एक होंगे राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे

Image caption उद्धव ठाकरे ने दिया राज ठाकरे से सुलह के संकेत.

शिव सेना और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के विलयन पर अटकलें बाल ठाकरे की मौत से पहले से लगाई जा रही थीं. लेकिन अब इसकी संभावना बढ़ गई है. कम से कम शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने अपनी ओर से इसकी पहल की है.

शिव सेना के मुख पत्र 'सामना' को दिए एक साक्षात्कार में पार्टी प्रमुख उद्धव ठाकरे ने 2014 के चुनाव से पहले दोनों पार्टियों के विलयन की संभावना से इनकार नहीं किया है. उद्धव ठाकरे ने 'सामना' से कहा कि दोनों पार्टियों के मिलन के मुद्दे पर वे राज ठाकरे से बातचीत के लिए तैयार हैं. वे कहते हैं, "ये एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब मुझे और राज को मिलजुल कर ढूँढना होगा."

साफ है कि इस मसले पर अब उद्धव ठाकरे को अपने चचेरे भाई और सियासी विरोधी राज ठाकरे के जवाब का इंतज़ार है.

मिलाप की इस संभावना से दोनों पार्टियों के सदस्यों, नेताओं और समर्थकों के बीच ख़ुशी की लहर दौड़ गई है. सब यही चाहते हैं कि दोनों पार्टियाँ फिर से एक हो जाएँ और दोनों भाई अपनी लड़ाई को ख़त्म कर के एकजुट हो जाएँ.

भाई-भाई का मेल

Image caption उद्धव के मुक़ाबले राज ठाकरे मराठियों में ज़्यादा लोकप्रिय हैं.

अँधेरी उपनगर से शिव सेना के एक पुराने सदस्य संजय दिघे ने कहा, "हम दो भाई की तरह हैं जो एक दुसरे से रूठ गए हैं. कभी न कभी हमारा मिलाप होना ही है."

राज ठाकरे शिव सेना से 2006 में अलग हुए थे और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना की स्थापना की थी. उनके अलग होने की वजह थी बाल ठाकरे द्वारा अपने बेटे उद्धव ठाकरे को तरज़ीह देना. जबकि पार्टी में राज अधिक लोकप्रिय थे.

नवनिर्माण सेना के समर्थक राज ठाकरे को बाल ठाकरे का सियासी वारिस मानते हैं. शिव सेना के अन्दर भी उनकी विरासत के दावे का विरोध करने वाले कम ही मिलेंगे. लेकिन अगर राज ठाकरे शिव सेना में वापस जाने के लिए तैयार भी हुए तो क्या उद्धव ठाकरे उन्हें पार्टी की बागडोर संभालने देंगे? या फिर राज ठाकरे को सियासत में अपने से ऊंचे कद की उनकी छवि को स्वीकार करेंगे?

उद्धव पर भारी राज

अगर ऐसा हुआ तो आम धारणा ये है कि राज ठाकरे शायद पार्टी में वापस जाने पर विचार करें. फिलहाल उद्धव ठाकरे को अपने चचेरे भाई की ज़रुरत ज़्यादा है.

2014 में न केवल लोकसभा का चुनाव होने वाला है बल्कि महाराष्ट्र विधान सभा का भी चुनाव होगा. पिछले विधान सभा चुनाव में राज ठाकरे की पार्टी ने शिव सेना के काफी वोट काटे थे और उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन किया था. अगर दोनों पार्टियों का मिलाप न हुआ तो 2014 के चुनाव में शिव सेना के पहले से अधिक वोट कटने का ख़तरा है.

शिव सेना से अलग होने के बाद से राज ठाकरे ने अपनी पार्टी को महाराष्ट्र भर में मज़बूत किया है. उन्होंने पार्टी को लोकप्रिय बनाने के लिए अपने चाचा बाल ठाकरे के तर्ज़ पर राजनीति की है. मराठी अभिमान को बढाने के लिए वे हिंदी और बिहारियों का विरोध करते आए हैं.

ज़ाहिर है इस से उन्हें पार्टी को मज़बूत करने में मदद मिली है. तो अगर वो शिव सेना में वापस लौटने के लिए तैयार हुए तो उद्धव को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है. वैसी अभी कहना मुश्किल है उद्धव और राज दोनों इसके लिए तैयार हैं या नहीं.

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