिए लोगों को जानकारी मिल सकेगी कि अभी संगम पर कितने लोग हैं और उन्हें किधर जाना चाहिए और किधर नहीं जाना चाहिए.''

देवेश बताते हैं, ''इसके अलावा पुलिस कंट्रोल रूम में फोन और मोबाइलों की सुविधा है जिस पर इस बार अधिक सवाल और शिकायतें आने की संभावना है. क्योंकि हर आदमी के पास आजकल मोबाइल है.''

और ये जीपीएस टैगिंग क्या है और इसके क्या लाभ होंगे.

कुंभ मेला

कुंभ मेले में इस तरह के विशाल स्क्रीन देखे जा सकते हैं

इस सवाल पर वे बताते हैं, ''जीपीएस टैगिंग के ज़रिए हम मेला में कौन सी चीज़ कहां हैं- ये जानकारी वेबसाइट पर उपलब्ध करा देंगे जिसे और लोग भी ले सकेंगे और जानकारी फैलेगी. इससे ये भी फायदा होगा कि कौन सी संस्था कहा हैं, मेले में ये सबको पता लग सकेगा.''

वे कहते हैं, ''ये एक स्थायी रिकार्ड हो जाएगा जिसका फायदा आने वाले समय में कुंभ में होगा क्योंकि सबको पता होगा कि कमोबेश कौन सा तंबू कहां था और उसे कहां जगह मिलनी चाहिए.''

दावे और हकीकत

बात तो सही है, लेकिन इस तरह की हाईटेक व्यवस्था से आम आदमी को शायद ही कोई मतलब है. वो तो नंगे पैर चलता है और सीधे संगम तक पहुंचता है. वहां नहाता है और वापस लौट जाता है.

बरसों से इलाहाबाद में रह रहे वरिष्ठ पत्रकार सुनील शुक्ला कहते हैं कि सूचना तकनीक का सबसे बड़ा फायदा मीडिया को हुआ है.

वो कहते हैं कि मीडिया सेंटर बहुत आकर्षक और हाईटेक है लेकिन कई चीज़ें ऐसी हैं जिसकी ज़रूरत कम लोगों को है.

वो बताते हैं, ''सीसीटीवी का फायदा पुलिस को है. अब ये बताइए जो बड़ी स्क्रीन लगी हैं, वो तो दिन में चलेंगी नहीं. स्नान दिन में होता है. भगदड़ तो तब ही मच सकती है. तो इन स्क्रीनों का क्या फायदा है. दिन में इस पर कुछ दिखेगा नहीं.''

खोया-पाया सेंटर

"सीसीटीवी का फायदा पुलिस को है. अब ये बताइए जो बड़ी स्क्रीन लगी हैं, वो तो दिन में चलेंगी नहीं. स्नान दिन में होता है. भगदड़ तो तब ही मच सकती है. तो इन स्क्रीनों का क्या फायदा है. दिन में इस पर कुछ दिखेगा नहीं."

सुनील शुक्ला, वरिष्ठ पत्रकार

उधर खोया-पाया सेंटर में भी जब हम गए तो पता चला कि जो लोग खोते हैं, उनके नाम की पर्ची लिखी जाती है और वो पुलिस नियंत्रण कक्ष को दी जाती है जो घोषणा करती है. यानी यहां किसी हाईटेक व्यवस्था की ज़रूरत नहीं है.

मेले में आए लोगों से जब मैंने बात की तो उनका कहना था कि यहां तो स्नान भर का काम है. बहुत कम लोग ही ऐसे मिले जिन्होंने कुंभ की वेबसाइट भी देखी हो.

सुनील शुक्ला कहते हैं, ''आप वेबसाइट देख लीजिए, आपको पता चल जाएगा कैसी व्यवस्था है. आकर्षक तो बिल्कुल नहीं है. बदइंतज़ामी है. मीडिया के लिए लाइव स्ट्रीमिंग तो कर दी गई है लेकिन पत्रकारों को सूचना फोन करके दी जाती है, वो भी चुनिंदा लोगों को. एसएमएस ही करवा देते तो कितना फर्क पड़ता ये सोचिए.''

बात सही है मीडिया के लिए तामझाम ज़बर्दस्त था. एक निजी ग्रुप प्रभातम को ज़िम्मेदारी दी गई है कि मीडिया को फोटो, लाइव फुटेज, लाइव वगैरह के लिए स्टूडियो मुहैया कराए.

बड़ा सा हॉल है जहां कई कंप्यूटर हैं जिस पर खबरें भेज सकते हैं. इंटरनेट इस्तेमाल कर सकते हैं और वीडियो संपादित कर सकते हैं.

व्यवस्था अच्छी है, मेला हाईटेक हुआ है लेकिन इसका फायदा उन चुनिंदा लोगों को ही हो रहा है जो खुद हाईटेक हैं और ऐसे लोग कुंभ जैसे आयोजनों में कम ही आते हैं.

इसे भी पढ़ें

BBC © 2014 बाहरी वेबसाइटों की विषय सामग्री के लिए बीबीसी ज़िम्मेदार नहीं है.

यदि आप अपने वेब ब्राउज़र को अपडेट करते हुए इसे स्टाइल शीट (सीएसएस) के अनुरूप कर लें तो आप इस पेज को ठीक तरह से देख सकेंगे. अपने मौजूदा ब्राउज़र की मदद से यदि आप इस पेज की सामग्री देख भी पा रहे हैं तो भी इस पेज को पूरा नहीं देख सकेंगे. कृपया अपने वेब ब्राउज़र को अपडेट करने या फिर संभव हो तो इसे स्टाइल शीट (सीएसएस) के अनुरुप बनाने पर विचार करें.