चुनावी बजट पेश करने की असफल कोशिश: झुनझुनवाला

  • 28 फरवरी 2013
Image caption लोगों के लिए रोज़गार पैदा नहीं कर पाएगा या बजट

वित्त मंत्री पी चिदंबरम के वित्तीय वर्ष 2013-14 के बजट को देखते हुए ऐसा लगता है कि बढ़ते वित्तीय घाटा को रोकने और निवेशकों के विश्वास को बहाल करने के लिए कुछ नहीं किया गया है.

बढ़ता वित्तीय घाटा इस समय अर्थव्यवस्था की सबसे मुख्य समस्या है और उसे दूर करने के लिए न तो कुछ किया गया है और न ही उस पर क़ाबू पाने की कोई संभावना नज़र आ रही है.

रोज़गार पैदा करने के मामले में भी मरी समझ से ये एक नकारात्मक बजट है क्योंकि पिछले सालों में मनरेगा पर 37 से 40 हज़ार करोड़ रूपए ख़र्च किए गए थे जबकि इस साल 33 हज़ार करोड़ रूपए का प्रावधान है.

उसका कारण ये है कि मनरेगा के लिए बजट की मांग में कमी आ रही है, क्योंकि मनरेगा के बाहर लोगों को 200-300 रूपए प्रतिदिन मज़दूरी के तौर पर मिल जाते हैं जबकि मनरेगा में प्रतिदिन केवल 125 रूपए ही मिलते हैं.

वित्त मंत्री को मनरेगा में मिलने वाली प्रतिदिन मज़दूरी को बढ़ाकर 150 या 200 रूपए करनी चाहिए थी लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया.

मेरे विचार से वित्त मंत्री अगर मनरेगा को समाप्त करके उसी पैसे को किसानों और छोटे उद्योगों को रोज़गार पैदा करने के लिए सब्सिडि के तौर पर देते तो वो ज़्यादा बेहतर होता. उससे रोज़गार भी पैदा होता और निवेश भी बढ़ता.

लेकिन इस बजट के कुछ प्रावधान स्वागत योग्य भी हैं.

अमीरों पर, वातानुकूलित रेस्त्रां पर, एसयूभी गाड़ियों पर, सिगरेट पर टैक्स बढ़ाना मेरे ख़्याल में इस बजट का विशेष सकारात्म पहलू है.

पहली बार केवल महिलाओं पर आधारित सरकारी बैंक खोले जाने का प्रावधान या खाद्य सुरक्षा के लिए बजट में जो प्रस्ताव हैं तत्काल उसका असर सकारात्मक हो सकता है लेकिन ये सारी चिज़ें फ़िलहाल केवल घोषणाएं हैं और इसका असर बहुत दिनों के बाद ही पता चल सकता है, और शीघ्र ही लोगों को इन प्रस्तावों के खोखलापन का पता चल जाएगा.

आयकर में कोई छूट नहीं देकर वित्त मंत्री ने साफ़ तौर संकेत दिया है कि मौजूदा अर्थव्यवस्था उन्हें इस बात की इजाज़त नहीं है उनके हाथ बंधे हुए हैं.

लेकिन सरकार की वित्तीय सीमाओं को देखते हुए आयकर में कोई ख़ास छूट की किसी को कोई ज़्यादा आशा थी भी नहीं.

शांत बजट

जहां तक उद्योगों का सवाल है बजट में निवेश पर भत्ता देने की बात कही गई है लेकिन उद्योग जगत की मुख्य शिकायत लाल फ़ीताशाही की है जिस पर कोई पहल नहीं की गई है.

इससे यूपीए-2 की राजनीतिक इच्छा शक्ति में कमी झलकती है. वित्त मंत्री ने बढ़ते वित्तीय घाटे और ऊर्जा ज़रूरतों के लिए विदेशों पर बढ़ती निर्भरता का ज़िक्र किया लेकिन उसको रोकने के लिए उन्होंने कुछ नहीं किया.

इसके लिए देश में ऊर्जा की खपत कम करनी होगी और वित्ता मंत्री चाहते तो ऊर्जा की खपत को दो-तीन वर्गों में बांट सकते थे.

एक जो ज़रूरी खपत है जैसे एक बिजली मीटर पर 200 यूनिट की खपत और दूसरा जो विलासिता वाली खपत है.

ज़रूरी खपत तो ठीक है लेकिन वित्त मंत्री को विलासिता वाली खपत पर अंकुश लगाने की कोशिश करनी चाहिए. मुझे लगता है कि वित्त मंत्री ने ये मौक़ा गंवा दिया.

मौजूदा साल में कई राज्यों में चुनाव होने वाले है, इसके साथ ही 2014 में आम चुनाव होने वालें हैं इसलिए वित्त मंत्री चाहते तो थे कि लोक-लुभावन बजट पेश करें लेकिन उनके हाथ बंधे हुए थे इसलिए उन्होंने कैश ट्रांसफ़र योजना पर अपनी सारी उम्मीदें लगा रखी हैं और मुझे लगता है कि सरकार को आम चुनाव में इसका कुछ लाभ भी मिलेगा. लेकिन सरकार ये फ़ैसला तो बजट से पहले ही कर चुकी है इसलिए बजट का इससे सीधा कोई संबंध नहीं है.

मैं समझता हूं कि चुनावों के मद्देनज़र ये बजट शांत है, कुछ कह नहीं रहा है.

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