सुप्रीम कोर्ट में किशोर अभियुक्तों की उम्र पर सुनवाई

  • 4 फरवरी 2013
दिल्ली बलात्कार
Image caption दिल्ली बलात्कार मामले के बाद बलात्कारियों को कड़ी सज़ा की मांग तेज़ हो गई है.

सुप्रीम कोर्ट 'जुविनायल जस्टिस एक्ट' यानी किशोर न्याय क़ानून के भीतर किशोर की परिभाषा पर दायर एक जनहित याचिका की सुनवाई के लिए तैयार हो गया है.

न्यायालय में दाख़िल याचिका में कहा गया है कि साल 2000 के इस क़ानून में कई ऐसे प्रावधान हैं जो संविधान के भीतर मौजूद मूलभूत अधिकारों का उलंघन करते हैं.

कहा गया है कि ये प्रावधान बराबरी, जीवन और आज़ादी के अधिकारों के मूलभूत अधिकारों के विरूद्ध हैं.

न्याय बोर्ड

किशोर न्याय क़ानून किशोरों के अपराध से संबंधित है और इस तरह के मामले किशोर न्याय बोर्ड में सुने जाते हैं.

क़ानून के भीतर प्रावधान है कि जो किशोर या किशोरी 18 साल से कम उम्र के हैं, और वो अगर किसी अपराध में लिप्त पाए जाते हैं तो उनकी सुनवाई इसी बोर्ड में होगी.

ख़बरों के मुताबिक़ दो वकीलों- सुकुमार और कमल कुमार पांडे की याचिका में कहा गया है कि किसी कम उम्र के अभियुक्त का मामला इस किशोर क़ानून के भीतर सुना जाएगा या सामान्य भारतीय दंड संहिता के दायरे में ये अपराध की गंभीरता के आधार पर तय किया जाना चाहिए.

वर्मा समिति

हाल में हुए दिल्ली सामुहिक बलात्कार मामले के बाद किशोर न्याय क़ानून पर नए सिरे से बहस शुरू हो गई है.

एक वर्ग की मांग है कि अगर अपराध गंभीर हो तो उम्र की सीमा कड़ी कारवाई के आड़े नहीं आनी चाहिए. दूसरी ओर बाल अधिकारों के लिए काम करने वालों का कहना है कि कम उम्र के लोगों को सुधरने का मौक़ा फिर से दिया जाना चाहिए.

औरतों के ख़िलाफ़ होने वाले अपराधों पर क़ानून की समीक्षा और सुझाव के लिए तैयार जस्टिस वर्मा समिति ने भी किशोरों की परिभाषा में तबदीली न करने की सलाह दी है.

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