गाँव जहाँ 90 फीसदी महिलाओं के गर्भाशय हटा दिए गए

भारत में हज़ारों महिलाएँ ऑपरेशन के ज़रिए अपना गर्भाशय हटवा रही हैं. कई कार्यकर्ताओं का कहना है कि कई डॉक्टर ऐसा सिर्फ पैसा कमाने के लिए कर रहे हैं और ये ऑपरेशन गैर ज़रूरी हैं.

राजस्थान में रहने वाली सुनिता को अपनी उम्र ठीक से पता नहीं है. उसे अंदाज़ा है कि वो 25 एक साल की होगी. राजस्थान के एक गाँव में मैं उससे मिली. वो गहनों से लदी हुई थी. जब वो हाथ हिलाकर बात करती थी तो चूड़ियों भी साथ में खनकती थी.

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लेकिन जब वो ऑपरेशन के बारे में बताती है तो सुनीता के चेहरे के भाव बदलने लगते हैं.

वे कहती है, “मैं डॉक्टर के पास इसलिए गई थी क्योंकि माहवारी के दौरान बहुत खून बहता था. डॉक्टर ने अल्ट्रासाउंड किया और कहा कि मुझे कैंसर हो सकता है. मुझे उसी दिन गर्भाशय हटाने को कहा गया.”

सुनिता इस तरह आनन फानन में ऑपरेशन नहीं करवाना चाहती थी और अपने पति से पहले बात करना चाहती थी.

लेकिन सुनिता के मुताबिक डॉक्टर के कहा ऑपरेशन बेहद ज़रूरी है और उसे चंद घंटों में ही ऑपरेशन कराने भेज दिया गया.

बिना बायपसी किए कैंसर की पुष्टि

Image caption सुनीता का कहना है कि उसे आनन फानन में गर्भाशय हटवाना पड़ा

ऑपरेशन करवाए दो साल हो चुके हैं. लेकिन सुनीता कहती हैं उसे बच्चों की देखभाल और काम करने में अब भी कमज़ोरी महसूस होती है.

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गाँववालों का कहना है कि वहाँ 90 फीसदी औरतों ने ऑपरेशन करवाया है जिसमें 20 और 30 साल की उम्र की महिलाएँ भी शामिल हैं.

इसके लिए डॉक्टरों की फीस होती है 200 डॉलर यानी करीब 10, 000 रुपए. गाँववालों को ऑपरेशन के लिए अकसर मवेशी या अन्य चीज़ें बेचनी पड़ती हैं.

मैं उस छोटे से क्लिनिक जा पहुँची जिसके बारे में सुनिता और अन्य महिलाएँ ने कहा था कि वहीं से उन्हें गर्भाशय हटाने की सलाह दी गई थी.

जब मैने महिलाओं के आरोप वहाँ के डॉक्टर को बताए तो उसने ना में सिर हिलाया और मुस्कुराने लगा. उसने कहा लोग सच नहीं बोल रहे.

मैने उस डॉक्टर से पूछा कि अल्ट्रासाउंड के आधार पर वो कैंसर होने की आशंका का पता कैसे लगा सकता है. तब उसने स्वीकार किया कि कई बार वो गर्भाशय हटाने से पहले बायोपसी नहीं करवाते.

एक बार गर्भाशय हटाए जाने के बाद ये साबित कहना आसान नहीं होता कि वाकई ऑपरेशन की ज़रूरत थी या नहीं. ये सब देखकर मुझे ये तो स्पष्ट हो गया कि कुछ अजीब और चिंताजनक ज़रूर हो रहा है.

महिलाओं की दुविधा

राजस्थान, बिहार, छत्तीसगढ़ और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों से आने वाली रिपोर्टें संकेत देती हैं कि बहुत बड़ी संख्या में महिलाएँ गर्भाशय हटवा रही हैं.

चैरिटी प्रयास के डॉक्टर नरेंद्र गुप्ता उन लोगों में से हैं जो मानते हैं कि कुछ डॉक्टरों गलत धंधे में लगे हैं.

