मिलिए 'बैंबू वुमन' से !

Image caption मिनहाज़ मजूमदार ने असम के कारीगरों के साथ मिलकर बांस के सामान को बड़ा बाज़ार देने का काम शुरू किया.

काम के बेहतर अवसरों की तलाश लोगों को छोटे शहरों और क़स्बों से बड़े शहरों में लाती है और पीछे छूट जाता है बहुत कुछ जो सिर्फ़ यादों में रहता है लेकिन मिनहाज मजूमदार ने ऐसा नहीं होने दिया.

असम की रहने वाली मिनहाज अपने राज्य की विशेषता यानी ‘बांस’ को ले आईं दिल्ली और उसी में खोज लिया करियर.

मिनहाज बताती हैं “मैने जेएनयू से तुलनात्मक साहित्य में पढ़ाई की. मेरे ज़्यादातर साथियों ने शिक्षा के क्षेत्र में करियर बनाया. मुझे लिखने का शौक़ था तो मैं एक प्रतिष्ठित पत्रिका के लिए लिखने लगी लेकिन दिमाग़ में हमेशा यही था कि कुछ ऐसा करूं जो मेरे अपने राज्य से जुड़ा हो, वहां के लोगों से जुड़ा हो. बांस से बना सामान और उसे बनाने वाले कारीगर मुझे हमेशा से बहुत रिझाते थे तो बस सोच लिया कि इन्हे एक नया रास्ता और नई मंज़िल दूंगी. यही मेरा काम होगा ”.

चुनौती

भारतीय मध्यम वर्ग में पढ़ाई लिखाई का सीधा संबंध नौकरी से जोड़ा जाता है यानी कुछ भी पढ़ो मक़सद है एक नौकरी हासिल करना और जब ऐसे में कोई ये तय करे कि वो नौकरी नहीं कुछ और करने का इरादा रखता हो तो चुनौतियों का दौर शुरू हो जाता है.

मिनहाज कहती हैं, “जब मैने अपनी इच्छा जताई तो सबने कहा क्या ज़रूरत है बांस के साथ काम करने की. एक अच्छी नौकरी लो किसी बढ़िया कंपनी में, लेकिन मेरे मन में कुछ और था, मुझे एक पुल बनना था अपने राज्य और उसके कारीगरों के लिए. अगर सभी लोग बड़े शहरों में जाकर भूल जाएं कि वो कहां से आएं हैं तो गांवों और क़स्बों की तरफ़ कौन देखेगा ”.

इस तरह मिनहाज ने असम के स्थानीय बांस का सामान बनाने वालों के साथ काम शुरू किया. शहरी ज़रूरतों के हिसाब से उस सामान में बदलाव, कारीगरों को प्रशिक्षण और देशी ही नहीं विदेशी ख़रीदारों तक उस सामान को पहुंचाना उनके काम का हिस्सा बन गए.

इस काम में उन्होने साथ जोड़ा कुछ स्वयंसेवी संस्थाओं को और उनकी मदद से तमाम कारीगरों की कला को बड़ा बाज़ार प्रदान किया.

कैसे कर सकते हैं आप ये काम

Image caption लोक कलाकारों की बनाई चीज़ों को शहरी ज़रूरत के हिसाब से ढाल कर गांव और शहर को जोड़ा जा सकता है.

वो तमाम लोग जो स्वनियोजित होने का ख़्वाब रखते हैं और इसी तरह का काम करना चाहते हैं जिसमें ना सिर्फ़ उनका बल्कि स्थानीय कला और संस्कृति का भी भला हो उन्हे मिनहाज सलाह देती हैं कि “सबसे पहले अपनी जगह की सबसे ख़ास कारीगरी देखिए, उत्पाद की उपयोगिता क्या है और कैसे उसे लक्षित बाज़ार के लिए ढाला जा सकता है. फिर इस काम के लिए ग़ैर-सरकारी संगठनों की मदद ली जा सकती है. कई सरकारी योजनाएं भी हैं. आप ठानिए और काम शुरू तो करिए. लोग जुड़ते जाएंगे ”.

आज मिनहाज दिल्ली में सफलतापूर्वक अपना स्टोर चलाती हैं और बांस के अलावा कई अन्य राज्यों के कलाकारों और कारीगरों के साथ भी काम कर रही हैं.

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