वीरप्पन के साथियों की अर्जी पर सुनवाई से सुप्रीम कोर्ट का इंकार

सुप्रीम कोर्ट
Image caption राष्ट्रपति द्वारा सजा माफी की अपील ठुकराए जाने को 14 दिन के भीतर सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है

सुप्रीम कोर्ट ने शनिवार को मौत की सजा पाए चंदन तस्कर वीरप्पन के चार साथियों की अपील पर तत्काल सुनवाई करने से इंकार कर दिया है.

चंदन तस्कर वीरप्पन के चार साथी कर्नाटक के करीब 20 साल पुराने बारूदी सुरंग विस्फोट मामले में मौत की सजा पर अमल किए जाने के खिलाफ उच्चतम न्यायालय पहुंचे थे, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने अर्जी को खारिज कर दिया है.

सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंजाल्विस के मुताबिक उन्होंने मुख्य न्यायाधीश के घर पर जाकर इन लोगों की मौत की सजा के अमल पर रोक लगाने की अपील की, लेकिन उन्होंने इस आधार पर अपील पर सुनवाई करने से मना कर दिया कि उनके पास इस बात के कोई प्रमाण नहीं हैं कि इन चारों को रविवार को ही फांसी दी जानी है.

गोंजाल्विस और उनके साथी वकील समिक नारायण के मुताबिक उन्हें जब इस बात की सूचना मिली कि इन चारों लोगों को रविवार को ही फांसी दी जानी है, तो इसे स्थगित करने के लिए उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था.

इन लोगों का कहना था, “अब हम यही उम्मीद कर सकते हैं कि फांसी रविवार को नहीं होगी.”

क्या था मामला?

साल 1993 में कर्नाटक के पलार में बारूदी सुरंग विस्फोट मामले में वीरप्पन के बड़े भाई ज्ञानप्रकाश, सिमोन, मीसेकर मदैया और बिलावेन्द्रन को 2004 में मौत की सजा सुनाई गई थी. इस हमले में 22 पुलिसकर्मी मारे गए थे.

राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने 13 फरवरी को उनकी दया याचिकाएं खारिज कर दी थीं और माना जा रहा है कि उन्हें फांसी देने के लिए 17 फरवरी की तारीख तय की गई है. हालांकि राष्ट्रपति के इस फैसले के खिलाफ इन लोगों को 14 दिन के भीतर सुप्रीम कोर्ट में अपील करने का अधिकार है.

चारों दोषी कर्नाटक के बेलगाम की एक जेल में बंद हैं.

साल 2001 में मैसूर की एक टाडा अदालत ने उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी लेकिन शीर्ष अदालत ने सजा को बढाकर मृत्युदंड कर दिया था.

गिरोह के सरगना वीरप्पन की अक्टूबर 2004 में तमिलनाडु पुलिस के साथ एक मुठभेड़ में मौत हो गई थी.

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