फिज़ियोथेरेपी: इस इलाज में नहीं चाहिए दवा...

 रविवार, 20 जनवरी, 2013 को 13:50 IST तक के समाचार

फ़िज़ियोथेरेपिस्ट वेदांत कहते हैं कि लोगों को इस चिकित्सीय प्रक्रिया की जानकारी ना होना बड़ी समस्या है.

‘फ़िज़ीशियन’ और ‘फ़िज़ियोथेरेपिस्ट’ इन दोनों शब्दों के बीच अगर आप भी उलझे हुए हैं तो बीबीसी हिन्दी की पेशकश- पेशे ऐसे भी के अंतर्गत ये मुलाक़ात आपकी मदद करेगी. हमारी कोशिश है उन पेशेवरों तक पहुंचने की जिनकी भूमिका महत्वपूर्ण लेकिन कम चर्चित है.

मैने मुलाक़ात की फ़िज़ियोथेरेपिस्ट वेदांत शर्मा से और सबसे पहले यही पूछा कि अगर फ़िज़ियोथेरेपिस्ट को परिभाषित करना हो तो कैसे करेंगे ?

जवाब में वेदांत कहते हैं, “फ़िज़ियोथेरेपी इंसान की शारिरिक गतिविधियों से जुड़ी हुई चिकित्सा प्रक्रिया है. इसमें ज़्यादातर मरीज़ अन्य डॉक्टरों द्वारा हमारे पास भेजे जाते हैं. जैसे कोई आंशिक लकवे का शिकार हो गया हो औ उसके उस अंग को क्रियाशील करना हो, किसी को बहुत गहरी चोट के बाद दोबारा सामान्य रूप से चलने फिरने में मदद करनी हो या किसी का घुटना वगैरह बदला गया हो तो उसे फिर से सामान्य जीवन जीने के क़ाबिल बनाना एक फ़िज़ियोथेरेपिस्ट का पेशा है’’.

ये एक दवामुक्त चिकित्सा है जिसमें कुछ विशेष कसरतों और परामर्श के ज़रिए मरीज़ो का इलाज किया जाता है.

चुनौतियां

इन जगहों से सीखी जा सकती है फ़िज़ियोथेरेपी

गुरूगोविंद सिंह इन्द्रप्रस्थ विश्विविद्यालय,नई दिल्ली

दीनदयाल उपाध्याय चिकित्सा संस्थान,नई दिल्ली

अमर ज्योति संस्थान,नई दिल्ली

पेशा कोई भी हो चुनौतियां हमेशा साथ आती हैं. फ़िज़ियोथेरेपी के क्षेत्र में प्रमुख चुनौती पर बात करते हुए वेदांत कहते हैं, ‘’मुख्य रूप से चुनौती यह है कि लोगों को इस बारे में जानकारी ही नहीं है कि फ़िज़ियोथेरेपी जैसी एक प्रक्रिया है जिसके ज़रिए बिना दवाओं के कई तरह के दर्द और शारीरिक परेशानियों से निजात मुमकिन है."

वे आगे बताते हैं, "दूसरी बात आधुनिक उपकरणों की उपलब्धता से जुड़ी है. हमारे यहां अत्याधुनिक मशीनें बनती नहीं है केवल आयात की जाती हैं. इससे वो थोड़ी महंगी पड़ जाती हैं लेकिन बड़ा मसला इस थेरेपी को गांव से लेकर शहरों तक पहुंचाने का है ताकि ज़्यादा से ज़्यादा लोग इसका फ़ायदा उठा सकें’’.

संभावनाएं

फ़िज़ियोथेरेपी में पढ़ाई करने के बाद काम की अच्छी संभावनाएं मौजूद हैं लेकिन वेदांत कहते हैं कि थोड़ा धीरज रखने की ज़रूरत होती है.

वे कहते हैं, "एकदम से 50-60 हज़ार रूपये महीने की नौकरी शायद ना मिल पाए लेकिन किसी वरिष्ठ चिकित्सक के साथ या किसी अस्पताल में काम करके अच्छा ख़ासा अनुभव औऱ पैसा दोनों ही हासिल हो सकता है.इसके अलावा स्वतंत्र रूप से काम करने की संभावना तो हमेशा रहती ही है लेकिन बेहतर है कि पहले अपने हुनर को पुख़्ता बनाया जाए और फिर स्वतंत्र तौर पर काम की शुरूआत की जाए’’.

वेदांत फ़िलहाल एक पॉलीक्लीनिक के साथ जुड़कर काम कर रहे हैं और कहते हैं कि एक सफल फ़िज़ियोथेरेपिस्ट बनने के लिए जो एक चीज़ सबसे ज़्यादा मायने रखती है वो है मरीज़ की पीड़ा और उसकी मानसिक स्थिति को समझकर इलाज करना. इस भरोसे के ज़रिए ही एक फ़िज़ियोथेरेपिस्ट एक मरीज़ को सामान्य ज़िंदगी की तरफ़ वापिस ला सकता है.

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