अफ़गानिस्तान में मंद पड़ा बुर्के का कारोबार

  • 28 फरवरी 2013
अफ़गानिस्तान
Image caption अफ़गानिस्तान में महिलाओं के लिए बुर्के के प्रतीक से बाहर निकलना एक चुनौती है

अफ़गानिस्तान की राजधानी काबुल में बुर्के के कारोबार में लगे लोगों का कहना है कि उनके लिए काम करना मुश्किल हो रहा है जबकि कुछ कहते हैं कि ये धंधा बंद हो रहा है.

तालिबान के शासन में शरीर को पूरी तरह से ढ़क लेने वाला बुर्का महिलाओं के लिए ज़रुरी होता था. लेकिन अब कम ही महिलाएं हैं जो बुर्का पहनती हैं. इतना ही नहीं चीन से आने वाले सस्ते बुर्कों का नतीजा ये है कि कीमत एक तिहाई गिर गई है. व्यापारी कहते हैं कि अब इस धंधे में पैसा नहीं हैं.

पश्तो संगीत के बीच एक ठंड भरी दोपहर में बीबीसी संवाददाता कारेन ऐलन काबुल में एक मां और बेटी से मिलने पहुंची हैं. मस्तूरा पिछले 10 साल से बुर्का सिलने का काम रही हैं. कई मायनों में बुर्का अफ़गानिस्तान का प्रतीक रहा है. लेकिन ये बुर्का अफगान महिलाओं की शालीनता का प्रतीक है या दबाव..ये नज़रिए पर निर्भर करता है.

बदलाव की बयार

मस्तूरा कहती हैं कि काबुल में अब माहौल बदल रहा है. पहले महिलाओं पर बहुत अधिक दबाव होता था. वो बिना बुर्के के बाहर नहीं जा सकती थीं. यही वजह थी कि बुर्के का व्यापार चरम पर था और बुर्के की बहुत अधिक मांग थी.

उन्होंने कहा, “मैं अल्लाह की शुक्रगुज़ार हूं कि अब महिलाओं के पास आज़ादी है और महिलाएं बुर्का नहीं पहन रही हैं. अब देश कुछ सुरक्षित हो गया है. लेकिन जब हम काबुल से बाहर जाते हैं तो हमें बुर्का पहना पड़ेगा.”

काबुल के भीतरी इलाके की इस गली में कई बुर्के की दुकाने हैं लेकिन अब इनमें से कुछ बंद हो रही हैं. थोक की दुकान वाले कहते हैं कि उनका व्यापार आधा हो गया है.

हज़ीज अब्दुल पिछले 20 साल से बुर्के बेच रहे हैं. वो बताते हैं कि यहां इलाके के हिसाब से बुर्के का रंग होता है. कांधार के लिए भूरा रंग जबकि बाक़ी पूरे अफ़गानिस्तान में दिखाई देने वाला नीला रंग.

चीन के सस्ते बुर्के

चीन से आने वाले बुर्कों की वजह से कीमत गिर गई है. जो बुर्का पहले लगभग 2500 रुपये में मिलता था वो अब सिर्फ 700 रुपये में मिल जाता है. थोक का व्यापारी होने की वजह से हज़ीज किसी तरह से अपने व्यापार को कायम रख पा रहे हैं.

लेकिन उनके पड़ोसी ओबेद कहते हैं कि उन्हें बुर्के का व्यापार छोड़ने के लिए मज़बूर होना पड़ा है और अब वो जूतों की दुकान चलाते हैं. काबुल में ओबेद जैसे व्यापारी और भी हैं.

अब लोगों के पास आज़ादी है और अपनी पसंद चुनने का अधिकार हैं. यही वजह है कि महिलाओं पर बुर्का पहने का दबाव नहीं है. इसने उनके काम को प्रभावित किया है.

मौन क्रांति

Image caption चीन से आने वाले बुर्कों की वजह से कीमत गिर गई है

काबुल में गुपचुप तरीक़े से एक क्रांति हो रही है. कुछ महिलाएं बुर्के को छोड़ सिर पर पहने जाने वाला स्कार्फ और ऐसे ही शालीन कपड़ों का इस्तेमाल कर रही हैं. लेकिन समशी हसनी एक चित्रकार हैं और वो बुर्के का इस्तेमाल अपनी कलाकारियों में कर रही हैं.

वो जाली वाले बुर्के का इस्तेमाल करती हैं और कहती हैं कि बुर्का ताकत का प्रतीक है ना कि अधीनता स्वीकार करने का.

उन्होंने कहा कि अपने चित्रों के माध्यम से वह अफ़गानिस्तान में महिलाओं की स्थिति को दिखाती हैं. हसनी ने कहा, “मै दिखाना चाहती हूं कि महिलाओं के बुर्के को बदलने की ज़रुरत नहीं है बल्कि सोच को बदलने की ज़रुरत है. मेरे चित्र अफ़गानिस्तान में सकारात्मक बदलाव की प्रतीक हैं.”

कुछ महिलाएं पढ़ नहीं सकती, कुछ महिलाएं घर से बाहर नहीं जा सकती, कुछ महिलाओं को परिवार से परेशानी है और कुछ महिलाओं के पास कोई आज़ादी नहीं है. आज़ादी बुर्का हटाने में नहीं है... आज़ादी शांति में है.

अफ़गानिस्तान में महिलाओं के लिए बुर्के के प्रतीक से बाहर निकलना एक चुनौती है और राजधानी काबुल के बाहर बुर्का आज भी हर जगह दिखाई देता है. काबुल में बुर्के का व्यापार घट रहा है और परंपरा को बचाए रखने और बदलाव की बयार के बीच एक कशमकश साफ दिखाई देती है.

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