क्या महिलाओं के लिए अलग बैंक की जरूरत है?

  • 28 फरवरी 2013
indian women
Image caption भारत में केवल 26 प्रतिशत महिलाओं का किसी वित्तीय संस्था में औपचारिक खाता है

क्या भारत में महिलाओं के लिए बैंक की जरूरत है? भारत सरकार ऐसा सोचती है. लोकसभा में आज पेश किए गए वार्षिक बजट में इस बैंक की घोषणा की गई है जिसकी शुरुआती पूंजी 18.4 करोड़ डॉलर रखी गई है.

वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने कहा कि इस बैंक को अक्टूबर में लांच किए जाने की संभावना है और इसका संचालन सरकार द्वारा किया जाएगा.

उन्होंने कहा कि महिला बैंक में महिलाओं को ही कर्मचारी रखा जाएगा और ये अधिकांशत: महिलाओं को ही ऋण देगा. बैंक महिलाओं से जुड़े लैंगिक मुद्दों, उनके सशक्तिकरण और वित्तीय समावेश की दिशा में काम करेगा.

इस लिहाज से देखा जाए तो देश में महिलाओं के लिए अलग से बैंक की बात समझ में आती है.

विश्व बैंक की ग्लोबल फ़ाइनेंशियल इनक्लूजन डेटाबेस स्टडी के मुताबिक भारत में केवल 26 प्रतिशत महिलाओं का किसी वित्तीय संस्था में औपचारिक खाता है. इसका मतलब है कि उनका किसी बैंक, क्रेडिट यूनियन, कॉपरेटिव, पोस्ट ऑफिस या माइक्रोफ़ाइनेंस संस्था में से किसी एक में खाता है.

ये वैश्विक औसत 47 प्रतिशत से कम है. यहां तक कि ये विकासशील देशों के 37 प्रतिशत के मुक़ाबले भी कम है.

महिलाओं का सशक्तिकरण

भारत में अधिक से अधिक महिलाएं अब कामकाजी होती जा रही हैं और उनकी एक बड़ी संख्या अनौपचारिक अर्थव्यवस्था से जुड़ी है. ऐसी सूरत में महिलाओं के लिए अलग से बैंक की वकालत करने वालों का तर्क है कि ये महिलाओं के सशक्तिकरण और उन्हें वित्तीय रूप से आत्मनिर्भर बनाने में मदद करेगा.

भारत में अधिकांश महिलाएं अपनी कमाई पति के हाथों में थमा देती हैं. कई अध्ययनों से साबित हुआ है कि पुरुषों की तुलना में महिलाएं ज़्यादा बचत करने वाली होती हैं लेकिन अधिकांश महिलाओं के पास बैंक खाता नहीं है.

जाने माने सामाजिक उद्यमी और विशेषज्ञ विजय महाजन कहते हैं कि ऐसे देश में जहां कई संस्थागत समस्याएं हैं, महिलाओं के लिए बैंक की प्रतीकवाद से ज़्यादा कोई अहमियत नहीं है. इन संस्थागत समस्याओं के कारण ही महिलाएं वित्तीय संस्थाओं से दूर हो गई हैं.

उन्होंने कहा, "बैंक महिलाओं के लिए आसानी से ऋण नहीं देते हैं क्योंकि उनमें से अधिकांश घर से ही अपना कारोबार चलाती हैं और औपचारिक अर्थव्यवस्था का हिस्सा नहीं हैं."

संपत्ति का अधिकार नहीं

साथ ही बैंक ऋण के बदले कुछ संपत्ति गिरवी रखने पर जोर देते हैं. लेकिन भारत में बड़ी संख्या में महिलाओं के पास संपत्ति का अधिकार नहीं है और यही वजह है कि वे ऋण के बदले कुछ जमा कराने की स्थिति में नहीं रहती हैं.

Image caption भारत में बड़ी संख्या में महिलाओं के पास संपत्ति का अधिकार नहीं है

सरकार के इस कदम के आलोचकों का ये भी तर्क है कि क्या सरकार को गुजरात में सामाजिक कार्यकर्ता इला भट्ट द्वारा 41 साल पहले महिलाओं के लिए खोले गए सेवा बैंक का अनुसरण नहीं करना चाहिए था.

लाभ में चल रहे इस बैंक के 60 हज़ार से अधिक सदस्य हैं और बैंक बचत, क्रेडिट और बीमा सुविधा भी देता है.

दूसरे लोगों का मानना है कि भारत को वास्तव में महिलाओं और पुरुषों के लिए अधिक वित्तीय सेवाएं देने की जरूरत है. देश में केवल 35 प्रतिशत लोगों को ही बैंकिंग सेवाएं उपलब्ध हैं जबकि वैश्विक औसत 50 प्रतिशत है.

बैंकों की कमी

देश में लगभग 100,000 बैंक शाखाएं हैं और देश के 650,000 गांवों में से अधिकांश में एक भी बैंक नहीं है.

गरीबी, अशिक्षा, नियमित आय की कमी, लेनदेन की भारी लागत ने देश में गरीबों को बैंकिंग प्रणाली से दूर कर रखा है. इनमें से कई सूदखोरों की दया पर निर्भर हैं जो भारी व्याज वसूलते हैं और कर्ज लेने वाले को कंगाल करके छोड़ते हैं.

भारत के केन्द्रीय बैंक ने वित्तीय सेवाओं का दायरा बढ़ाने के लिए कई उपाय किए हैं जैसे बचत खाता खोलने की प्रक्रिया को सरल बनाना, बैलेंस को न्यूनतम रखना, बैंक दस्तावेज़ों में क्षेत्रीय भाषाओं का इस्तेमाल को बढ़ावा देना, अधिक से अधिक लोगों तक पहुँच बनाने के लिए माइक्रोफाइनेंस संस्थाओं और स्वयंसेवी संस्थाओं की मदद लेना और आसान ऋण तथा वित्त शिक्षा देना.

शायद भारत को महिलाओं के लिए अलग बैंक से ज़्यादा अधिक से अधिक ऐसे उपायों की जरूरत है.

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