बिहार में फास्ट ट्रैक अदालतों की हक़ीक़त

बिहार फास्ट ट्रैक कोर्ट
Image caption बिहार में अपराध साबित होने की दर बहुत कम है

एक सवाल है कि भारत में कोई फास्ट ट्रैक कोर्ट कितनी जल्दी फैसला सुना सकती है? जवाब है छह दिन में.

बिहार के कटिहार ज़िले की एक फास्ट ट्रैक अदालत ने महज छह दिनों में बलात्कार और कत्ल के एक मामले की सुनवाई पूरी कर ली और फैसला भी सुना दिया.

24 जनवरी को हुए इस अपराध की सुनवाई अदालत ने 28 जनवरी को शुरू की थी.

जज बटेश्वर नाथ पांडेय ने 2 फरवरी को 25 वर्षीय अभियुक्त को अपनी साढ़े तीन साल की भतीजी के साथ बलात्कार करने के आरोप में मृत्यु दंड की सजा सुनाई.

जिले की एसपी किम ने बताया,“छह दिनों में सुनवाई पूरी करके फैसला सुनाया जाना अपने आप में एक रिकॉर्ड है”.

लंबित मामले

दिल्ली गैंग रेप मामले के बाद फास्ट ट्रैक अदालतें फिर से खबरों में हैं.

इस घटना के बाद सरकार ने राजधानी में महिलाओं पर होने वाले यौन हमलों के मामलों की जल्द सुनवाई के लिए छह फास्ट ट्रैक अदालतों का गठन किया है.

भारत में बिहार एक मात्र ऐसा राज्य है जहां सबसे ज्यादा फास्ट ट्रैक अदालतें काम कर रही हैं.

इनकी संख्या 183 है और 80 हजार से ज्यादा मामले इन अदालतों में लंबित हैं.

राज्य में कमजोर न्याय व्यवस्था और बढ़ते अपराध से निपटने के लिए इन फास्ट ट्रैक अदालतों का गठन किया गया था.

महिलाओं के ख़िलाफ़ होने वाले अपराधों के अलावा कई अन्य तरह के मामलों की सुनवाई इन अदालतों में होती हैं.

बिहार की स्थिति

बिहार में फास्ट ट्रैक अदालतों ने वर्ष 2006 से 75 हजार लोगों को दोषी करार दिया है.

लेकिन इन अदालतों में दोषी करार दिए गए लोगों के पास ऊंची अदालतों में अपील करने का का अधिकार भी होता है.

Image caption अदालतें पर लंबित मामलों के निपटारे का दबाव बढ़ रहा है.

पटना में वकालत के पेशे से जुड़े मुकेश कांत कहते हैं कि फास्ट ट्रैक अदालतों में सजा पाए लोगों में से तकरीबन 40 फीसदी लोगों को हाई कोर्ट में जमानत में मिल जाती है.

यह एक तथ्य है कि अपराध साबित होने के मामले में बिहार देश भर में 15.5 फीसदी के साथ निचले क्रम वाले राज्यों में से है.

मुकेश कांत की तरह ही पूर्व पुलिस प्रमुख देवकी नंदन गौतम भी फास्ट ट्रैक अदालतों को लेकर संशकित हैं.

वो कहते हैं,"फास्ट ट्रैक कोर्ट भारतीय अदालतों में लगातार बढ़ रहे लंबित पड़े मामलों के निपटारे के लिए ‘कामचलाऊ इंतजाम’ की तरह ही हैं".

मुकेश कांत को लगता है कि भारत में फास्ट ट्रैक कोर्ट बहुत कामयाब नहीं रहे हैं.

वह कहते हैं, “कई बार इंसाफ के नाकाम होने का भी खतरा रहता है”.

अतीत के उदाहरण

बीते अप्रैल महीने में पटना हाई कोर्ट को एक मामले में सिवान की एक फास्ट ट्रैक कोर्ट से सफाई मांगनी पड़ी थी.

सिवान की इस फास्ट ट्रैक कोर्ट ने वर्ष 2000 के बलात्कार और हत्या के एक मामले में राष्ट्रीय जनता दल के सांसद उमा शंकर सिंह और उनके बेटे जीतेंद्र स्वामी को बरी कर दिया था.

इससे पहले अगस्त 2004 में राजद सासंद शाहाबुद्दीन की जमानत याचिका हाई कोर्ट में सुनवाई के लिए लंबित होने के बावजूद उन्हें संसद की कार्यवाही में भाग लेने की इजाजत देने पर उच्च न्यायालय ने सिवान की ही फास्ट ट्रैक कोर्ट की आलोचना की थी.

शाहाबुद्दीन पर दर्जनों आपराधिक मामले चल रहे हैं और इनकी सुनवाई जेल के भीतर ही एक फास्ट ट्रैक कोर्ट में चल रही है.

लेकिन इंद्र कुमार सिंह जैसे वकील यह मानते हैं कि आपराधिक मामलों की जल्द सुनवाई के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट जरूरी है.

सामाजिक मामलों के जानकार श्रीकांत कहते हैं कि फास्ट ट्रैक अदालतें राज्य की ‘विफलता की स्वीकारोक्ति’ है.

वह कहते हैं,“इस मामले का सच यह है कि आम अदालतों को ठीक से काम करने की जरूरत है. फास्ट ट्रैक कोर्ट महज सुधार के उपाय हैं”.

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