'नहीं चाहिए हिंदी' के साइनबोर्ड...

मदुरै
Image caption तमिलनाडु में हिंदी के साइनबोर्ड्स पर विरोध हुए हैं.

मदुरै के जिला प्रशासन ने तमिल और अग्रेजी के साथ हिंदी में साइनबोर्ड लगाने के प्रस्ताव को कुछ स्थानीय संगठनों के विरोध के बाद वापस ले लिया है.

पहले भी तमिलनाडु में 60 के दशक में हिंदी विरोध को लेकर बहुत हंगामा हुआ था.

समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक जिला कलेक्टर अंशुल मिश्र ने कुछ स्थानीय संगठनों के विरोध के बाद कहा कि मंदिरों के शहर में आने वाले सैंकड़ों श्रद्धालुओं की मदद के लिए ये साइनबोर्ड लगाए जाने थे और इन्हें लोगों की भावनाओं का आदर करते हुए हटाया जा रहा है.

उत्तर भारतीय अंशुल मिश्र ने सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट फेसबुक पर लिखा है, "अपने तमिल भाईयों और बहनों की भावनाओं का आदर करते हुए मैं तीन भाषाओं वाले साइनबोर्ड और इनमें हिंदी के इस्तेमाल के मुद्दे पर मैं अपने शब्द वापस लेने के लिए तैयार हूं... मैं यहां तमिलनाडु के लोगों की सेवा के लिए हूं न कि अपनी मातृभाषा को बढ़ावा देने के लिए".

साइनबोर्ड का विरोध

अधिकारियों ने बताया कि हिंदी वाले साइनबोर्ड लगाने के काम में 'तमिल देसा पोथु उदामाई काची' जैसे कुछ संगठनों ने बाधा पहुंचाई है.

संगठनों ने हिंदी को बढ़ावा देने के मिश्र के कदम के विरोध में इस महीने विरोध प्रदर्शन भी किया था.

हालांकि तमिलनाडु में धार्मिक व पर्यटन यात्राओं का आयोजन करने वाले संगठनों और उद्योग से जुड़े लोगों ने कलेक्टर के कदम का समर्थन किया है.

उन्होंने हिंदी का विरोध कर रहे लोगों की मांगों को खारिज करते हुए कहा कि इससे तमिलनाडु और उसके लोगों के विकास में फायदा नहीं होगा.

धार्मिक और पर्यटन यात्राओं का आयोजन करने वाले वेणुगोपाल कहते हैं, "एक आदमी जितनी अधिक भाषाएं जानेगा, वह उतनी ही बेहतर स्थिति में होगा... चाहे वह नौकरी पाने की बात हो... या इस शहर में गाइड का काम करने का".

एक ऑटोरिक्शा ड्राइवर ने कहा कि हिंदी में साइनबोर्ड होने से तीर्थयात्री ठगे जाने से बचने में मदद मिलेगी. कम ही लोग जानते हैं कि मशहूर मीनाक्षी मंदिर रेलवे स्टेशन से बहुत करीब है लेकिन कुछ ड्राइवर इसके लिए 150 रुपए तक वसूल लेते हैं.

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