राजीव से लेकर राहुल की खरी-खोटी तक

 मंगलवार, 22 जनवरी, 2013 को 15:31 IST तक के समाचार
राजीव गाँधी

काँग्रेस की स्थापना के सौ साल पूरे होने पर प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने 28 दिसंबर 1985 को मुंबई (तब का बंबई) में सत्ता के शीर्ष पर बैठकर ही सत्ता पर सवालिया निशान लगाए थे.

पूरे सत्ताईस साल बाद 20 जनवरी 2013 को जयपुर में उनके बेटे राहुल गाँधी ने भी लगभग उसी सुर में, लगभग उसी ग़ुस्से और हताशा में लगभग वैसे ही सवाल खड़े किए हैं.

दोनों भाषणों पर नज़र डाली जाए तो ये नतीजा निकाला जा सकता है कि पिछले 27 बरसों में हिंदुस्तान की सत्ता-मशीनरी में बहुत कुछ नहीं बदला है. लीजिए प्रस्तुत हैं दोनों भाषणों से कुछ उदाहरण:

राजीव गाँधी – देश भर में लाखों काँग्रेसी कार्यकर्ता काँग्रेस की नीतियों और कार्यक्रमों के प्रति उत्साहित हैं. पर वो मजबूर हैं क्योंकि उनकी पीठ पर सत्ता के दलाल सवार हैं, जो एक जनांदोलन को एक सामंती जकड़बंदी में बदल रहे हैं.... इन लोगों ने काँग्रेस संगठन में से सेवा और बलिदान की भावना निकाल कर उसे खोखला कर दिया है.... हमारी प्रशासनिक व्यवस्था पेचीदा, पुरानी और लोगों की ज़रूरतों और आकांक्षाओं से दूर है. इसने बदलाव की कोशिशों को बेकार कर दिया है. इसे लोगों की सेवा करना सीखना चाहिए.

राहुल गाँधी – एक अरब भारतीयों की आवाज़ आज हमें बता रही हैं कि वो सरकार, राजनीति और प्रशासन में भागीदारी चाहते हैं. वो कह रहे हैं कि उनके जीवन की दिशा बंद दरवाज़ों के पीछे बैठे कुछ मुट्ठीभर लोग तय नहीं कर सकते, जो उनके प्रति जवाबदेह नहीं हैं. वो हमें बता रहे हैं कि भारत की सरकारी व्यवस्था भूतकाल में फँसी है. ये वो व्यवस्था है जो लोगों से उनकी आवाज़ छीन लेती है – ऐसी व्यवस्था जो शक्तिशाली बनाने की बजाए शक्तिहीन बनाती है.

राजीव गाँधी – इस देश को ग़रीबों की सेवा करने वाली राजनीति की ज़रूरत है. देश को विचारधारा और कार्यक्रम पर आधारित राजनीति चाहिए. ऐसा करने के लिए हमें राजनीतिक पार्टियों और स्वार्थी तत्वों के बीच का गठजोड़ तोड़ना होगा.

राहुल गाँधी

राहुल गाँधी ने जयपुर की चिंतन बैठक में सत्ता के केंद्रीकरण पर सवाल उठाए.

राहुल गाँधी – आप जिस भी राज्य को देखें, चाहे जिस राजनीतिक पार्टी को देखें, पूरे राजनीतिक पटल पर कुछ मुट्ठीभर लोग ही क्यों क़ाबिज़ हैं? हमारे देश में सत्ता गंभीर रूप से केंद्रीयकृत है, हम सिर्फ़ उन्हीं को शक्ति देते हैं जो सत्ता के शीर्ष पर हैं. हम नीचे तक के लोगों के सशक्तीकरण पर यक़ीन नहीं करते.

राजीव गाँधी – भ्रष्टाचार के खिलाफ़ युद्ध बिना रुके जारी रहेगा. इस देश को स्वच्छ सामाजिक और राजनीतिक माहौल की ज़रूरत है और काँग्रेस पार्टी इसे उपलब्ध कराने के लिए कटिबद्ध है.

राहुल गाँधी – रोज़ाना हम व्यवस्था के दोगलेपन से दोचार होते हैं. भ्रष्ट लोग खड़े होते हैं और भ्रष्टाचार मिटाने की बातें करते हैं. और जो लोग महिलाओं की बेइज़्ज़ती करते हैं वो महिला अधिकारों की बातें करते हैं.

काँग्रेस पार्टी की स्थापना के सौ साल पूरे होने पर 27 बरस पहले बंबई में पार्टी कार्यकर्ताओं को राजीव गाँधी ने सलाह दी कि उन्हें “सच के आइने में” अपनी तस्वीर देखनी चाहिए.

उन्होंने इस आइने में एक काँग्रेसी नेता की जो तस्वीर दिखाई वो एक भ्रष्ट, सत्ता के दलाल, लालची, अपराधी, जुगाड़ू, षडयंत्रकारी, दाँव-पेंच में माहिर, कपटी और क्षुद्र आदमी की तस्वीर थी.

व्यवस्था के केंद्र से व्यवस्था विरोधी आवाज़ उठाकर राहुल गाँधी ने भी अपने पिता की तरह आम लोगों के ग़ुस्से को काँग्रेस के पक्ष में इस्तेमाल करने की कोशिश की है.

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