आख़िर अफ़ज़ल ने लिखा क्या है?

Image caption अफज़ल गुरु को फांसी दिए जाने का कश्मीर में विरोध भी हुआ था.

अफज़ल गुरु ने कथित तौर पर कश्मीर के एक अख़बार को चिट्ठी लिखी थी. यह चिट्ठी पिछले हफ्ते अख़बार ने प्रकाशित की है. इस चिट्ठी को लेकर अब विवाद हो रहा है. उर्दू में लिखी आठ पन्नों की इस चिट्ठी के दो सबसे महत्वपूर्ण पन्नों का अनुवाद हम यहां दे रहे हैं.

मोहतरम शबनम कय्यूम साहब, 29 जून 2008 को यहां मेरी मुलाक़ात एक न्यूज़ एजेंसी, इंडियन एशियन न्यूज़ एजेंसी (आईएएनएस), के रिपोर्टर जिसका नाम साहिल मक्कड़ है, से हुई. उसने मेरा एक तफ्सीली इंटरव्यू लिया लेकिन बाद में सिर्फ उसका छोटा सा हिस्सा अख़बारों को दिया और वो थोड़ा सा भी स्याको साबाक (संदर्भ) और उसके कंटेन्ट्स बदल कर दिया गया था. इस तरह इस इंटरव्यू के सब्सटांस को पूरी तरह डिस्टॉर्ट किया था. चूंकि वह जिस मकसद के लिए आया था या भेजा गया था वो पूरा नहीं हुआ इसलिए वो नाउम्मीद होकर वापस गया.

उसने बार बार तहरीक ए मज़ाहिमत (विरोध आंदोलन) के ताल्लुक से पाकिस्तान की डांवाडोल नीति का ज़िक्र किया. मैंने हर बार उसको ये समझाने की कोशिश की कि तहरीक ए मज़ाहिमत जारी रहेगी क्योंकि इसका ताल्लुक कश्मीर के सियासी मसले से है. लिहाज़ा जब तक ये संघर्ष रहेगा कश्मीर संघर्ष वाला क्षेत्र बना रहेगा.

Image caption अफज़ल गुरु ने कथित तौर पर एक पत्र पूर्व में एक अख़बार को भेजा था.

मोहतरम कय्यूम साहब. मैं आपके ज़रिए हिज़्बुल्ला के सैन्य लीडर जनाब मोहतरम सैय्यद सलाहुद्दीन साहब को अदब और एहतराम से गुज़ारिश कर रहा हूं कि वो 13 दिसंबर 2001 के वाकये को साज़िश का नाम न दें. इस बयान से मुझे दिली तकलीफ होती है. 13 दिसंबर 2001 का ताल्लुक मसला ए कश्मीर से है. अगर 13 दिसंबर एक साज़िश है तो फिर पूरा उग्रवाद ही एक साज़िश है. हमें 13 दिसंबर पर कोई शर्मिंदगी महसूस नहीं होनी चाहिए. जिन लोगों ने सरजमीन ए कश्मीर को कब्रिस्तान बनाया, जिन लोगों ने मासूम और बेगुनाह अवाम का खून बहाया, जिन लोगों ने वादी के चप्पे चप्पे को फौज़ी छावनियों में तब्दील किया, जब भारत को अपने उन करतूतों और गैर इंसानी कामों पर शर्म नहीं आती, जब भारतीय हुक्मरान को बार बार कश्मीर को भारत का हिस्सा करार देकर अपने किए गए वादों को तोड़ देने में शर्म नहीं आती, सेक्स स्कैंडल में मुलव्विस हुक्मरान, फौज़ी अफसरों, ओहदेदारों को वापस बहाल करने में भारतीय हुक्मरानों को शर्म नहीं आती, जम्हूरियत और आज़ादी ए राय, शांतिपूर्ण प्रदर्शनों की धज्जियां उड़ाने वालों को जब शर्म महसूस नहीं होती तो हम 13 दिसंबर के वाकये से क्यों शर्माएं.

अगर हिज्बुल्ला के प्रमुख को मुझसे हमदर्दी और मोहब्बत है तो फिर मेरी शहादत के लिए दुआ करें. जहां तक मेरे ख़त जो अख़बार और किताबों की शोभा बनाए गए हैं तो वो खालिश सोची समझी साज़िश है जो मेरे खिलाफ की गई, इसके लिए मेरा वकील ज़िम्मेदार है. मुझे तो भारतीय खुफिया विभाग ने अभी तक परेशान करना नहीं छोड़ा.

अगर 13 दिसंबर भारत के दिल पर चोट है तो उन चोटों और जख्मों का हिसाब कौन देगा जो भारत के जालिम, दमनकारी और कब्जा करने वाली फौज़ों ने कश्मीरियों के दिलों पर लगाई हैं.

उन लोगों ने हमारे बुजुर्गों, हमारी बहनों और बेटियों का जो अनादर और बेइज्जती की है उसको भूल जाना बेगैरती, बेवफाई और गद्दारी होगा.

मसला ए कश्मीर एक ऐसा हल तलब मसला है जिसके बगैर भारत समर्थक और भारतीय हुक्मरानों का अमन और चैन क्षणिक ही रहेगा. जहां तक भारत के गरीब और मजलूम अवाम का ताल्लुक है वो इंसानी तौर पर हमारे भाई हैं. हम पहले भी और अब भी सड़कों, बसों, गाड़ियों वगैरह, अवामी जगहों पर बम धमाके करने को दहशतगर्दी कहते थे और कहेंगे. जिस बात या जिस काम को करने के बाद उस पर शर्मिंदगी महसूस हो वो बात या काम हमेशा ग़लत होता है. जिस काम को छुपाने की ज़रुरत पड़े वो काम हमेशा गलत होता है.

हम जो करते हैं उसे छुपाते नहीं हैं. हमारा विरोध हमारा हक है. मोहतरम शबनम कय्यूम साहब, पिछले हफ्ते बार एसोसिएशन वाले यहां तिहाड़ के दौरे पर आए थे. जेल अधिकारियों ने मुझे बार वालों से मिलने से रोका. जब मैंने जेल सुपरिटेंडेंट से खत लिखकर उसकी वजह पूछी तो उसने कहा कि उन्हें ऊपर से आदेश मिले थे इसलिए वो मजबूर थे.

ये लोग मेरी हर बात को रोकने की कोशिश करते हैं. बहरहाल जब तक सांसें चल रही हैं हक की बात कहने की अपने इमकान की हद तक कोशिश करेंगे. जालिम हुक्मरान के सामने हर बात को साफ अल्फाज़ में कहना हक की गवाही देने के बराबर है. हर बात की गवाही देना ही शहादत है. हिम्मत से ही हालात बदल सकते हैं. हक ज्यादा देर अकेला नहीं रहता..

अल्लाह हाफिज़

दुआओं के साथ

मोहम्मद अफज़ल गुरु

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