वे कहते हैं, “बताया गया है कि कुछ इलाकों में पूरे के पूरे ज़िले में महिलाओं के गर्भाशय हटाए गए हैं. ऐसा लगता है कि कुछ डॉक्टर इसे जल्द पैसा कमाने का ज़रिए बना रहे हैं. वे ऐसी बीमारियों के इलाज से पैसा कमा रहे हैं जिन्हें आसानी से दूसरे सरल तरीके से ठीक किया जा सकता है.”

इसी दौरान राजस्थान की राजधानी जयपुर में मेरी डॉक्टर विनीता गुप्ता से हुई.

उन्होंने मुझे बताया, “मेरे पास गाँव से हर हफ्ते सात-आठ महिलाएँ आती ही हैं जिन्हें बताया गया है कि गर्भाशय हटा लें. वे मेरी राय लेने आती हैं. गाँव में कैंसर की पुष्टि डॉक्टर बहुत जल्दी कर देते हैं. ये गलत है.”

डॉक्टर विनीता कहती हैं, “मैं मरीज़ों को समझाती हूँ कि इनफेक्शन से कैंसर नहीं होता. कुछ बात समझते हैं लेकिन कुछ यकीन नहीं करते क्योंकि उनसे कहा गया होता है कि अगर गर्भाशय नहीं हटाया तो कैंसर हो जाएगा और आप मर जाओगे.”

स्वास्थ्य सेवा की विफलता

Image caption ज़िला मजिस्ट्रेट कुंदन कुमार बड़ी संख्या में गर्भाशय हटाए जाने के मामलों से चिंतित हैं

छोटे क्लिनिकों और अस्पतालों के आने से गर्भाशय हटाने के मामलों में बढ़ोतरी हुई है, खासकर ऐसे इलाकों में जहाँ सरकारी स्वास्थ्य केंद्र नहीं है.

स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं का कहना है कि छोटे क्लिनिकों का होना ज़रूरी हैं. पर वो ये भी कहते हैं कि इन डॉक्टरों की निगरानी होनी चाहिए ताकि मरीज़ों के साथ धोखाधड़ी न हो.

भारत सरकार ने 2008 में राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना चलाई थी. इसके तहत गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले परिवार 30 हज़ार रुपए तक का इलाज सरकारी खर्चे पर कुछ निजी अस्पतालों से करवा सकते हैं.

लेकिन आलोचकों का कहना है कि कुछ राज्यों में इस योजना के कारण बेवजह ऑपरेशन किए जा रहे हैं. डॉक्टरों गरीबों के ज़रिए सरकारी पैसा हासिल करना चाहते हैं.

बिहार के समस्तीपुर में ज़िला मजिस्ट्रेट गर्भाशय हटाने के मामलों से इतने चिंतित हुए कि उन्होंने इन महिलाओं को एक सरकारी कैंप में बुलाया जहाँ सरकारी डॉक्टरों ने इनकी जाँच की.

इस कैंप की रिपोर्ट के मुताबिक 2606 महिलाओं में से 316 यानी 12 फीसदी महिलाओं का गर्भाशय बेवजह हटाया गया.

ऐसे मामले भी सामने आए जहाँ डॉक्टरों ने ऑपरेशन की पूरी फीस ली लेकिन असल में उन्होंने बस ऊपरी चीरा लगा दिया और गर्भाशय नहीं हटाया.

लेकिन ज़िला मजिस्ट्रेट की जाँच से जुड़े क्लिनिक किसी गलत काम से इनकार करते हैं.

भारत के ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश इसे सार्वजनिक स्थास्थ्य सेवाओं की विफलता मानते हैं.

वे कहते हैं, सारा पैसा निजी क्लिनिकों पर लगाया जा रहा है. ये देखना ज़रूरी है कि ये डॉक्टर मरीज़ों को लूटे ना जैसा कि वो अब कर रहे हैं.

इस बीच बिना वजह महिलाओं के गर्भाशय हटाए जाने का सिलसिला जारी है.

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