महाकुंभ में बारिश से आफत

  • 17 फरवरी 2013
कुंभ में बारिश
Image caption सबसे ख़राब हालत तो लाखों कल्पवासियों की है जो अपना स्थान छोड़कर कहीं जा नहीं सकते

इस बार का महाकुंभ अगर करोड़ों लोगों को यहाँ के आद्यात्मिक आयोजनों, साधू-संतों की दुनिया को करीब से देखने और समझने के लिए, अखाड़ों के शाही स्नान और नागा सन्यासियों को बनने और देखने के लिए याद किया जायेगा तो वहीं दो दुखद कारणों से लोगों के जेहन में लम्बे समय तक रहेगा .

पहली तो मौनी अमावस्या के बाद स्टेशन पर हुई भगदड़ में हुई 38 लोगों की दुखद मौत के लिए, तो दूसरी बसंत पंचमी के आखिरी शाही स्नान के बाद हुई मुसलाधार बारिश के लिए जिसने पूरे मेले को अस्त-व्यस्त करके रख दिया.

बारिश भी ऐसी कि किसी को कुछ सोचने-समझने तक का वक्त नहीं मिला. जो जहाँ था, वही फँस कर रह गया.

क्या अधिकारियों के दफ्तर, क्या अखाड़ों के बडे-बडे पंडाल, क्या कल्पवासियों के टेंट और क्या अख़बारों के मेले में बने अस्थाई दफ्तर. सब जगह या तो पानी भरा था या वो अपनी नीव छोड़कर जमीन पर आ गिरे थे. लेकिन इन सबके बीच अगर कुछ सुखद था तो वो था यहाँ आने वाले श्रद्धालुओं का जज्बा जो सब मुसीबतों को झेलते हुए अब तक संगम के किनारे डटे हुए है.

मेले की शुरुआत से तीर्थ यात्रियों का आना जो शुरू हुआ वो बदस्तूर जारी है. हाँ ये बात और है की अखाडे अपने तीनों शाही स्नान संपन्न हो जाने के बाद अब फिर से 12 साल बाद लौटने के वायदे के साथ विदा हो रहे है.

बारिश से दिक्कत

लेकिन उनके अन्दर भी तीर्थयात्रियों की मौत का गम है. साथ ही बारिश के कारण उन्हें वापस जाने में भी दिक्कत का सामना करना पड़ रहा है. उन्होंने शायद ही सोचा था कि जाते वक्त उन्हें इस तरह परेसान होना पड़ेगा क्योंकि बारिश की वजह से उनके पंडाल हवाओं की वजह से गिर पडे.

कैम्पों में पानी भरने की वजह से सारा सामान पानी में भीग गया. और तो और पूरी रात मेले क्षेत्र में बिजली न आने की वजह से राहत भी नहीं मिल सकी. अब ये अपना सामान खुद ही समेटने पर मजबूर हैं. शासन से इनकी नाराजगी भी है कि इतनी परेशानियों के बाद कोई सरकारी अधिकारी उनका हाल जानने क्यों नहीं आया.

श्यामानंद पुरी कहते हैं, “हमको इस बात का दुःख है कि हमारी परेशानियों को देखने कोई भी सरकारी नुमाइंदा नहीं आया. हमारे टेंट में रखा सारा सामान भीग चुका है और रात भर हमने बिना लाईट के पानी में खडे होकर काटी है.”

सबसे ख़राब हालत तो लाखों कल्पवासियों की है जो अपना स्थान छोड़कर कहीं जा नहीं सकते. उनके टेंट भी इस बारिश के कारण जगह-जगह से अपनी जगह से उखड चुके हैं.

इसके पीछे धार्मिक कारण भी हैं. पौष पूर्णिमा के समय जब ये अपने कैम्प में आते हैं तो सबसे पहले ये अपनी कुटिया (टेंट) के बाहर तुलसी का पौधा रोपते है और भगवान सत्यनारायण को स्थापित करते है जो माघी पूर्णिमा के स्नान के बाद उनकी कथा सुनने के साथ ही सपन्न होता है .

तुलसी का पौधा भी उसी के बाद गंगा में विसर्जित होता है. ऐसा माना जाता है कि इसके पहले अगर कोई वहां से जाता है तो कल्पवास का उनका संकल्प अधूरा रह जाएगा.

भीगा-भीगा

Image caption बारिश की वजह से जगह-जगह पानी भर गया है

बारिश की वजह से इनका भी सारा सामान पानी में भीग चुका है और इनकी भी नाराजगी प्रशासन के उदासीन रवैये को लेकर ही है. इन कल्पवासियों का कहना है कि इतना हो जाने के बाद ना तो कैम्पों से पानी निकलने की ही व्यवस्था की गई और ना अब बिजली ही आई है.

महेश चंद कहते हैं, “हम तो यहाँ गंगा मइया की कृपा से आते है. हम यहाँ कल्पवास को पूरा किए बिना नहीं जायेंगे. हालाँकि हमारा सारा सामान भीग चुका है और खाना भी ठीक से नहीं मिल पा रहा है. अधिकारी हमारे कैम्प से पानी नहीं निकाल रहे हैं जिसकी वजह से बैठने तक की जगह नहीं बची है.

वही लगातार हुई इस बारिश के बाद अधिकारी भी लाचार और बेबस नजर आ रहे है. कल्पवासियों और यात्रियों को वापस भेजने के लिए मेले के परेड ग्राउंड में बस स्टेशन बना दिया गया है. उनके पुनर्वास के लिए 26 स्कूलों को खाली करा लिया गया है जिस पर एक सेक्टर मजिस्ट्रेट की तैनाती की गई है.

मेले में बिजली बहाल करने के लिए अधिकारी हर संभव प्रयास कर रहे हैं तो वहीं तमाम इंजीनियर गंगा के जल-स्तर पर बराबर नजर बनाये हुए है ताकि पानटून पुल पर कोई दिक्कत न आए.

कमिश्नर देवेश चतुर्वेदी के मुताबिक, “इस बात का तो अंदेशा था कि बारिश होगी लेकिन हमें इस बात का अंदाजा कतई नहीं था की इतनी बारिश होगी. हमारे कर्मचारी 24 घंटे से ज्यादा समय से बिना सोए राहत के काम में लगे है. हम इस बात की कोशिश कर रहे है कि किसी भी तीर्थयात्री को ज्यादा समय तक परेशानियों का सामना ना करना पड़े.”

अगर आप इस समय मेले में आयें तो आपको इसके दो रंग नजर आयेंगे.

पहला तो बारिश की वजह से जगह-जगह उखडे हुए टेंट पंडाल और उसमे भरा हुआ पानी और दूसरी तस्वीर उन लाखों कल्पवासियों की जो इतनी मुसीबतों के बाद भी संगम की रेती पर इस विश्वास के साथ डेरा डाले है कि इश्वर उनकी परीक्षा ले रहा है और अगर वो इसमें पास हुए तो उनके परिवार में सुख-शांति तो आएगी ही, साथ ही वो उन्हें मोक्ष भी प्रदान करेगा.

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