'गंगा मैय्या की कृपा से ठीक चल रहा है'

कमलेश निषाद,कंभ में नाविक
Image caption कमलेश निषाद कई भाषाएं जानते हैं.

कमलेश निषाद कोई बीस बाईस साल का नौजवान है.

वह स्कूल की पढ़ाई बचपन में ही छोड़कर, पुश्तैनी नाविक के पेशे में लग गया है.

हम अरैल घाट से कमलेश की नाव में बैठकर संगम जाते हैं.

बीच धारा में पहुँचते ही एक सधे हुए गाइड की तरह कमलेश बताते हैं कि यह भूरा वाला पानी गंगा का है और हरा वाला यमुना का.

बातों-बातों में कमलेश बताते हैं, ''गंगा मैय्या की कृपा से रोज़ी रोटी बढ़िया चल रही है. देश के बाहर से भी लोग आए हैं.''

मैंने सहज पूछ लिया कि दूसरे प्रांत के लोगों से कैसे बात करते हो.

अनोखे नाविक

कमलेश का कहना था कि तीर्थयात्रियों से बातें करते-करते वह चार पांच भाषाएं सीख गए है.

कमलेश कहते हैं, “मै तेलुगु, तमिल, गुजराती, मराठी बिंदास बोलता हूँ.”

कमलेश इनके कुछ वाक्य बोलकर सुनाते हैं, मगर मेरी ही समझ में कुछ नही आता.

कमलेश अभी अविवाहित है. शादी से पहले वह कुछ बन जाना चाहते हैं.

कमलेश तो बस उदाहरण है. यहाँ रिक्शा वाले, टेम्पो वाले, फूल माला वाले, घाट पर पुरोहिती करने वाले, दूध बेचने वाले सब कोशिश करके दूसरे प्रांतों की भाषाएँ सीख जाते है.

तीर्थयात्री इससे ख़ुश होकर उनको मेहनताना भी ज़्यादा देते हैं.

लेकिन कमलेश को सबसे ज्यादा आकर्षण इस बार पहले से अधिक संख्या में आए विदेशियों से है.

कमलेश का कहना है कि ये लोग कुंभ के बारे में ख़ूब पढ़कर आते हैं. गंगा जी की पूजा करके फिर बांसुरी या गिटार लेकर गंगा माँ के गाने गाते हैं. और गाते गाते नाचने लगते हैं.

इनमे से कई विदेशी साधू सन्यासी बनकर गेरुआ वस्त्र भी धारण कर रहे हैं.

प्रयाग में इस समय कमलेश की तरह क़रीब चार पांच हज़ार नाविक हैं. और जब बातें शुरू होती है तो ये केवट द्वारा भगवान राम को गंगा पार कराने की याद ज़रुर दिलाते हैं.

और कमलेश तो इतना भावुक हो गए कि वह अपने को वही त्रेता युग का केवट समझते हैं और साधू सन्यासी को भगवान राम.

कमलेश दोहरा सुख प्राप्त करके खुश है. कुंभ में ख़ूब कमाई तो हो ही रही है तीर्थयात्रियों की सेवा का पुण्य भी मिल रहा है.

भाषा ज्ञान को बोनस समझ लीजीए.

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