हर गुमशुदा बच्चे का एफआईआर जरूरी: सुप्रीम कोर्ट

  • 17 जनवरी 2013
Image caption सुप्रीम कोर्ट में याचिका की सुनवाई अभी जारी रहेगी.

सुप्रीम कोर्ट ने गुमशुदा बच्चों के सभी मामलों में प्राथिमिकी यानी एफआईआर दर्ज किए जाने को अनिवार्य कर दिया है.

मुख्य न्यायधीश अलतमस कबीर की अगुवाई वाली तीन जजों की खण्डपीठ ने बच्चों की गुमशुदगी के मुद्दे पर राज्य सरकारों के ढुलमुल रवैये पर भी कड़ी नाराज़गी जताई है.

सुप्रीम कोर्ट ने ये निर्देश एक स्वंयसेवी संस्था, बचपन बचाओ आंदोलन, की एक याचिका की सुनवाई करते हुए दिए.

अदालत ने गुजरात, तमिल नाडु, उड़ीसा, हिमाचल प्रदेश, गोवा और अरुणाचल प्रदेश के मुख्य सचिवों को भी मामले में तलब किया है और कहा है कि पांच फरवरी को उसके सामने पेश हों.

राज्य सरकारों के आंकड़ो का हवाला देते हुए स्वंयसेवी संस्था ने कहा कि मुल्क भर में साल भर के दौरान कम से कम एक लाख गुम हो जाते हैं.

देश भर में होने वाले विभिन्न तरह के अपराधों के आंकड़े मुहैया कराने वाली सरकारी संस्था राष्ट्रीय अपराध ब्युरो का कहना है कि इनमें से 30,000 से ज़्यादा वापस नहीं मिलते.

संस्था के अनुसार जहां लाख बच्चे साल भर में गायब होते हैं वहीं मात्र 10,000 मामलों की शिकायत ही पुलिस के पास दर्ज होती है.

बीबीए के वक़ील एच एस फुल्का ने बीबीसी को बताया कि, “एफआईआर दर्ज होने से फायदा ये होगा कि अखबार में बच्चे की फोटो छपेगी, जिससे उनके मिलने या उनकी पहचान होने की संभावना बढ़ जाएगी.”

शिकायत दर्ज करने में देरी

फुल्का के मुताबिक ज़्यादातर बच्चों के गुम होने पर मां-बाप जब पुलिस थाने जाते हैं तो उनकी शिकायत दर्ज करने के बजाए उन्हें कहा जाता है कि बच्चा आसपास ही होगा और ढूंढने की कोशिश करें तो मिल जाएगा.

फुल्का कहते हैं, “जब तक मां-बाप की बात मानकर 10-15 दिन में शिकायत दर्ज की जाती है, बच्चा कहीं का कहीं पहुंच चुका होता है, फिर उसे ढूंढना बहुत मुश्किल हो जाता है इसीलिए हमने कोर्ट से एफआईआर दर्ज करने का आदेश देने की गुहार लगाई थी.”

बीबीए के कैलाश सत्यार्थी ने बीबीसी को बताया कि उन्होंने अपनी याचिका में कोर्ट से गुमशुदा बच्चों को ढूंढने और उनके मां-बाप तक वापस पहुंचाने के बारे में दिल्ली में हाल में लागू हुए दिशा-निर्देशों को पूरे देश में लागू किए जाने की गुहार भी लगाई है.

सुप्रीम कोर्ट ने सभी पुलिस थानों में बाल कल्याण अधिकारी की अध्यक्षता में बच्चों के लिए विशेष पुलिस यूनिट बनाने के राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के सुझाव भी मान लिए हैं.

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