कुछ नेता भी हैं बलात्कार के अभियुक्त

दिल्ली बलात्कार
Image caption दिल्ली बलात्कार की घटना के बाद पूरे देश में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर आवाज़े उठने लगीं थीं.

मनोज कुमार पारस उत्तर प्रदेश सरकार में स्टैंप ड्यूटी के मंत्री हैं. नगीना विधानसभा क्षेत्र से चुने गए विधायक मनोज कुमार पारस पर एक लड़की के साथ सामूहिक बलात्कार के आरोप हैं.

पिछले साल (2012) दिसंबर में दिल्ली में एक बस में एक पैरामेडिकल छात्रा के साथ हुए सामूहिक बलात्कार और फिर उनकी मौत के बाद भारत सरकार ने कहा था कि वे महिलाओं के ख़िलाफ़ हुए यौन अपराध के मामले में त्वरित कार्रवाई करते हुए तुरंत इंसाफ़ दिलाने की कोशिश करेगी.

दिल्ली बलात्कार मामले के पांच अभियुक्त गिरफ़्तार हो चुके हैं और फ़ास्ट ट्रैक अदालतों में उस केस की सुनवाई भी हो रही है.

लेकिन ऐसा लगता है कि केंद्र सरकार के इन दावों का उत्तर प्रदेश पर कोई ख़ास असर नही है.

मंत्री मनोज कुमार पारस पर छह साल पहले बलात्कार के आरोप लगे थे लेकिन आज तक उनके ख़िलाफ़ न तो अदालत ने कोई कार्रवाई की है और न ही इस मामले को ख़ारिज किया है.

लेकिन पारस का मामला अकेला नहीं है जिसमें किसी राजनेता या मंत्री पर इस तरह के आरोप लगे हैं.

कई राजनेताओं पर बलात्कार या महिलाओं के ख़िलाफ़ यौन शोषण के आरोप हैं.

एक तिहाई नेताओं पर आपराधिक मामले

Image caption वर्मा कमेटी ने कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए थे.

राजनेताओं पर नज़र रखने वाली दिल्ली स्थित ग़ैर-सरकारी संस्था एसोसिएशन फ़ॉर डेमोक्रेटिक रिफ़ॉर्म्स (एडीआर) के अनुसार भारत में 4835 निर्वाचित नेताओं में से लगभग एक तिहाई ने अपने नामांकन पर्चे में अपने ख़िलाफ़ आपराधिक मामले दर्ज होने की बात स्वीकार की है.

उनमें उत्तर प्रदेश तो शायद सबसे आगे है क्योंकि यहां के मौजूदा 58 मंत्रियों में से 29 पर कोई न कोई आपराधिक मामला दर्ज है.

उत्तर प्रदेश में ही मनोज कुमार पारस के साथी, परिवहन मंत्री महबूब अली पर अपने राजनीतिक विरोधी की हत्या के प्रयास का मामला दर्ज है.

लेकिन महबूब अली अपने ऊपर लगे आरोपों को ख़ारिज करते हुए कहते हैं, ''हो सकता है कि अदालत या पुलिस थाने में मेरे ख़िलाफ़ कोई शिकायत दर्ज हो लेकिन अगर जाँच होती है, तो आरोप ग़लत साबित होंगे.''

मनोज कुमार पारस भी अपने ऊपर लगे बलात्कार के आरोप को ख़ारिज करते हुए कहते हैं कि ये उनके राजनीतिक विरोधियों की साज़िश है.

भारतीय समाज में हालाकि एक महिला के लिए बलात्कार का मामला दर्ज करवाना बहुत ही असाधारण बात है क्योंकि उलटे पीड़ित लड़की या महिला को ही पारिवारिक और सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ता है.

लेकिन भारतीय क़ानून के अनुसार आरोप चाहे कितने भी गंभीर हों जब तक वे साबित नहीं हो जाते राजनेता अपनी कुर्सी पर बने रह सकते हैं.

एडीआर के राष्ट्रीय संयोजक अनिल बैरवाल कहते हैं कि अक्सर राजनेता अपने पद का इस्तेमाल करके मामले को वर्षो नहीं बल्कि दशकों तक टालने में सफल हो जाते हैं.

एडीआर के मुताबिक़ आपराधिक मामलों के अभियुक्त नेताओं की संख्या हर साल बढ़ती जा रही है.

एडीआर के अनुसार 1448 सांसदों और विधायकों पर आपराधिक मामले दर्ज हैं जिनमें 641 पर तो हत्या, बलात्कार और अपहरण जैसे गंभीर अपराध के आरोप हैं.

लोकतंत्र को ख़तरा

कांग्रेस पार्टी के मौजूदा 206 सांसदों में से 44 पर आपराधिक मामले दर्ज हैं जबकि पूरे देश में सभी पार्टियों को मिलाकर छह विधायकों पर बलात्कार के मामले दर्ज हैं.

दिल्ली बलात्कार के बाद बनी जस्टिस वर्मा कमेटी के सदस्य गोपाल सुब्रमण्यम कहते हैं कि 'भारतीय लोकतंत्र ख़तरे में है.'

वर्मा कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में सिफ़ारिश की थी कि गंभीर आरोप झेल रहे सभी राजनेताओं को अपने पद से इस्तीफ़ा दे देना चाहिए. लेकिन उनकी सिफ़ारिश को सरकार ने मानने से इनकार कर दिया है.

एडीआर के संस्थापक सदस्यों में से एक प्रोफ़ेसर जगदीप चोकर कहते हैं, ''राजनीतिक पार्टियां केवल इस बात में विश्वास रखती हैं कि चुनाव जीतना ही असल मुद्दा है. चुनाव कैसे जीते जाएं इससे कोई लेना देना नहीं.''

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