मेरा काम है शवों को अग्नि देना.....

Image caption डोम राजा परिवार के सदस्य अलग अलग शहरों में बसे हैं

बनारस में मृतकों के अंतिम संस्कार के लिए दो घाट काफी प्रसिद्ध हैं. पहला है यहाँ का मणिकर्णिका घाट और दूसरा है राजा हरिश्चंद्र घाट.

यहाँ दाह संस्कार कराने वालों को डोम राजा कह कर पुकारा जाता है. इन्हें भले ही डोम राजा नाम दिया गया है लेकिन समाज में इनकी स्थिति कोई बहुत अच्छी नहीं है.

हिंदू रीति रिवाजों के अनुसार मृतक के अंतिम संस्कार के समय इनकी भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है, लेकिन सामाजिक ताने बाने में इनका दर्जा निचला ही है.

हांलाकि मुख्य डोम परिवार आर्थिक रुप से काफी समृद्ध है, लेकिन काफी बड़े हो चुके परिवार के बाकी सदस्यों की हालत खस्ता ही है.

इसी डोम राजा परिवार का हिस्सा गुप्ता जी चौधरी ने 20 साल की उम्र से ही शवों को जलाना शुरु किया.

आग लगाना ही काम है

डोम राजा परिवार के पूर्वज कालू डोम चौधरी थे. कहा जाता है कि ये वही कालू डोम थे जिन्होंने सत्यवादी राजा हरीशचंद्र को खरीदा था.

55 साल के गुप्ता जी चौधरी कहते हैं कि ये राजा नाम उनके परिवार ने खुद नहीं रखा है, बल्कि जनता ने उनके परिवार को ये नाम दिया है.

डोम राजा का परिवार धीरे-धीरे काफी बड़ा होता गया और इस वक़्त करीब 100-150 लोगों का परिवार है जो न सिर्फ काशी बल्कि जौनपुर, बलिया, गाजीपुर के अलावा अन्य जगहों पर रहते हैं और दाह संस्कार कराते है.

किसी लाश को आग देना.. क्या इस काम में किसी तरह की झिझक नहीं होती? इस सवाल पर गुप्ता जी चौधरी कहते हैं कि ये तो सिर्फ एक काम है, चिता सजवाने से लेकर क्रिया कर्म कराना ही काम है और बदले में मृतक के परिवार वाले पैसे देते हैं.

वो कहते हैं कि अगर किसी गरीब के पास पैसे नहीं होते तो भी वो उनका संस्कार कराते हैं और उनके परिवार वाले गाँव जाकर उनका पैसा ज़रुर भेज देते है. उनका पैसा कभी मरता नहीं है.

मिथकों के मुताबिक काशी वो जगह है जहाँ मृतक को सीधे मोक्ष प्राप्त होता है. इसलिए इन डोम राजा का बड़ा महत्व है.

विद्युत शव दाह गृह से नुकसान

प्रमुख डोम राजा की पीढ़ियों में कुछ लोग काफी संपन्न हैं. ऐसा भी सुनने को मिलता है कि इन लोगों के पास इसलिए अकूत धन संपदा है क्योंकि गरीब परिवारों से इनकी पिछली पीढ़ियां मृतक परिवार से जमीनें अपने नाम लिखवा लिया करती थीं.

पर इस आरोप को गुप्ता जी चौधरी नकार देते हैं. वे कहते हैं कि जो कोई भी देता है अपनी श्रृद्धा से देता है और गरीब को तो वो खुद मदद करते हैं.

मु्र्दे जलाने का काम भी शिफ्टों में होता है, जिसकी शिफ्ट होती है, अगर वो नहीं है तो परिवार के दूसरे सदस्य इस काम को कर देते हैं.

पर अब राजा हरीशचंद्र घाट पर विद्युत शव दाह गृह भी है. इसलिए इन डोम राजाओं की रोजी पर असर पड़ा है, क्योंकि यहाँ किसी डोम की ज़रुरत नहीं पड़ती.

वक़्त तो बदल रहा है पर जब तक हिंदू रीति रिवाजों के मुताबिक अंतिम संस्कार होते रहेंगे डोम राजा की अहमियत बरकरार रहेगी.

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