वीरप्पन के साथियों की फाँसी पर संशय

  • 17 फरवरी 2013
सुप्रीम कोर्ट
Image caption सुप्रीम कोर्ट ने शनिवार को वीरप्पन के साथियों की अपील ठुकरा दी थी

चंदन तस्कर वीरप्पन के चार साथियों की फाँसी की सज़ा पर संशय की स्थिति बनी हुई है. सुप्रीम कोर्ट ने शनिवार को इनकी अपील पर तुरंत सुनवाई करने से इनकार कर दिया था.

स्थानीय वरिष्ठ पत्रकार भास्कर हेगडे़ का कहना है कि सूत्रों से यह ख़बर मिल रही है कि संभवतः दो दिनों तक के लिए उनकी फाँसी की सज़ा रोक दी गई है.

पहले इस तरह की खबरें मीडिया में आ रहीं थी कि इन चारों अभियुक्तों को रविवार को फाँसी दी जा सकती है.

सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंजाल्विस का कहना है कि कर्नाटक के जेल के नियमों के अनुसार दया याचिका ख़ारिज होने और फाँसी देने के बीच कम से कम 14 दिनों का समय मिलना चाहिए.

हालांकि वह आशंका जताते हुए कहते हैं कि कसाब और अफज़ल के मामले में जिस तरह से फैसला लिया गया, ऐसे में इस वक्त सिर्फ अटकलें ही लगाई जा सकती है.

वीरप्पन के चार साथियों के परिवार वालों को कोई सूचना दी गई है या नहीं इस पर उनका कहना है कि 12 तारीख को कर्नाटक सरकार ने उनके परिवार को यह सूचना दी थी कि उनकी दया याचिका ख़ारिज कर दी गई है लेकिन ऐसी सूचना नहीं आई कि उनकी फाँसी होनी वाली है.

अर्जी ख़ारिज

इससे पहले, चंदन तस्कर वीरप्पन के चार साथी कर्नाटक के करीब 20 साल पुराने बारूदी सुरंग विस्फोट मामले में मौत की सज़ा पर अमल किए जाने के खिलाफ शनिवार को उच्चतम न्यायालय पहुंचे थे, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उनकी अर्जी पर तत्काल सुनवाई से इनकार कर दिया था.

गोंजाल्विस के मुताबिक उन्होंने मुख्य न्यायाधीश के घर पर जाकर इन लोगों की मौत की सज़ा के अमल पर रोक लगाने की अपील की, लेकिन न्यायाधीश ने इस आधार पर अपील पर सुनवाई करने से मना कर दिया कि उनके पास इस बात के कोई प्रमाण नहीं हैं कि इन चारों को रविवार को ही फाँसी दी जानी है.

गोंजाल्विस और उनके साथी वकील समिक नारायण के मुताबिक उन्हें जब इस बात की सूचना मिली कि इन चारों लोगों को रविवार को ही फाँसी दी जानी है, तो इसे स्थगित करने के लिए उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था.

इन लोगों का कहना था, “अब हम यही उम्मीद कर सकते हैं कि फाँसी रविवार को नहीं होगी.”

क्या था मामला?

साल 1993 में कर्नाटक के पलार में बारूदी सुरंग विस्फोट मामले में वीरप्पन के बड़े भाई ज्ञानप्रकाश, सिमोन, मीसेकर मदैया और बिलावेन्द्रन को 2004 में मौत की सज़ा सुनाई गई थी. इस हमले में 22 पुलिसकर्मी मारे गए थे.

राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने 13 फरवरी को उनकी दया याचिकाएं ख़ारिज कर दी थीं और माना जा रहा है कि उन्हें फाँसी देने के लिए 17 फरवरी की तारीख तय की गई है. हालांकि राष्ट्रपति के इस फैसले के खिलाफ इन लोगों को 14 दिन के भीतर सुप्रीम कोर्ट में अपील करने का अधिकार है.

चारों दोषी कर्नाटक के बेलगाम की एक जेल में बंद हैं.

साल 2001 में मैसूर की एक टाडा अदालत ने उन्हें आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई थी लेकिन शीर्ष अदालत ने सज़ा को बढाकर मृत्युदंड कर दिया था.

गिरोह के सरगना वीरप्पन की अक्टूबर 2004 में तमिलनाडु पुलिस के साथ एक मुठभेड़ में मौत हो गई थी.

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