कुंभ में चली ऑस्ट्रेलियाई किसान की नौका

  • 1 मार्च 2013
Image caption एंड्र्यू टर्नर के साथ उनका पूरा परिवार संगम नगरी में मानव सेवा में लगा है.

ऑस्ट्रेलिया के एक किसान एंड्र्यू टर्नर भारत के कुंभ मेले में ख़ुद की तैयार की गई नौका से तीर्थयात्रियों को संगम दर्शन करा रहे हैं.

दुनिया के इस सबसे बड़े धार्मिक समागम में लाखों लोग संगम स्नान के लिए आते हैं और सैकड़ों लोग प्रति दिन गंगा-यमुना के संगम स्थल को देखने के लिए नाव की सवारी करते हैं.

आमतौर पर यहां एक घंटे तक नाव की सवारी का शुल्क तीन हज़ार रुपए तक हो सकता है.

स्थानीय मल्लाहों की इसी प्रतियोगी भीड़ में जहां पतवार और मोटर वाली नावें बहुतायत में हैं, एंड्र्यू टर्नर मुफ़्त में तीर्थयात्रियों को अपनी नाव की सवारी करा रहे हैं.

सपना

दो लोगों का एक परिवार टर्नर की क़रीब साढ़े पांच मीटर लंबी पतवार वाली नौका की सवारी कर जब लौटता है तो इस अनुभव को ‘शानदार’ और ‘जादुई’ क़रार देता है.

एंड्र्यू टर्नर ने 1989 में पहली बार कुंभ मेले में जाने के बाद से ही तीर्थयात्रियों को नाव की सवारी करने का सपना देखा था.

उस समय वो एक पर्यटक के रूप में भारत आए थे और घूमते हुए कुंभ मेले में पहुंच गए थे. उसके बाद अपने सपने को साकार करने के लिए उन्होंने अमरीका में नाव बनाने की कला का अध्ययन भी किया.

उसके बाद वर्जीनिया 'जिन्नी' कैमरन से शादी के बाद संगम में नाव की फेरी लगाने का विचार परवान चढ़ा, लेकिन 2001 के कुंभ मेले में वो नहीं आ सके क्योंकि उनकी जुड़वां बेटियां उसी समय पैदा हुई थीं.

फिर कई साल तक योजना बनाने के बाद टर्नर ने सिडनी के उत्तर स्थित कॉम्बॉयने की अपनी 90 एकड़ की खेतीबाड़ी से अवकाश लिया और पिछले अक्तूबर में अपने परिवार के साथ इलाहाबाद के नज़दीक वाराणसी पहुंच गए.

Image caption टर्नर ने 1989 में ही कुंभ में नाव चलाकर मानवता की सेवा का सपना देखा था.

भारत आने और कुंभ मेले में सेवा देने की वजह बताते हुए 45 वर्षीय चार बच्चों के पिता टर्नर कहते हैं, “पिछली बार जब मैं भारत में था तो मानवता में मेरा विश्वास और गहरा हुआ. मैं अकेला यात्रा कर रहा था और कई बार मेरी जान को भी ख़तरा पैदा हो गया और हर बार किसी न किसी भारतीय ने मेरी मदद की. इसीलिए मैं भारत आकर वो क़र्ज़ उतारना चाहता था.”

भारत के आभारी टर्नर के 11 से 20 वर्ष के बच्चे इलाहाबाद में हिंदी भाषा सीख रहे हैं.

सफ़र

भारत पहुंचने के बाद टर्नर पहले वाराणसी के बाहर एक फ़ार्म में रुके लेकिन स्थानीय भाषा की जानकारी के बिना नाव बनाने के लिए सामान जुटाने में उन्हें काफ़ी दिक़्क़त हुई.

इसीलिए कुंभ मेले की शुरुआत से कुछ महीने पहले वो परिवार के साथ मानवता के प्रति अपने अखंड विश्वास के साथ इलाहाबाद पहुंच गए.

वहां भी उनकी मदद कुछ अपरिचित लोगों ने ही की. उन्होंने टर्नर के रहने के लिए एक ऐसी जगह तलाशी जहां वो अपनी नाव बना सकते थे.

वहीं कुछ मित्रों और अपने बड़े बेटे रे की मदद से उनकी नाव आकार लेने लगी.

Image caption महाकुंभ में दुनियाभर से आए लाखों श्रद्धालु गंगा-यमुना के संगम पर पाप मुक्ति और मोक्ष कामना से डुबकी लगाते हैं.

टर्नर के मेज़बान इवान और पूर्णिमा लामेच ने उन्हें बाइबिल कथा की तर्ज़ पर “नोआ” का नाम दिया. बाइबिल में नाव बनाने वाले पात्र का नाम नोआ था और उनके पिता का नाम लामेच था.

जनवरी के तीसरे हफ़्ते में टर्नर की नाव बनकर तैयार हो गई.

टर्नर ने इस नाव का नाम ‘करुणा’ रखा और 24 जनवरी को बैंडबाजे के साथ एक ट्रैक्टर पर सवार होकर ये नाव संगम तट पर पहुंची.

लेकिन उसे पानी में उतरने के लिए ज़रूरी काग़ज़ी कार्रवाई पूरी करने में 11 दिन और लग गए.

शिक्षा

उसके बाद से एंड्र्यू टर्नर, उनके बेटे और मित्र लगातार यात्रियों को नाव की सवारी करवा रहे हैं.

टर्नर ने इस सेवाकार्य को फ़रवरी के अंत तक जारी रखा. उसके बाद उनकी योजना पांच लाख की लागत वाली इस नाव को बेचकर कुछ रक़म हासिल करने और फिर स्वदेश लौटने की है.

इस कुंभ यात्रा से हुए लाभ के बारे में टर्नर की पत्नी कैमरन बताती हैं, “ये मेरे बच्चों के लिए बहुत बड़ी शिक्षा रही. मेरे दो बेटों ने नाव बनाने की कला सीखी. इसके साथ ही हमने ये भी देखा कि प्रदूषित होने के बावजूद गंगा नदी का लोग यहां कितना सम्मान करते हैं.”

जबकि एंड्र्यू टर्नर इस कुंभ यात्रा के बारे में कहते हैं, “हम अपने बच्चों को ये बता सके कि जीवन में वो जो कुछ भी करें, ज़रूरी ये है कि लगन के साथ करें. अगर वो ऐसा करेंगे तो कामयाबी मिलेगी. ये एक बड़ी सीख है.”

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