पुलिस ने बुलाया आशीष नंदी को

  • 29 जनवरी 2013
आशीष नंदी
Image caption आशीष नंदी कह चुके हैं कि वे अपने बयान पर कायम हैं

जयपुर साहित्य उत्सव में विवादित बयान देने वाले समाजशास्त्री आशीष नंदी को पुलिस ने पूछताछ के लिए तलब किया है

पुलिस आयुक्त बीएल सोनी ने बीबीसी को यह जानकारी दी है. इस बीच आशीष नंदी अपने बचाव के विकल्पों पर विचार कर रहे हैं.

पुलिस ने साहित्य उत्सव के आयोजक संजोय रॉय को भी आशीष नंदी के मामले के सिलसिले में जांच पूरी होने तक जयपुर नहीं छोड़ने के लिए कहा है.

संजोय रॉय ने बीबीसी को बताया, ''पुलिस ने मुझसे जयपुर नहीं छोड़ने के लिए कहा है.''

जयपुर से आ रही खबरों के मुताबिक संजोय राय से पुलिस ने पूछताछ पूरी कर ली है. आशीष नंदी को समन भेजा गया है और उनके जवाब का इंतजार किया जा रहा है.

नंदी के खिलाफ एससी/एसटी संगठन के एक नेता ने भ्रष्टाचार को लेकर जातिसूचक टिप्पणी करने का आरोप लगाया है और मुकदमा दर्ज कराया है.

इसबीच जाने-माने दलित साहित्यकार और प्रोफेसर कांचा इलिया ने नंदी का बचाव किया है, ''वो अच्छी मंशा के साथ कहा गया एक खराब कथन था. इस मामले को अब यहीं खत्म कर देना चाहिए.''

नंदी के खिलाफ पुलिस में एक और शिकायत

बीबीसी संवाददाता सलमान रावी का कहना है कि छत्तीसगढ़ राज्य के अनुसूचित जाति जनजाति कर्मचारी संघ ने आशीष नंदी के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है.

उनका कहना है कि यह शिकायत राज्य के रायगढ़ जिले के सारनगढ़ थाने में लिखित रूप में दी गई है.

छह साल की उम्र हासिल कर चुके इस उत्सव में जहां केंद्र में साहित्यकारों की रचनाओं और बयानों पर शामियानों और सभागारों में बौद्धिक चर्चा होती है, वहीं इसके समानांतर पिछले कुछ समय से विवादों की नदी सी बहने लगी है.

अदब के इस मेले ने जब सलमान रश्दी को लेकर उठे विवाद और विरोध से पार पाई तो पाकिस्तानी साहित्यकारों की आमद पर विरोध की आवाजें सुनी गईं.

लेकिन इस विवाद ने ख़ामोशी ओढ़ी तो नंदी के बयान पर हंगामा हो गया. बीते शनिवार को नंदी ने 'रिपब्लिक ऑफ़ आइडिया' विषय पर अपनी बात कहते हुए भ्रष्टाचार में जात-बिरादरी और वर्गों का फलसफा समझाया था.

इतनी उग्रता आखिर क्यों

इसके बाद आयोजकों और खुद नंदी के लिए अपने विरोधियों को समझाना मुश्किल हो गया. नंदी ने हाथों-हाथ अपनी सफाई दी.

मगर तब तक बात साहित्य के शामियाने से निकलकर सियासत के दालान में दाखिल हो चुकी थी. माहौल की नजाकत देख नंदी ने उत्सव से रुखसत करना ही बेहतर समझा.

इस विवाद से अविचलित संजोय रॉय कहते हैं, ''आखिर हम इतने उग्र क्यों हो जाते हैं. ये अदब का मंच है, अपनी बात कहने के लिए, अगर किसी को असहमति है तो वो अपनी बात कहें, तर्क करे और पक्ष रखें. ये साहित्य का मंच है, तर्क और दलील इसका हिस्सा है, ये कोई राजनीतिक मैदान नहीं है कि नारेबाजी की जाए.''

उन्होंने कहा, ''हम नंदी के लगातार सम्पर्क में हैं, उन्हें बहुत बुरा लगा जब उन पर इस तरह का इल्जाम लगाया गया. वो 50 साल से इन वर्गों के बारे में कम कर रहे हैं. मगर महज एक बयान की एक-दो पंक्तियों को सन्दर्भ से काटकर 50 साल के काम पर ही सवाल उठा दिया गया, इससे वह व्यथित हुए है.''

नंदी की हिमायत

इस विवाद के बाद अनेक दलित और जनजाति संगठन नंदी की गिरफ्तारी की मांग करने लगे हैं. मगर प्रोफेसर कांचा इलिया, नंदी की हिमायत में उतर आये है.

वे कहते हैं, ''मुझे नंदी की नीयत पर कोई शक नहीं हैं. हां ये जरूर है कि नंदी ने अपनी बात ठीक से कहने में चूक की है.''

वहीं उत्सव के एक सह-निदेशक विलियम डेलरिम्पल कहते हैं, ''ये उत्सव एक छोटी शुरुआत थी. अब ये दुनिया के प्रमुख साहित्य जलसों में शुमार हो गया है. इसे देखकर कोई 30 स्थानों पर उत्सव शुरू हुए हैं. कराची और कई स्थानों पर भी ऐसे आयोजन होने लगे हैं.''

साहित्य के कुंभ का शाही स्नान

उत्सव की सह-निदेशक नमिता गोखले कहती हैं, ''ये साहित्य के कुम्भ का शाही स्नान है. इसमें अलग-अलग जुबानें, साहित्य और लेखक जमा होते हैं और चर्चा करते हैं. इस बार कोई 250 से ज्यादा लेखक इसमें शामिल हुए थे.''

अदब का मेला जब छठे साल में दाखिल हुआ तो इसका दायरा बढ़ा और देहरी भी, क्योंकि इसके साथ संगीत के कार्यक्रम दूसरी देहरी पर भेज दिए गए.

साहित्यकारों की तादाद बढ़ी, पुस्तक-प्रेमियों की आमद में इजाफा हुआ और साहित्य के प्रति अनुराग प्रदर्शित करती भारी भीड़ उमड़ती रही.

इसके साथ साहित्य के शामियाने में बाजार की दखल और दायरा भी बढ़ा है, पर ये बाजार उस दौर के बाजार से भिन्न है जब कबीर ने खड़े होकर जग का आह्वान किया था.

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