बच्चों की पत्रिका में समलैंगिकता की पैरवी

  • 8 फरवरी 2013
चकमक,बाल विज्ञान पत्रिका

अगर आपको लगता है कि चंदा मामा, छुक छुक करती रेलगाड़ी और ट्विंकल ट्विंकल लिटिल स्टार ही बच्चों की पत्रिकाओं का हिस्सा बन सकते हैं तो ऐसा नहीं है.

भोपाल शहर से प्रकाशित होने वाली मासिक बाल विज्ञान पत्रिका 'चकमक' के फरवरी अंक में छपे एक लेख में समलैंगिकता की बात ही नहीं, उसका एक तरह से समर्थन भी किया गया है.

चित्रकार भूपेन खक्कर के एक चित्र पर प्रकाशित आलेख में ये चर्चा की है.

हालांकि दिल्ली हाई कोर्ट ने समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से हटा दिया है,वहीं ब्रिटेन की संसद ने समलैंगिक विवाह के कानून को पास कर दिया है लेकिन कानून के बाहर, लोगों के बीच सिर्फ भारत में ही नहीं दुनिया के कई हिस्सों में इस मुद्दे को लेकर बहस जारी है.

ऐसे में बच्चों की पत्रिका में समलैंगिकता की बात करना और उसका समर्थन करना कितना सही है?

'समाज का चेहरा दिखना चाहिए'

10 से 14 साल के बच्चों की इस पत्रिका में चित्रकार भूपेन खक्कर के एक चित्र का वर्णन किया गया है जिसमें दो युवा लड़कों के बीच के प्यार को परिभाषित किया गया है. चित्र का शीर्षक है "वे एक-दूसरे से इतना प्यार करते थे कि उन्होंने एक ही जैसा सूट पहना था."

चकमक के संपादक सुशील शुक्ला कहते हैं "अब भारत में इस पर बात करना क़ानूनन जुर्म नहीं है. चकमक पहले भी बच्चों के साहित्य के मामले में ये समझता रहा है कि उन्हें जीवन के इर्द-गिर्द चीज़ों से अवगत कराना ज़रुरी है. अधकचरी जानकारी ज़्यादा खतरनाक होती है. मुझे नहीं लगता कि इसमें ऐसा कोई मसला है जिस पर बच्चों से बातचीत नहीं की जा सकती."

संपादक सुशील शुक्ला के अनुसार "हम ऐसे कई मुद्दे जैसे जातिवाद या दलितों के साथ जो भेदभाव होते हैं, महिलाओं के साथ जो दुर्व्यवहार होता है उस पर बात कर चुके हैं इसलिए हमने इस पर भी बात की. हालांकि ऐसे मसलों पर मुश्किलें तो आती हैं जिन्हें टाला नहीं जा सकता."

सुशील कहते हैं, "फिर बच्चे हमारे साथ ही जीवन साझा कर रहे होते हैं, उन्हें कृत्रिम दुनिया में ले जाने से अच्छा है कि उन्हें समाज के अच्छे और बुरे दोनों चेहरे दिखाए जाएं, फिर वो दंगे हो, विस्थापन हो या फिर प्रेम."

"पहले जोड़ और घटाना तो सिखाइए"

Image caption चकमक पत्रिका को पढ़ने वाले ज़्यादातर 10 से 14 साल के बच्चे हैं

मुंबई निवासी राजकुमार नेहरा ने आईआईटी से पढ़ाई की है और सातवीं में पढ़ने वाला उनका बेटा चकमक का नियमित पाठक है. राजकुमार समलैंगिक सेक्स को अप्राकृतिक मानते हैं और उनके अनुसार अगर लेख में समलैंगिकता के बारे में जानकारी दी गई है तो कुछ हद तक ठीक है लेकिन इस उम्र का बच्चा अगर उसे पढ़कर समर्थन या विरोध में लग जाता है तो वो गलत है.

राजकुमार के मुताबिक होमोसेक्शूअलटी आदमी तभी समझ पाएगा ना जब उसको प्राकृतिक सेक्स के बारे में समझ आ पाएगा. पहले जोड़ना और घटाना सिखाएंगे तभी तो गुणा और भाग सीख पाएगा ना बच्चा.

वहीं समलैंगिकों के अधिकारों के लिए काम करने वाली अंजली गोपालन कहती हैं कि माता-पिता को समझा दो जितना खुलकर हम बात करेंगे उतनी ही ज़ोखिम की संभावना कम होगी.वैसे भी ये उनके लिए तो प्राकृतिक ही है जो असल में समलैंगिक हैं.ये लेख पढ़ लेने से किसी की सेक्स प्राथमिकता बदल तो नहीं जाएगी.

कौन सी उम्र सही

समलैंगिकता की जानकारी के लिए कौन सी उम्र सही है इस पर मनोवैज्ञानिक अरुणा बूटा क कहना है कि आमतौर पर 14 साल की उम्र के बाद ही बच्चे इस विषय को समझने के लायक होते हैं या समझने लगते हैं,और अगर 10 साल से कम का बच्चा पत्रिका में छपा ये लेख पढ़ लेगा तो उसको बात समझ में ही नहीं आएगी.

वहीं अंजली के मुताबिक अगर आप किसी भी समलैंगिक से बात करेंगे तो जान पाएंगे कि उन्हें 5 या 6 साल की उम्र में पता चल गया था कि वो होमोसेक्शूअल हैं.शायद बच्चा उसे व्यक्त ना कर पाए लेकिन काफी जल्दी अपनी सेक्शूऐलटी के बारे में उसे पता चल जाता है.

राजकुमार कहते हैं कि पहले बच्चों को आदर्श शिक्षा तो दे दी जाए जैसे कि प्यार क्या है,इंसानियत क्या है,उसके बाद आगे बढ़ाइए.आजकल तो जानकारी देने के बजाय बताया जाता है कि ये भी सही है,ये भी सही है,अब उसके पीछे के मकसद को बच्चा कहां समझ पाता है.

मानावधिकार संगठन ह्युमन राइट्स वॉच की दक्षिण एशिया निदेशक मीनाक्षी गांगुली साफ तौर पर कहती हैं कि हमारे मां बाप बहुत ज़्यादा शर्म शर्म में अपने बच्चों को बड़ा करते हैं.मनोवैज्ञानिक कितनी बार कहते हैं कि जो बच्चा अंदर रोता हुआ आ सकता है कि मम्मी उसने मुझे मारा तो वो ये क्यों नहीं कह सकता कि उसने मेरी निक्कर में हाथ डाला.

जहां एक तरफ सेक्स एजूकेशन बच्चों के कोर्स में अपनी जगह बनाने के लिए संघर्ष कर रही है वहीं समलैंगकिता को फिलहाल सीट मिलना थोड़ा मुश्किल लग रहा है.

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